हर वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस, उन समुदायों के जीवन दर्शन और प्रकृति संग सह-अस्तित्व की अनूठी परंपरा को सम्मानित करने का अवसर है। जंगल, जल और जमीन से गहरे जुड़े आदिवासी समाज का ज्ञान, संस्कृति और संरक्षण की चेतना आज भी टिकाऊ भविष्य का मार्ग दिखाती है, जिसे बचाना हमारी साझा जिम्मेदारी है।
9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस
संध्या राजपुरोहित

आदिवासी समुदाय, जिनका जीवन जंगलों, पहाड़ों, नदियों और प्रकृति की लय के साथ बंधा हुआ है। वे जंगल को सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि मां, रक्षक और जीवनदाता मानते हैं। उनके लिए प्रकृति पूजा का नहीं, साझेदारी का माध्यम है। उनके गीतों में नदी बहती है, उनके त्योहारों में वृक्ष खिलते हैं और उनकी जीवनशैली में धरती मुस्कुराती है। आदिवासी समाज का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर आधारित होता है। उनके लिए जंगल केवल जीवन यापन का साधन नहीं, बल्कि पूजा, परंपरा, ज्ञान और अस्तित्व का केंद्र होता है। वे न तो जंगल को अलग मानते हैं, न ही उस पर अपना स्वामित्व जताते हैं। उनके लिए जंगल उनके शरीर का विस्तार है, उनकी सांसों की गंध है, और उनकी आत्मा की गहराई है।
राष्ट्रीय वन नीति 1988 में भी यह स्वीकार किया गया है कि जंगलों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से आदिवासियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह बात केवल वैधानिक नहीं, व्यावहारिक भी है, क्योंकि आदिवासी जंगलों को बाहरी दुनिया से बेहतर जानते हैं। वे पेड़ों की आयु, औषधीय गुण, मौसम की चाल, पशु-पक्षियों के व्यवहार और जलस्रोतों के स्थानों को अनुभव से पहचानते हैं। आदिवासी वन सम्पदा का अत्यंत विवेकपूर्ण और सतत उपयोग करते हैं। वन संसाधनों का उपयोग वे अत्यंत विवेकपूर्ण ढंग से करते हैं। महुआ, चिरौंजी, तेंदूपत्ता, साल बीज, आंवला, हर्रा, बहेरा जैसे अनेक लघु वनोपज उनके जीवन में महत्व रखते हैं। वे इन्हें केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक उपभोग और समुदाय हित के लिए एकत्र करते हैं। महुआ के फूल हों, साल के पत्ते, तेंदूपत्ता, शहद या लाख—हर चीज़ का संग्रह एक नैतिक मर्यादा के साथ किया जाता है। वन केवल उनकी भूख मिटाते हैं ऐसा नहीं — वे उन्हें औषधि, ऊर्जा, संस्कृति और शिक्षा भी देते हैं।
मध्यप्रदेश, आदिवासी बहुल राज्य है, वहां गोंड, भील, बैगा, कोरकू, सहरिया जैसे अनेक समुदाय सदियों से निवासरत हैं। इनका जीवन वनों से जुड़ा हुआ है। जंगल इनके भोजन, ईंधन, औषधि, आवास और संस्कृति का स्रोत है। बैगा जनजाति, जिसे ‘जंगल का डॉक्टर’ भी कहा जाता है, सैकड़ों औषधीय पौधों की जानकारी पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित करती आई है। क्योंकि उनके पास लगभग 250 से अधिक औषधीय पौधों की पहचान और उपयोग की पारंपरिक जानकारी है। वे पेड़ की छाल, पत्ते, बीज और जड़ों का उपयोग कर बीमारियों का इलाज करते हैं — बिना वनस्पति को नुकसान पहुँचाए। वे सैकड़ों वर्षों से जड़ी-बूटियों द्वारा चिकित्सा करते आए हैं। वे बिना पेड़ काटे, बिना जड़ों को हानि पहुँचाए दवाओं का निर्माण करते हैं। यह उनकी पर्यावरणीय चेतना और संवेदनशीलता को दर्शाता है। आज भी भारत के अधिकांश आदिवासी गांव ऐसे हैं जहाँ वनों के बगैर जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। चाहे वह दैनिक भोजन हो, दवा हो या आजीविका—वनों के बिना सब अधूरा है।
मध्यप्रदेश के कई आदिवासी क्षेत्रों में महिलाएँ ‘वन-सहेली’ या ‘जंगल-बचाओ समिति’ के माध्यम से वनों की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। धार, डिंडोरी, मंडला और अलीराजपुर जैसे जिलों में महिलाओं ने जंगल की अवैध कटाई रोकने, आग लगने से बचाव करने और वृक्षारोपण जैसे कार्यों में अनुकरणीय योगदान दिया है। यहाँ रहने वाले भील समुदाय ने कई जगहों पर सामूहिक जल संरक्षण, जंगलों की पहरेदारी और वन अधिकार अधिनियम के तहत अपने अधिकारों के साथ-साथ संरक्षण की जिम्मेदारी भी उठाई है।यहाँ महिलाओं ने खुद ‘जंगल प्रहरी समूह’ बनाया। अवैध लकड़ी कटाई रोकने के लिए उन्होंने स्वयं जंगल की पहरेदारी शुरू की। आज वे न केवल जंगल बचा रही हैं, बल्कि वहाँ 500 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फिर से हरियाली लौटी है।
आदिवासी समाज में पर्यावरण केवल एक वस्तु नहीं, एक चेतना है। वे जल, जंगल और जमीन को जीवन के त्रिकोण के रूप में देखते हैं। नदी हो या पहाड़, पेड़ हो या पशु — सबके साथ उनका रिश्ता आध्यात्मिक होता है। वे नदी को माँ मानते हैं, पेड़ को देवता और पहाड़ को संरक्षक। यह सोच उन्हें प्रकृति का पूजक और रक्षक बनाती है। ।
आदिवासियों की कृषि पद्धति भी पारंपरिक होती है। वे स्थान-स्थान पर खेती करते हैं, जिससे जमीन को विश्राम मिलता है और उसकी उपजाऊ शक्ति बनी रहती है। वे बिना रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के जैविक खेती करते हैं। यह प्रणाली पर्यावरण के लिए सुरक्षित होती है और मिट्टी के स्वास्थ्य को संरक्षित रखती है। उनकी पारंपरिक सिंचाई विधियाँ जल संरक्षण के आदर्श उदाहरण हैं।
दुर्भाग्यवश विकास की अंधी दौड़ में आदिवासी समाज सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। उनकी ज़मीनें छिनी गईं, जंगल कटे, जलस्रोत प्रदूषित हुए और उन्हें मुख्यधारा से काटने की कोशिश की गई। परंतु इसके बावजूद भी उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। वे जिस तरह सामूहिक जीवन जीते हैं, उसमें संपत्ति का लालच, सामाजिक भेदभाव और प्रतिस्पर्धा का स्थान न्यूनतम है। लेकिन आज की उपेक्षापूर्ण नीतियाँ, खनन परियोजनाएं, जबरन विस्थापन और सांस्कृतिक क्षरण ने उनके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। संविधान में अनुसूचित जनजातियों को विशेष अधिकार मिले हैं, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी उन्हें जल, जंगल और ज़मीन पर अधिकार देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अभी भी आदिवासी क्षेत्रों में उन्हें पर्याप्त सम्मान और अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। आदिवासी समाज हमें सिखाता है कि जंगल केवल लकड़ी के टुकड़े नहीं, बल्कि साँस लेते जीव हैं। नदियाँ केवल पानी की धाराएँ नहीं, बल्कि सभ्यता की नसें हैं। और धरती केवल खनन की ज़मीन नहीं, बल्कि जीवन की माँ है।
वर्तमान में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण और जैव विविधता के संकट से जूझ रही है, तब आदिवासी समुदाय का पारंपरिक ज्ञान, संरक्षण की लोकसंस्कृति और संतुलित उपभोग की धारणा हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकती है। आधुनिक समाज जो ‘सस्टेनेबिलिटी’ के मॉडल खोज रहा है, वह आदिवासी जीवन में सहज रूप से विद्यमान है। उनके पर्व-त्योहार भी प्रकृति से जुड़े होते हैं — जैसे हरियाली अमावस्या, जिसमें वे वृक्षारोपण करते हैं और पेड़ों को राखी बाँधकर संरक्षण की शपथ लेते हैं। यह संवेदनशीलता उन्हें प्रकृति के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाती है।
आज हम आदिवासी जीवनशैली की उन विशेषताओं को समझें जो हमें एक हरित, शांतिपूर्ण और संतुलित भविष्य की ओर ले जा सकती हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हम न केवल उनकी संस्कृति का संरक्षण करें, बल्कि उनकी भूमि, जल, जंगल और संसाधनों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करें। यह केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
संध्या राजपुरोहित पिछले वर्षों से शिक्षा एवं सामाजिक विकास के काम में संलग्न है। वर्तमान में आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में सक्रियता से संलग्न है।


