सर्व सेवा संघ ने सहमना संगठनों और सहयोगियों के साथ राजघाट, वाराणसी से दिल्ली तक संविधान मार्च की पदयात्रा की घोषणा की है। गांधी जयंती (2 अक्टूबर) से शुरू होकर संविधान दिवस (26 नवंबर) को जंतर-मंतर पर संपन्न होने वाली यह यात्रा मात्र पदयात्रा नहीं बल्कि सहयात्रा है— जिसका उद्देश्य है युद्ध, हिंसा और शोषण विहीन एक मानवीय दुनिया का निर्माण और संविधान मूल्यों की रक्षा।
अरविंद अंजुम
सर्व सेवा संघ ने अपने सहमना और प्रगतिशील संगठनों और मानवीय चेतना युक्त सहयोगियों की सहभागिता से राजघाट, वाराणसी से राजघाट, नई दिल्ली तक पदयात्रा करने का कार्यक्रम निश्चित किया है। यह पदयात्रा नहीं बल्कि सहयात्रा है क्योंकि हम सबके लक्ष्य समान हैं-युद्ध,हिंसा मुक्त और शोषण एवं शासन विहीन एक मानवीय दुनिया का निर्माण। यात्रा 2 अक्टूबर, गांधी जयंती से शुरू होकर 26 नवंबर 2025, संविधान दिवस के अवसर पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर संपन्न होगी। इससे पहले सभी पदयात्री और सहयोगी गांधी समाधि, राजघाट जाकर सर्व धर्म प्रार्थना के साथ सूफी-संतों की उदारवादी परंपरा और आजादी आंदोलन की विरासत, सद्भावना, संविधान और लोकतंत्र के प्रति अपना संकल्प जाहिर करेंगे। वहां से यह यात्रा- संविधान- मार्च के रूप में जंतर-मंतर तक जाएगी।

5 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटेन के लगभग 2 सौ वर्षों की गुलामी से सिर्फ मुक्त ही नहीं हुआ था बल्कि उसी दिन एक और महत्वपूर्ण घटना घटी थी जो भारतीय जनमानस के संज्ञान से प्रायः नदारद है। उसी दिन 3 हजार वर्षों के चले आ रहे राजतंत्र का भी विसर्जन हुआ था। यह रक्तहीन और खामोश क्रांति कैसे हुई? संघर्ष और सत्याग्रह तो ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति के लिए था। वास्तव में ये दोनों घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। अगर स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसामुखी लोकतांत्रिक चेतना का विकास नहीं हुआ होता तो राजतंत्र का समापन इतनी सहजता से नहीं होता। इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन न केवल ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति का आंदोलन था बल्कि साथ ही साथ राजतंत्र के विसर्जन का भी अभियान बन गया। *आजादी आंदोलन की ऊर्जा ने एक खामोश इंकलाब संपन्न करा दिया।
सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता से ही काम चलने वाला नहीं था। ब्रिटिश गुलामी और राजतंत्र के विसर्जन के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के तत्कालीन नेतृत्व को यह तय करना था कि आजाद भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप और संचालन पद्धति किस प्रकार का हो, इसलिए एक संविधान सभा का गठन हुआ। यह संविधान सभा किसी एक दल का नहीं बल्कि समावेशी था। ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष सर्वथा योग्य डॉ भीमराव अंबेडकर बने जो कांग्रेस पार्टी के नहीं थे। इस संविधान द्वारा भारत में किसी राजा, मसीहा, धर्मगुरु की जगह कानून का राज स्थापित हुआ और कानून सबके लिए बराबर माना गया। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया।
वोट के अधिकार को असंगत बना देने की साजिश
जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार जनता को मताधिकार के द्वारा प्राप्त हुआ। यह संवैधानिक अधिकार देश की सारी जनता को समान रूप से एक पंक्ति में खड़ा करती है; चाहे वह राजा रहे हों या प्रजा, उद्योगपति हो या मजदूर, धनी हो या गरीब: वोट का अधिकार सबके लिए बराबर है। लेकिन आज जनता के इस अधिकार को चुनाव संपन्न करने वाली संवैधानिक संस्था ही नष्ट कर देने पर आमादा है। जिस संस्था को नागरिकों के मताधिकार को सुरक्षित रखने का दायित्व सोपा गया है वहीं सिर्फ नोटिफिकेशन द्वारा जनता को इससे वंचित करने का प्रयास कर रहा है। यह न केवल नागरिक अधिकारों पर हमला है बल्कि एक पार्टी सिस्टम की ओर बढ़ता हुआ एकाधिकारवादी कदम है। बिहार में वोटरों का विशेष गहन परीक्षण को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग और सत्ताधारी दल की सांठ -गांठ से वोटों को विभिन्न तरीकों से हड़पने की न केवल खबरें बल्कि अब तो सबूत भी आने लगे हैं।
विचार,विधान और विरासत तोड़े जा रहे हैं
दरअसल आइडिया आफ इंडिया के बुनियादी विचार को ध्वस्त करने का प्रयास चल रहा है। यह विचार उदारवादी सूफी एवं संतों की परंपरा और स्वतंत्रता आंदोलन में विकसित हुए आदर्शों की विरासत है। यह समावेशी भारत की कल्पना है जिसमें किसी एक जाति, धर्म, भाषा या प्रांत का वर्चस्व नहीं बल्कि सभी की विशेषता का आदर करते हुए सह-अस्तित्व होगा। वर्तमान सरकार को इन आदर्शों से कोई लेना-देना नहीं है ,इसलिए एक-एक कर संवैधानिक संस्थाओं को निष्क्रिय,विखंडितऔर निस्तेज किया जा रहा है। भारतीय गणराज्य की संघीय व्यवस्था को आघात पहुंचाया जा रहा है। जीएसटी कर प्रणाली ने केंद्रीय सत्ता के हाथ में बेहिसाब और पक्षपातपूर्ण वित्तीय अधिकार सौंप दिया है। राज्यपालों की भूमिका विपक्षी दलों की प्रांतीय सरकारों की राह में रोडा अटकाने भर का रह गया है। चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के एजेंट के रूप में काम कर रही हैं।
सिर्फ विचार और विधान ही नहीं तोड़े जा रहे हैं बल्कि उदारवादी परंपरा एवं प्रेरणा स्थलों को भी ध्वस्त और विकृत किया जा रहा है। सबसे पहला आक्रमण साबरमती आश्रम पर हुआ। सौंदर्यीकरण और पर्यटन के नाम पर आश्रम को आलीशान भवनों से पाट देने की योजना पर काम चल रहा है। गांधी जी द्वारा स्थापित गुजरात विद्यापीठ को दखल कर लिया गया तथा सर्व सेवा संघ के राजघाट परिसर को बुलडोजर चला कर ध्वस्त कर दिया गया। इसी क्रम में जलियांवाला बाग को नवीनीकरण के नाम पर प्रेरणा स्थल से पर्यटक स्थल में तब्दील कर दिया गया है।ये सारे काम एक प्रतिगामी विचारधारा के तथाकथित सांस्कृतिक संगठन, जिस पर गांधी की हत्या के दाग लगे हैं,से प्रेरित राजनैतिक दल की सरकारों द्वारा किया जा रहा है।
आर्थिक महाशक्ति का दावा और गरीबी- बेरोजगारी का आलम
प्रायः यह दावा किया जाता है कि भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है। साथ ही साथ यह भी अहसान के रूप में बताया जाता है कि सरकार 80 करोड लोगों को 5 किलो अनाज देकर भरण-पोषण कर रही है। ये दोनों तथ्य परस्पर विरोधी है। वास्तव में भारत में जिस संपत्ति का निर्माण हो रहा है वह चंद हाथों में सिमट कर रह गया है। तथाकथित विकास के लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच रहे हैं। पूरी आर्थिक नीति और योजनायें कॉर्पोरेट परस्त है। इसलिए धन का केंद्रीकरण और गरीबी दोनों का ग्राफ एक साथ बढ़ रहा है। नौजवान बेरोजगार हैं और युवा श्रमशक्ति का देश के निर्माण में कोई योगदान नहीं हो पा रहा है। बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड,प बंगाल भारतीय रेल में धक्के खाते हुए रोजगार लिए इधर से उधर भटकते फिरते है।
कॉरपोरेट परस्त नीतियों के चलते ही 3 कृषि कानूनो को लाया गया था या फिर मजदूरों के कल्याण से संबंधित कानून निरस्त किये जा रहे है। प्राकृतिक संसाधनों के लूट को आसान बनाने के लिए 2013 के भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून को अध्यादेश लाकर निष्क्रिय करने की कोशिशें हुई है। 2013 के कानून को भाजपा शासित कई राज्य सरकारों ने तो निष्क्रिय बना दिया है और आदिवासी इलाकों में जमीन और खनिज संसाधनों की लूट में सरकार कॉरपोरेट की संरक्षक बन गई है।
युद्ध, हिंसा और हथियार मुक्त अमन और मोहब्बत की दुनिया चाहिए
रूस और यूक्रेन तथा इजरायल और हमास के बीच कई बरसों से युद्ध चल रहा है। युद्ध हथियारों का बाजार बन कर रह गया है।इसलिए हथियार बनानेवाली कंपनियां और उनकी संरक्षक सरकारों ने युद्ध को दुनिया का एक स्थाई परिघटना में बदल दिया है। इन्हीं सरकारों ने देशों के बीच के विवाद को शांतिपूर्वक समाधान के लिए गठित संयुक्त राष्ट्र संघ को निष्प्रभावी बना दिया है।एकाधिकार और बर्चस्व की नकारात्मक व अलोकप्रिय विचार को राष्ट्रीय गौरव के पर्दे के पीछे छिपाने का प्रयास किया जा रहा है।ट्रंप सरकार की हरकतों को इसी पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है।
व्यापारिक हित साधने के लिए कॉरपोरेट किसी भी कुकृति को करने के लिए तैयार हैं। पर हमें ऐसी प्रतिस्पर्धी और संहारकारी दुनिया नहीं चाहिए। *हमें युद्ध विहीन प्यार और सामंजस्य के साथ जीने वाला विश्वस्तरीय मानव समुदाय चाहिए जहां धर्म,भाषा,रंग, नस्ल, लिंग, पूंजी, देश के आधार पर भेदभाव न हो।*
एक कदम गांधी के साथ, कारवां प्यार का
इसलिए इस यात्रा का शीर्षक है-*एक कदम गांधी के साथ।* हम सब एक कदम आगे बढ़ाएंगे तो वह हमारे किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, आम नागरिकों के अधिकारों के जद्दोजहद और यहां तक कि फिलीस्तीन- गजा के रोते बिलखते और भूख से बिलबिलाते बच्चों,करुणा से कातर मांओं के दुख के साथ खड़े होंगे।गांधी आज भी इन जगहों पर खड़े हैं और हमारी ओर आशा भरी नजरों से प्रतीक्षा कर रहें हैं। क्या अब भी हम चुपचाप किनारा कर लेंगे या इंसानियत की राह पर कदम बढ़ाएंगे। (सप्रेस)


