लोकतंत्र विचार

 लोकतंत्र में दो धमाके !

 लोकतंत्र में दो धमाके !

अभी कुछ दिन पहले हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने सभी का ध्यान खींचा है। इनमें से एक तो 2006 के मुंबई बम धमाकों में, जो ‘7/11 ब्लॉस्ट’ के नाम से जाना जाता है, 18 साल से जेल भुगत रहे सारे...

कुमार प्रशांत

अभी कुछ दिन पहले हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने सभी का ध्यान खींचा है। इनमें से एक तो 2006 के मुंबई बम धमाकों में, जो ‘7/11 ब्लॉस्ट’ के नाम से जाना जाता है, 18 साल से जेल भुगत रहे सारे अपराधियों का रिहा होना है और दूसरी अचानक देश के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष जगदीप धनखड़ का रहस्यपूर्ण इस्तीफा देना। क्या है, इन घटनाओं की अंतरकथा?

करीब-करीब साथ ही आई दो धमाकेदार खबरों में पहली मुंबई हाइकोर्ट की है, जिसने मुंबई की लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई 2006 को लगातार हुए 7 बम विस्फोटों के सारे 12 अभियुक्तों को निर्दोष करार कर रिहा कर दिया। इस मामले में 2015 में एक विशेष अदालत ने पांच अभियुक्तों को फांसी और सात को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी। अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस फ़ैसले को पलट दिया है। इनमें से एक अभियुक्त की मौत हो गई थी। जिंदगी के अनमोल 18 लंबे वर्ष सरकार की जेल में निरपराध बंद रहे ये सभी लोग मुसलमान हैं और उन्हें इसी की सजा मिली थी। इन विस्फोटों में 189 लोग मारे गए थे तथा 824 बुरी तरह जख्मी हुए थे। इस तरह का हमला कोई दुश्मन ही कर सकता है या फिर कोई हैवान ! इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इस अमानवीय कांड के षड्यंत्रकारियों को खोजकर पकड़ा जाए और कानून के हवाले किया जाए।

हाईकोर्ट का फैसला एक धमाके की तरह आया है। उसने कहा है कि अपराधी की खोज का मतलब यह नहीं है कि आप सड़क से किसी को भी पकड़कर, अपराधी घोषित कर दें और जेल में डाल दें। सामान्य समझ यह कहती है कि एक ऐसा वृहद योजनाबद्ध अपराध ‘सफल’ होने से पहले कितने ही अपराधी गिरोहों के हाथों से गुजरता है जिनका धर्म के आधार पर विभाजन करना एक सांप्रदायिक अपराध है। पैसों की हेराफेरी हुई होगी, हवाला हुआ होगा, कितने हाथों व रास्तों से छिपता-छिपाता बारूद पहुंचा होगा ! अपराधियों, तस्करों,  गैंगस्टरों का एक ही धर्म होता है – पैसा बनाना; फिर ‘एटीएस’ (एन्टी टेरेरिस्ट स्क्वॉड) ने केवल मुसलमानों क्यों दबोचा? क्योंकि उसे पता था कि उस वक्त की सरकार की राजनीति को यह सबसे अधिक सुहाएगा।

‘किसी अपराध के मुख्य व्यक्ति को सजा दिलवाना आपराधिक गतिविधियों को दबाने, कानून व्यवस्था को बनाए रखने तथा नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी करने की दिशा में निहायत जरूरी काम है, लेकिन ऐसा झूठा आभास पैदा करना कि हमने मामला हल कर लिया है तथा अपराधी अदालत में पहुंचा दिए गए हैं, एक खतरनाक दावेदारी है। ऐसे क्षद्मपूर्ण ढंग से मामले को निबटाने से लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास टूटता है और समाज को झूठा आश्वासन मिलता है जबकि असली अपराधी कहीं छुट्टे घूमते रहते हैं। हमारे सामने जो मामला आया है, वह ऐसा ही है।’ जस्टिस अनिल किलोर तथा जस्टिस श्याम चांडक ने 671 पन्नों का फैसला इस तरह लिखकर सारे आरोपियों को रिहा कर दिया।  

अब कठघरे में कौन है? महाराष्ट्र की सरकार और उसका ‘एटीएस।’ महाराष्ट्र सरकार तुरंत सुप्रीम कोर्ट गई। वहां कहा कि हम रिहा लोगों को फिर से जेल में डालने की मांग नहीं कर रहे, बल्कि यह निवेदन कर रहे हैं कि ऐसे फैसले का असर ‘मकोका’ (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम) के दूसरे मामलों पर भी पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट इसकी सफाई में आदेश जारी करे। सुप्रीम कोर्ट ने कुल जमा यह निर्देश दिया कि मुंबई हाइकोर्ट के इस फैसले को ‘मकोका’ के दूसरे मामलों में आधार नहीं बनाया जाए – ‘बस, इससे अधिक कोई राहत हम आपको नहीं दे सकते।’ मतलब मुंबई हाइकोर्ट का फैसला ज्यों-का-त्यों लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ दिया कि इस मामले में जो लोग रिहा हो चुके हैं, अब उन्हें वापस जेल में नहीं डाल सकते।  

सरकारों के पास शर्म भले न हो, जनता का इफरात पैसा तो है ही। वह वकीलों-अदालतों पर कुछ भी लुटा सकती है, लेकिन इस अनमोल सवाल का जवाब न महाराष्ट्र सरकार दे सकती है, न सुप्रीम कोर्ट कि वह कौन-सी अदालत होगी जहां ऐसी सरकार को व ऐसे प्रशासन को सजा मिलेगी जो बेकसूरों की जिंदगी से ऐसी बेरहमी से खेलती है? हमारे संविधान में बहुत सारे संशोधन हुए, ऐसा एक जरूरी संशोधन कौन-सी सरकार ला सकती है और कौन-सी अदालत ऐसा करने का निर्देश सरकार को दे सकती है कि अपराध को रोकने के नाम पर आप अपराध नहीं कर सकते? ऐसा प्रमाणित होने पर सरकार व प्रशासन को भी सज़ा मिलेगी! ऐसा हुआ तो यह संसदीय लोकतंत्र को उन्नत करने वाला कदम होगा।   

महाराष्ट्र हाइकोर्ट के धमाके की गूंज अभी ठीक से गूंजी भी नहीं थी कि दूसरा धमाका दिल्ली में हुआ। एक सत्वहीन उप-राष्ट्रपति ने जितना संभव था, उतने नाटकीय ढंग से इस्तीफा दे दिया। देश के संसदीय इतिहास में ऐसा कम ही हुआ है कि किसी उप-राष्ट्रपति ने कार्यकाल समाप्ति से पहले त्यागपत्र दिया हो, लेकिन क्या जगदीप धनखड़ कभी किसी गंभीर राजनीतिक विमर्श के पात्र रहे हैं? उनका सारा राजनीतिक जीवन दूसरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने की दरिद्र कहानी भर है। दल बदलते हुए वे भाजपा तक पहुंचे और प्रधानमंत्री को लगा कि यह आदमी मेरी कारगर कठपुतली बन सकता है, सो उन्होंने अपने दरबार में उन्हें शामिल कर लिया। वे ममता बनर्जी को नाथने के लिए राज्यपाल बनाकर बंगाल भेजे गए। राज्यपालों को सर्कस का बंदर बनाने की कहानी यहीं से शुरू होती है।

धनखड़ सबसे अव्वल रहे, इसलिए दिल्ली लाए गए। राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं था, सो सरकार को ऐसे लठैत की जरूरत थी। वे राज्यपाल के रूप में जितना गिरे, उप-राष्ट्रपति व राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में उससे भी आगे गए। उन्होंने किसी भी मर्यादा का पालन नहीं किया : न संवैधानिक मर्यादा का, न राजनीतिक मर्यादा का, न दो राज्य प्रमुखों के व्यवहार की मर्यादा का, न मानवीय रिश्तों की मर्यादा का। धनखड़ ने राज्यसभा को प्राइमरी स्कूल की कक्षा में बदलकर ख़ुद को हेडमास्टर नियुक्त कर लिया। विपक्ष का कोई ही वरिष्ठ सदस्य ऐसा नहीं होगा जिसे उन्होंने अपमानित न किया हो। उनके हाव-भाव से उन सबके लिए गहरी हिकारत झलकती थी जो सत्तापक्ष के नहीं थे।

धनखड़ कभी वकील भी रहे थे इसलिए उन्हें मुगालता था कि वे संविधान विशेषज्ञ भी हैं। वे संविधान की मनमानी व्याख्या करने लगे, सुप्रीम कोर्ट को उसकी औकात बताने लगे। मोदी-राज में यह सबसे खतरनाक है। कठपुतलियां ही कठपुतली नचाने की कोशिश करने लगें, तो भला कोई कैसे सहे ! उन्हें लगता रहा कि इस तरह प्रधानमंत्री की नजर में बने रहने से अगली सीढ़ी चढ़ने को मिलेगी। बस, यहीं आकर वे गच्चा खा गए। इस सरकार ने भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसी खोखली व्यवस्था में बदल दिया है जिसमें व्यक्तित्वहीन कठपुतलियों का मेला लगा है। एक नहीं, कई धनखड़ हैं। एकाधिकारशाही के लिए ऐसा करना जरूरी होता है। एकाधिकारशाही में संविधान ऐसा मृत दस्तावेज होता है जिसे बाजवक्त प्रणाम किया जाता है और सारी संवैधानिक व्यवस्थाओं को प्राणहीन जी-हुजूरों का अस्तबल बना दिया जाता है। हम आज उसी के रू-ब-रू हैं! (सप्रेस)

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