लगभग आठ दशकों की आजादी के बाद हम कहां, कैसे और किन हालातों में पहुंचे हैं? यदि कोई कभी इन सवालों के जवाब जानना चाहे तो उसे उन सपनों को खंगालना पड़ेगा जो हमने अपनी आजादी के बरक्स बुने थे। शायद इसीलिए हमें यदा-कदा, खासकर आजादी की सालगिरह जैसे मौकों पर उन सपनों को याद करते रहना चाहिए। आजादी की 79 वीं वर्षगांठ पर डॉ. खुशालसिंह पुरोहित का लेख।
आजादी की 79 वीं वर्षगांठ पर विशेष
भारत केवल 1947 में जन्मा नवीन राष्ट्र नहीं, अपितु सप्तसिन्धु की गोद में पला, वेदों के स्वर में गूंजता, उपनिषदों की चिंतनधारा में बहता, एक प्राचीन राष्ट्र है, जिसकी सांस्कृतिक चेतना हजारों वर्षों से अक्षुण्ण रही है। भारतवर्ष की पहचान सनातन सांस्कृतिक मूल्यों से है। हम भारत माता की जय बोलते हैं जो धर्म, दर्शन, साहित्य, संगीत, कला और जनमानस की राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक हैं। यह जयघोष बताता है कि भारत हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और द्वारका से लेकर कामरूप तक भाषा, बोली और सामाजिक परंपराओं में विविधता होते हुए भी विचारों में एक है।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम मात्र राजनीतिक मुक्ति की लड़ाई नहीं थी, यह आत्म-स्मृति की पुनःस्थापना का एक ऐसा संकल्प था, जो शोषण के विरुद्ध जनगण के अंतर्मन से उठी पुकार बन गया। यह वही संघर्ष था, जो महात्मा गांधी की करुणा, भगत सिंह की चेतना, सुभाष बोस की गर्जना और सावरकर की निर्भीकता में एकसाथ जीवंत हो उठा। हर स्वतंत्रता दिवस पर जब लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया जाता है, तो इतिहास बताता है कि यह वही दीवार है,जिसने औरंगज़ेब की हिंसा देखी, बहादुरशाह ज़फर की विवशता झेली और 1857की क्रांति के नायकों का लहू बहते देखा। यह कोई निष्प्राण दीवार नहीं,यह भारतीय सामाजिक चेतना की प्रतीक है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम असंख्य बलिदानों की महागाथा है। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव का हँसते हुए बलिदान, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाकउल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल की राष्ट्रवादी निष्ठा, गांधीजी के सत्याग्रह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज, सरदार पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की प्रखर राजनीति और जनआंदोलनों के आगे ब्रिटिश साम्राज्य टिक नहीं सका।
आज जब हम स्वतंत्र हैं, तो यह स्वतंत्रता ऋण है, उन अनगिनत ज्ञात और अज्ञात बलिदानियों का जिनकी चिंताओं में भारत का भविष्य बसता था। परंतु क्या हमने इन स्वतंत्रता सेनानियों के मर्म को सही अर्थों में समझा है? क्या हमने अपनी सांस्कृतिक आत्मा को पुनः पहचाना है? आज का भारत वैश्विक मंच पर आगे बढ़ रहा है, परंतु उसकी वास्तविक प्रगति तभी सार्थक होगी जब वह अपने सनातन जीवनमूल्यों, भाषाओं और सामाजिक परंपराओं के साथ आगे बढेगा।
हमें ऐसे भारत का निर्माण करना है जो विज्ञान में अग्रणी हो और आध्यात्म की दृष्टि से भी जाग्रत; जो तकनीकी ज्ञान से समृद्ध हो पर संस्कारों से भी अनुप्राणित हो। आज का युवा उत्तराधिकारी बने भारतीय मनीषा की उस परंपरा का जो वाल्मीकि से विवेकानंद तक, कृष्ण से चाणक्य तक, पतंजलि से भास्कराचार्य तक और आर्यभट्ट से योगीराज अरविंद तक फैली हुई है।
प्रधानमंत्री ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो ये भाषण समकालीन सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब होते हैं। इन संदेशों की सामाजिक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर रही है कि किस प्रधानमंत्री ने किस मुद्दे को किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया और वह जन सरोकारों से कितना जुड़ पाया। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के संदेश केवल भाषण नहीं रहे, बल्कि वे भारतीय समाज में विचारों,मूल्यों और व्यवहार में परिवर्तन लाने में अग्रणी रहे हैं। हर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उस कालखंड की सामाजिक आवश्यकताओं और चुनौतियों की चर्चा की है।
पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता दिवस के भाषणों में राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता, औद्योगिकीकरण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने पर जोर देते थे। उनके भाषणों से समाज में आधुनिक सोच, सामाजिक सुधार और लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति जागरूकता उत्पन्न हुई। लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान – जय किसान’ का नारा लाल किले से दिया,जिसने समाज को सैनिकों और किसानों के सम्मान के लिए प्रेरित किया।
इंदिरा गांधी के भाषणों में ‘गरीबी हटाओ’जैसे नारों ने समाज के निचले तबकों में भविष्य की नयी उम्मीद जगाई। 1971 के ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम’ के बाद लाल किले से अनके भाषण ने समाज में राष्ट्रीय गौरव का भाव भरा था, परन्तु लोकतान्त्रिक मूल्यों के दमन के प्रतीक 1975 के आपातकाल से उनकी छवि और सामाजिक विश्वसनीयता प्रभावित हुई, नतीजतन 1977 के चुनावों में उन्हें भारी पराजय का सामना करना पड़ा। मोरारजी देसाई के भाषणों में लोकतंत्र की बहाली की झलक और नागरिक स्वतंत्रता,मौलिक अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता पर जोर देने से नागरिकों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा पुनः जाग्रत हुआ था।
राजीव गांधी ने युवा भारत और टेक्नोलॉजी आधारित विकास की बात कही थी। कंप्यूटर, संचारक्रांति और पंचायती राज की बातें उनके भाषणों के केंद्र में रहती थीं,जिससे समाज में डिजिटल परिवर्तन तथा युवा और महिला सशक्तिकरण की शुरुआत हुई। वीपी सिंह के लाल किले के भाषण से समाज में सामाजिक न्याय और आरक्षण की नयी बहस आरम्भ हुई जिसने देश को हिंसक आंदोलन में झोंक दिया। नरसिम्हा राव के भाषणों में आत्मनिर्भरता,आर्थिक सुधार और वैश्वीकरण के प्रभावों की चर्चा रहती थी। इसी दौर में समाज में रोजगार, निजी क्षेत्र की भागीदारी और उपभोक्तावाद की नई संस्कृति का आरंभ हुआ।
अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण भावनात्मक, प्रेरक और राष्ट्रवाद की भावना वाले होते थे। उनके भाषण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से यथार्थ की यात्रा के भी परिचायक हैं। अटल जी द्वारा कही गयी ‘भारत उगता हुआ सूरज है’ जैसी पंक्तियों ने युवाओं और आम जनता में गर्व की भावना भरी। ‘पोखरण परमाणु परीक्षण’ और ‘कारगिल विजय’ के बाद उनके भाषणों ने देशभक्ति की भावना को मजबूत किया। डॉ.मनमोहन सिंह के भाषण में सामाजिक समावेश,शिक्षा, सूचना का अधिकार और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा रहती थी। उनके भाषण में आम तौर पर आर्थिक दृष्टि से भारत में स्थायित्व और सुधारों पर जोर रहता था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों से लाल किले को एक जन-संवाद मंच में बदलने का प्रयास किया है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’,’जन धन योजना’,’हर घर जल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं की शुरुआत की है। मोदी के कुछ भाषणों ने नागरिकों की मानसिकता में व्यावहारिक बदलाव कर उनके विचारों को जनआन्दोलन बना दिया।
भारत में जब तक अंतिम नागरिक के जीवन में गरिमा, समानता,और संप्रभुता का प्रकाश नहीं पहुंचेगा, तब तक स्वतंत्रता का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं,तो यह आत्मावलोकन करने का अवसर है कि क्या हम आज भी आत्मनिर्भर हैं?क्या हमारी नीतियाँ अपनी मिट्टी और देशज परंपराओं से उपजी हैं? आज हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं,जहाँ भारत पर बहुआयामी संकट के बादल घने होते जा रहे हैं। आज हर मोर्चे पर मौजूद संकट में सांस्कृतिक अतिक्रमण,वैचारिक विखंडन और तकनीकी उपनिवेशवाद प्रमुख है।
देश में ज्यादातर लोग अपनी भाषाओं को और अपनी परम्पराओं को पिछड़ापन समझने लगे हैं। समाज में वैचारिक विखंडन और सामाजिक ध्रुवीकरण आज मीडिया,सोशल मीडिया और शिक्षण संस्थानों तक पहुँच रहा है। युवा पीढ़ी इतिहास से विमुख हो रही है, उन्हें भारत की परंपरा,दर्शन और संघर्षों से अनभिज्ञ रखा जा रहा है। आज के संकटों से लड़ने के लिए भारत में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान की आवश्यकता है। आज हमें आत्ममंथन करना होगा, इस दिन उस चेतना को जगाना होगा जो एक संस्कारशील राष्ट्र बनाती है। (सप्रेस)
डॉ.खुशालसिंह पुरोहित लेखक एवं पत्रकार हैं। रतलाम से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘पर्यावरण डाइजेस्ट’ के संपादक हैं।


