विकास की विचारधारा : ‘संघ परिवार’ का संकट

अरुण कुमार डनायक

पिछले एक दशक से अधिक वर्षों से देश और कतिपय राज्यों की सत्ता पर काबिज ‘भारतीय जनता पार्टी’ और ‘संघ परिवार’ के अन्य सहमना संगठनों के पास आर्थिक विकास को लेकर क्या सोच है? और क्या उनकी सोच देश को आगे बढ़ाने में कारगर साबित हो रही है?

 ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर दिल्ली में अगस्त 2025 में संघ की आर्थिक इकाइयों की बंद कमरे में बैठक हुई जिसमें संघ से जुड़ी छह संस्थाओं – ‘भारतीय मज़दूर संघ,’ ‘भारतीय किसान संघ,’ ‘सहकार भारती,’ ‘ग्राहक पंचायत,’ ‘स्वदेशी जागरण मंच’ और ‘लघु उद्योग भारती’ – के प्रतिनिधि मौजूद थे। इस बैठक में 91 वर्ष के डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने जिस ऊर्जा और स्पष्टता के साथ आर्थिक और सामाजिक प्रश्नों पर चर्चा की उसने सबको चौंका दिया।

भौतिकी के प्राध्यापक रहे डॉ. जोशी का मानना है कि आर्थिक विकास को केवल आय या ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) के आधार पर नहीं आँका जा सकता। उन्होंने ‘नोबल पुरुस्कार’ विजेता डॉ. अमर्त्य सेन के हवाले से कहा कि यदि राष्ट्र की सफलता केवल उत्पादन और उपभोग पर निर्भर मानी जाएगी तो कल्याण, समानता और आध्यात्मिक दृष्टिकोण जैसे मूल प्रश्न पीछे छूट जाएंगे। उन्होंने ‘डीग्रोथ’ का विचार रखा, जिसका उद्देश्य विकास की अंधी दौड़ रोककर समाज को सादगी, साझेदारी और सामूहिक संसाधनों की रक्षा पर आधारित करना है। उनके अनुसार भारत में आय-असमानता गहराती जा रही है – सन् 2021 में 65 प्रतिशत संपत्ति केवल 10 प्रतिशत लोगों के हाथों में थी।

जापान को पीछे छोड़कर भारत के चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग तीन हजार डॉलर के आसपास है, जबकि जापान जैसे देशों में यह दस गुना अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम केवल सड़कों का चौड़ीकरण करते जाएँ और उनकी स्थिरता की चिंता न करें, तो हिमालयी क्षेत्रों में लगातार आपदाएँ आती रहेंगी। यही स्थिति महाविद्यालयों में घटते नामांकन, जलवायु-परिवर्तन की चुनौतियों, नशाखोरी के प्रसार और आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं में भी झलकती है।

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डॉ. जोशी ने दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ का भी उल्लेख किया, किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह अवधारणा आज की जटिल अर्थव्यवस्था और वैश्विक पूँजी के युग में कोई ठोस समाधान देती है? उपाध्याय ने विदेशी राष्ट्रों पर अत्यधिक निर्भरता की आलोचना की थी और आत्मनिर्भरता, कृषि और स्वदेशी उद्योगों की रक्षा पर बल दिया था, पर उनकी अवधारणा अंततः नैतिक उपदेशों तक ही सीमित रही। आर्थिक नीतियों में उनकी कोई ठोस रूपरेखा सामने नहीं आई। यही कारण है कि भाजपा और ‘संघ परिवार’ आज तक अपने आर्थिक दर्शन को साफ-साफ परिभाषित नहीं कर पाए हैं।

स्वदेशी को लेकर एक गहरी विडंबना है। सन् 1905 में ‘बंग-भंग आन्दोलन’ के समय शुरू हुए ‘स्वदेशी आन्दोलन’ और फिर महात्मा गांधी के स्वदेशी आह्वान ने भारतीयों को गहराई से प्रभावित किया था, किंतु बाद के संघ-प्रायोजित ‘स्वदेशी आन्दोलन’ और आज मोदी सरकार की अपीलें जनता को उतना आकर्षित नहीं कर सकीं। इसका कारण यह है कि महात्मा गांधी ने स्वदेशी को केवल नारा नहीं बनाया, बल्कि स्वयं अपने जीवन में उसे अपनाया।

उन्होंने स्वदेशी के आर्थिक पक्ष को चरखे और खादी के माध्यम से समझाया, गरीबी दूर करने का उपाय माना  और इसके धार्मिक-नैतिक पक्ष पर भी बल दिया। उनके लिए स्वदेशी केवल विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार तक सीमित नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और नैतिकता का प्रश्न था। गांधी का यही सजीव प्रयोग स्वदेशी को जनांदोलन बना सका, जबकि संघ और भाजपा की स्वदेशी आज भी केवल भाषणों तक सीमित है।

‘संघ परिवार’ की वैचारिक उलझनें यहीं खत्म नहीं होतीं। जब भाजपा बनी तो अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘गांधीवादी समाजवाद’ को उसकी नीति बताया। यह स्वयं एक विरोधाभास था क्योंकि गांधी का समाजवाद विकेंद्रीकृत, ग्राम-आधारित व्यवस्था चाहता था, जबकि भाजपा का व्यावहारिक रुख केंद्रीकृत सत्ता और पूंजीवाद समर्थित औद्योगिकीकरण की ओर रहा। जनता को यह पाखंड कभी नहीं भाया और पार्टी अंततः हिंदुत्व की ओर लौट गई। नरेंद्र मोदी भी अक्सर राममनोहर लोहिया का उल्लेख करते हैं और उनके आर्थिक दृष्टिकोण की प्रशंसा भी करते हैं, किंतु उनकी सरकार की नीतियाँ बड़े कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुँचाती हैं। इससे यह साफ है कि भाजपा और संघ का वैचारिक रुख अवसरानुसार बदलता रहता है।

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डॉ. अमर्त्य सेन का दृष्टिकोण यहाँ उल्लेखनीय है। उन्हें अक्सर वामपंथी कहा जाता है, किंतु वे साम्यवादी नहीं हैं। समाजवाद, साम्यवाद और मार्क्सवाद वामपंथ की विभिन्न धाराएँ हैं और सेन इनमें से किसी एक में फिट नहीं होते। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखते हुए कहा है कि भारत ने आर्थिक वृद्धि तो हासिल की है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियाँ बेहद सीमित रही हैं। अमीर–गरीब की खाई, लैंगिक असमानता और बुनियादी सेवाओं की कमी भारत की बड़ी बाधाएँ हैं। यदि लोकतंत्र को सार्थक बनाना है तो राज्य को कल्याणकारी ढांचे को मजबूत कर समान अवसर और सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। नेहरू की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि भारत में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा तो मिला, पर प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा हुई। यही कारण है कि भारत में गरीबी और असमानता गहराती रही। इस दृष्टि से सेन का दृष्टिकोण किसी विचारधारा की जड़ता से मुक्त, व्यवहारिक और मानवीय है।

यही बात हिंदुत्व के आर्थिक-सामाजिक दर्शन के पुरोधा रहे डॉ. जोशी भी कह रहे थे – कि यदि हम केवल वृद्धि के आँकड़े गिनते रहें तो समाज की आत्मा खो जाएगी। उन्होंने नशाखोरी, आत्महत्या और बेरोजगारी के आँकड़ों का उल्लेख कर बताया कि विकास के इस मॉडल ने युवाओं को निराशा के सिवा कुछ नहीं दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि  ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ आने वाले समय में असमानता को और बढ़ा देगा।

इस पूरी चर्चा से एक तथ्य स्पष्ट उभरता है। संघ और भाजपा की राजनीति ने सत्ता तो हासिल कर ली है, पर उन्होंने जनता के सामने कभी कोई ठोस वैकल्पिक आर्थिक मॉडल प्रस्तुत नहीं किया। कभी गांधीवादी समाजवाद, कभी स्वदेशी, कभी हिंदुत्व और कभी लोहियावाद—इन सबको अवसरानुसार ओढ़ते-बिछाते रहे। यही कारण है कि उनकी नीति जनता के मन में स्थायी विश्वास पैदा नहीं कर सकी।

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आज जब असमानता, जलवायु संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी, युवाओं का मानसिक तनाव और नशाखोरी जैसे मुद्दे सामने हैं, तब केवल हिंदुत्व या आर्थिक वृद्धि का नारा पर्याप्त नहीं है। यदि भाजपा और संघ परिवार वास्तव में राष्ट्र को दिशा देना चाहते हैं, तो उन्हें अमर्त्य सेन जैसे विचारकों की आलोचनात्मक दृष्टि से सीख लेनी होगी और अपने भीतर व्याप्त वैचारिक अस्पष्टता को दूर करना होगा। तभी भारत का विकास कल्याण, समानता और स्वतंत्रता की वास्तविक कसौटियों पर खरा उतर सकेगा। (सप्रेस)

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