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चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा देना सरकार की जिम्मेदारी : मध्यप्रदेश में पीपीपी मोड मेडिकल कॉलेजों का विरोध

भोपाल/इंदौर, 25 अगस्त। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 25 एकड़ भूमि मात्र एक रुपये के नाममात्र मूल्य पर निजी मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए उपलब्ध कराने का निर्णय विवादों में घिर गया है। जन स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न संगठनों और विशेषज्ञों ने इसे राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने वाला कदम बताया है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सेवाएँ और चिकित्सा शिक्षा मज़बूत सार्वजनिक व्यवस्था के माध्यम से ही सभी नागरिकों तक पहुँचनी चाहिए।

इससे पहले भी मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ व्यापक विरोध दर्ज किया गया था। एमपी मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, शासकीय स्वायत्तशासी चिकित्सा अधिकारी संघ, एमपी मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन, ईएसआई चिकित्सा अधिकारी संघ, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, नर्सिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन, कॉन्ट्रैक्चुअल डॉक्टर्स एसोसिएशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार अभियान, आशा/उषा सहयोगिनी श्रमिक संघ, जन स्वास्थ्य अभियान मध्य प्रदेश और अस्पताल बचाओ–जीव बचाओ संघर्ष मोर्चा सहित कई संगठनों के दबाव में सरकार को 12 जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने का अपना फैसला वापस लेना पड़ा था।

हालांकि, अब सरकार पीपीपी मोड के जरिए निजी संस्थाओं को भूमि और सुविधाएं देकर फिर से निजीकरण की राह पर बढ़ रही है। अमूल्य निधि, राजकुमार सिन्हा, राहुल यादव, रामप्रसाद काजले, समीना युसुफ, लक्ष्मी कौरव, उमेश तिवारी और विष्णु बाजपेयी सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह वास्तविक साझेदारी नहीं बल्कि राज्य की मदद से निजी चिकित्सा क्षेत्र का विस्तार है। इसके परिणामस्वरूप धार, बैतुल, पन्ना और कटनी में निजी मेडिकल कॉलेज खोलने का रास्ता साफ हो रहा है। उनका कहना है कि निजीकृत चिकित्सा शिक्षा मॉडल सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए समावेशी नहीं होते, बल्कि उन्हें शिक्षा से बाहर धकेलते हैं।

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विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री की वायबिलिटी गैप फंडिंग योजना के तहत केंद्र और राज्य की संयुक्त वित्तीय भागीदारी से नए मेडिकल कॉलेज खोले जाने की घोषणा पहले ही की जा चुकी है। ऐसे में राज्य सरकार को निजी संस्थाओं को सब्सिडी देने के बजाय नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने चाहिए और मौजूदा कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षक, बेहतर बुनियादी ढाँचा तथा चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।

विरोध कर रहे संगठनों ने मांग की है कि निजी कॉलेजों के साथ किए गए नए पीपीपी मॉडल के एमओयू (MoU) की प्रति सार्वजनिक की जाए और इन्हें तत्काल रद्द किया जाए। साथ ही यह स्पष्ट किया जाए कि क्या सब्सिडी देने की प्रक्रिया पारदर्शी रही है, क्या छात्रों की फीस पर सीमा तय होगी और क्या कम से कम 25 प्रतिशत सीटें गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क होंगी। उनका कहना है कि इस तरह की साझेदारी लंबे समय में आम जनता पर भारी आर्थिक बोझ डालेंगी।

जन स्वास्थ्य अभियान, नर्मदा बचाओ आंदोलन, जिंदगी बचाओ अभियान, बारगी बांध प्रभावित एवं विस्थापित संघ, पत्थर खदान मजदूर संघ, आशा/उषा सहयोगी श्रमिक संघ, टोंको रोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा और कटनी जिला जन अधिकार मंच के प्रतिनिधियों ने भी कहा कि अब तक का अनुभव बताता है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा में अपनाए गए ऐसे पीपीपी मॉडल सस्ती, समान और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराने में असफल रहे हैं। इसके बजाय, ये छात्रों और मरीजों पर खर्च का बोझ बढ़ाते हैं, असमानता गहराते हैं और सार्वजनिक व्यवस्था को कमजोर करते हैं।

संगठनों ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह इस त्रुटिपूर्ण पहल को छोड़कर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा शिक्षा को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित करे, ताकि मध्य प्रदेश के सभी नागरिकों को सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल सकें।

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