अजमेर,15 जुलाई । सामाजिक कार्यकर्ता और मित्र रवि हेमाद्री अब हमारे बीच नहीं रहे। आज सुबह 4:35 बजे, अजमेर के मित्तल अस्पताल की आईसीयू में उन्होंने अंतिम साँस ली। इंदिरा उनके साथ आख़िरी क्षण तक थीं। वे बुखार के चलते अस्पताल में भर्ती थे और वहीं उन्हें दिल का दौरा पड़ा। रवि ने 27 जून को एक और हार्ट इंटरवेंशन करवाया था, जिसमें उनके दिल में स्टेंट डाले गए थे। तीन वर्ष पहले उनकी बायपास सर्जरी भी हो चुकी थी। मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं के कारण उन्हें लंबे समय से हृदय संबंधी समस्याएँ थीं, जो अंततः घातक साबित हुईं। उनके परिवार में उनकी बेटी गुलशन भी पहुंच गई थी।
रवि हेमाद्री मूलतः एक मेकैनिकल इंजीनियर थे, लेकिन अपने बीसवें वर्ष की आयु में ही उन्होंने कॉर्पोरेट करियर को छोड़कर बाबा आमटे के साथ महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्र सोमनाथ में जनसेवा का रास्ता चुना। बाद में वे झाबुआ आए और अपने साथियों जैकब नेलिथनम और हिमांशु ठक्कर के साथ मिलकर बाबा आमटे के सहयोग से वाटरशेड संरक्षण का कार्य प्रारंभ किया।

कुछ समय बाद वे बीच खेड़ूत मज़दूर चेतना संघठ में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में जुड़ गए। रवि एक अद्भुत संगठक और निर्भीक लड़ाकू थे। उन्होंने भील आदिवासियों के वन अधिकार के लिए और सरदार सरोवर बाँध के कारण होने वाले विस्थापन के विरुद्ध लम्बे संघर्ष किए। वे कई बार जेल भी गए। एक बार तो उन्हें अमित भटनागर और अन्य आदिवासियों के साथ अलीराजपुर में पुलिस ने पीटा और हथकड़ी पहनाकर सार्वजनिक रूप से परेड कराई। इस अवैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, और न्यायालय ने न केवल प्रशासन की निंदा की बल्कि अंडर ट्रायल कैदियों को हथकड़ी न लगाने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया, जो आज कानून का हिस्सा है।
इन्हीं आंदोलनों के दौरान उनकी मुलाकात जेंडर अधिकार कार्यकर्ता इंदिरा पंचोली से हुई, और दोनों ने विवाह किया। इसके बाद रवि राजस्थान चले गए जहाँ उन्होंने इंदिरा के साथ बनास नदी पर बिसलपुर बाँध से विस्थापित लोगों के हक़ में संघर्ष किया। आगे चलकर उन्होंने जेंडर और विकास के अन्य मुद्दों पर भी काम किया।
कुछ वर्षों बाद रवि दिल्ली स्थित संस्था ‘अदर मीडिया’ से जुड़े, जहाँ वे डायरेक्टर के रूप में काम करते हुए देशभर में अधिकार आधारित जन आंदोलनों के समन्वय का कार्य करने लगे। यहीं उन्होंने रोहिंग्या शरणार्थियों के पक्ष में गंभीर प्रयास शुरू किए और भूमि अधिकारों पर एक बहु-राज्यीय अध्ययन का सफल समन्वय भी किया।
अंततः उन्होंने डेवलपमेंट एंड जस्टिस इनिशिएटिव (DAJI) नाम से एक नई संस्था की स्थापना की। इस संस्था के ज़रिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) से समन्वय कर भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों को मान्यता दिलाने और शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार के अधिकार सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई।
दुर्भाग्यवश, पिछले कुछ वर्षों में न केवल उनकी सेहत कमजोर होती गई, बल्कि भारत सरकार की शरणार्थियों के प्रति टकरावपूर्ण नीति ने उनके कार्यक्षेत्र को काफी सीमित कर दिया, जिससे वे मानसिक और सामाजिक रूप से जूझते रहे।
उनके देहांत पर जन आंदोलनों से जुडे साथियों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। जन आंदोलनों से जुडें राहुल बैनर्जी ने कहा कि रवि उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने न्याय और अधिकारों के लिए देशभर में जन आंदोलनों में कूदने का साहस दिखाया। वे तब तक लड़ते रहे जब तक शरीर ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उनके जाने से व्यक्तिगत ही नहीं, एक सामाजिक शून्य भी पैदा हुआ है — खासकर उस समय जब न्याय के लिए लड़ाई पहले से कहीं कठिन हो गई है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुडी चित्तरूपा पालित ने कहा कि रवि के बारे में यह दुखद समाचार सुनकर मन बेहद व्यथित है। वे एक सच्चे आदर्शवादी और हम सबके लिए एक अच्छे, आत्मीय मित्र थे। वे सहज स्वभाव के, मेहनती और ग़रीबों के अधिकारों के लिए गहराई से प्रतिबद्ध इंसान थे। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने रोहिंग्या शरणार्थियों के साथ ज़मीनी स्तर पर बहुत ही साहसी और ठोस कार्य किया।
लेकिन सत्ता में बैठे लोग उनके इस साहसिक काम में लगातार व्यवधान डालते रहे — उनके संगठन की FCRA मंजूरी रद्द कर दी गई और संयुक्त राष्ट्र द्वारा मिलने वाली सहायता भी ट्रम्प प्रशासन द्वारा बंद कर दी गई। रवि और इंदिरा दोनों ही एक प्रतिबद्ध, संघर्षशील और संवेदनशील जोड़ी के रूप में जाने जाते रहे।
कविता श्रीवास्तव ने कहा कि इस शून्य को कोई भर नहीं सकता, लेकिन हम सब मिलकर उन्हें इस दुख को सहने की ताक़त दें।
राकेश दीवान ने कहा कि एक बरसों पुरानी फोटो में हम साथ हैं जिसे देखकर रवि के साथ आलीराजपुर, अट्ठा में बिताए दिन अक्सर याद करता हूँ। यह बेहद बुरी, अस्वीकार्य खबर है।
हिमांशु ठक्कर ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि यह जानकर मन अत्यंत दुखी और विचलित है। रवि एक बेहद आत्मीय, स्नेही और अद्भुत मित्र थे — हालाँकि बीते कुछ वर्षों से संपर्क नहीं था, लेकिन यादें आज भी उतनी ही जीवित हैं। हमने झाबुआ के नवापाड़ा में लगभग दो वर्षों तक साथ रहकर काम और जीवन साझा किया। उनके साथ के दिन जीवन का एक मूल्यवान हिस्सा हैं।
इसके अलावा विनीत तिवारीी,सप्रेस के कुमार सिद्धार्थ, रेहमत, अमूल्य निधि जयश्री अमित, नंदिनी ओझा, श्रीपाद धर्माधिकारी, साधना, लता पीएम आदि ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।


