विवाह रिश्तों का द्वैत : सामाजिक बंधन या व्यक्तिगत आजादी

अमित कोहली

आजकल अखबार स्त्री-पुरुष संबंधों के टूटने, अक्सर हिंसक हो जाने और नतीजे में किसी एक या दोनों की मृत्यु की खबरों से अटे पड़े रहते हैं। क्यों हो रहा है, ऐसा? समाज में स्त्री की घटती हैसियत और पितृ-सत्ता के फैलाव ने क्या ऐसी बदहाली न्यौती है? या इसकी कोई और वजहें भी हैं?

भारतीय समाज में विवाह को एक संस्कार माना जाता है, जिसमें दो व्यक्तियों का ही नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन होता है। पारंपरिक रूप से विवाह को सामाजिक स्थिरता, नैतिकता और पारिवारिक एकता का आधार माना गया है। विवाह के माध्यम से ना केवल संतानोत्पत्ति, बल्कि सामाजिक संरचना को बनाए रखने की कोशिश की जाती रही है। समय के साथ विवाह की परिभाषा और उद्देश्य बदलते गए हैं। आधुनिक समाज में विवाह साथी, मित्र और सहयोगी की खोज का माध्यम बन गया है। 

आज विवाह व्यक्तिगत और भावनात्मक आवश्यकताओं से जुड़ गया है। लोग अब उसे केवल सामाजिक मान्यता प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते, बल्कि एक साथी, मित्र और सहयोगी की खोज के रूप में देखते हैं। विवाह में दो व्यक्ति एक-दूसरे को भावनात्मक और मानसिक संबल प्रदान करते हैं। इसके अलावा, विवाह कानूनी सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति भी प्रदान करता है। कई अधिकार और सुविधाएँ, जैसे संपत्ति का उत्तराधिकार, चिकित्सा निर्णय लेने का अधिकार और कर लाभ विवाह के माध्यम से सुनिश्चित होते हैं। आर्थिक स्थिरता भी एक महत्वपूर्ण कारक बन गई है, क्योंकि कई लोग विवाह को एक साझेदारी के रूप में देखते हैं, जहाँ दोनों व्यक्ति मिलकर जीवन की चुनौतियों का सामना करते हैं। 

आजकल विवाह के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आया है, लेकिन यह अभी भी समाज में एक महत्वपूर्ण संस्था बना हुआ है। कुछ लोग इसे एक पारंपरिक बंधन के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे एक व्यक्तिगत निर्णय मानते हैं। हाल ही में मेघालय से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। अन्देशा जताया जा रहा है कि इंदौर निवासी राजा रघुवंशी की हत्या उसकी नव-विवाहित पत्नी सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर कर दी। हत्या का कारण पारिवारिक विवाद और विवाह में बढ़ती असहमति बताई जा रही है। पुलिस की जांच में सामने आया कि सोनम और उसके प्रेमी ने मिलकर राजा को रास्ते से हटाने की योजना बनाई थी।

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कुछ समय पूर्व मेरठ में एक और भयावह घटना सामने आई थी, जहाँ मुस्कान नामक महिला ने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर अपने पति सौरभ की हत्या कर दी थी। सौरभ लंदन से मुस्कान का जन्मदिन मनाने आया था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसकी हत्या कर दी गई। हत्या के बाद मुस्कान और साहिल ने शव के 15 टुकड़े कर उसे सीमेंट से भरे ड्रम में डाल दिया। पुलिस ने जब घर में फैली दुर्गंध के कारण जांच शुरू की, तब इस अपराध का खुलासा हुआ।

‘लिव-इन’ संबंधों को अक्सर पारंपरिक विवाह का स्वतंत्रता और समता आधारित विकल्प माना जाता है। इसे एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा जाता है, जहाँ दो व्यक्ति बिना सामाजिक और कानूनी बंधनों के साथ रह सकते हैं, एक-दूसरे को बेहतर समझ सकते हैं और अपने रिश्ते को बिना बाहरी दबाव के विकसित कर सकते हैं। ‘लिव-इन’ की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। युवा वर्ग अब विवाह से पहले एक-दूसरे को समझने और रिश्ते की वास्तविकता को परखने के लिए ‘लिव-इन’ को प्राथमिकता दे रहा है। यह व्यवस्था उन लोगों के लिए भी आकर्षक है, जो विवाह की कानूनी और सामाजिक जटिलताओं से बचना चाहते हैं। इसके अलावा, ‘लिव-इन’ में सहजीवन की स्वतंत्रता होती है, जहाँ दोनों साथी बिना किसी सामाजिक दबाव के अपने रिश्ते को आगे बढ़ा सकते हैं। 

हालाँकि, ‘लिव-इन’ संबंधों को विवाह का आदर्श विकल्प मानना एक भ्रम साबित हो सकता है। हाल की घटनाओं से यह स्पष्ट हुआ है कि ‘लिव-इन’ में भी वही समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जो विवाह में देखी जाती हैं। श्रद्धा वालकर की हत्या इसका एक भयावह उदाहरण है, जहाँ उसके ‘लिव-इन’ पार्टनर आफताब पूनावाला ने उसकी हत्या कर दी और उसके शरीर के टुकड़े कर कई दिनों तक छिपाए रखा। इसी तरह, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 23 वर्षीय समीक्षा की उसके ही ‘लिव-इन’ पार्टनर सतीश ने चाकू मारकर हत्या कर दी। एक अन्य घटना छिंदवाड़ा में हुई, जहाँ ममता नामक महिला की उसके ‘लिव-इन’ पार्टनर जुंगी ने निर्मम हत्या कर दी थी।

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इन घटनाओं से पता चलता है कि ‘लिव-इन’ संबंधों में भी भावनात्मक अस्थिरता, अधिकारों की अस्पष्टता और हिंसा की संभावना बनी रहती है। विवाह में पारिवारिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ तनाव पैदा कर सकती हैं, जबकि ‘लिव-इन’ में कानूनी अस्पष्टता और सामाजिक अस्वीकृति असुरक्षा को बढ़ा सकती है। जाहिर है, ‘लिव-इन’ भी विवाह की समस्याओं का समाधान नहीं हैं, बल्कि वे केवल एक अलग रूप में उन्हीं चुनौतियों को प्रस्तुत करते हैं। हाल के वर्षों में इन दोनों व्यवस्थाओं की असफलता और अप्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। 

विवाह, जो कभी सामाजिक स्थिरता और पारिवारिक संरचना का आधार माना जाता था, अब कई लोगों के लिए एक बंधन बन गया है। पारिवारिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ और व्यक्तिगत असंतोष विवाह को तनावपूर्ण बना देते हैं। तलाक की बढ़ती दरें और विवाह में होने वाली हिंसा इस संस्था की असफलता को उजागर करती हैं। मेरठ और इंदौर की घटनाएँ दर्शाती हैं कि विवाह में बढ़ते अविश्वास और बाहरी संबंधों के कारण हिंसा तक की नौबत आ सकती है। 

दूसरी ओर, ‘लिव-इन’ संबंधों को विवाह का स्वतंत्र और प्रगतिशील विकल्प माना गया, लेकिन यह भी विवाह की समस्याओं से मुक्त नहीं रहा। श्रद्धा वालकर की हत्या जैसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि ‘लिव-इन’ संबंधों में भी भावनात्मक अस्थिरता, अधिकारों की अस्पष्टता और हिंसा की संभावना बनी रहती है। कानूनी सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कमी के कारण ‘लिव-इन’ संबंधों में असुरक्षा बढ़ती जा रही है। 

विवाह और ‘लिव-इन’ संबंधों की असफलता ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या दो व्यक्तियों का आजीवन साथ रहने का संकल्प उचित भी है? पारंपरिक विवाह सामाजिक स्थिरता और पारिवारिक संरचना को बनाए रखने के लिए विकसित हुआ था, जबकि ‘लिव-इन’ संबंधों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता का प्रतीक माना गया। लेकिन दोनों ही व्यवस्थाएँ भावनात्मक अस्थिरता, अधिकारों की अस्पष्टता और हिंसा से मुक्त नहीं रह सकीं।  समाधान की दिशा में कुछ संभावित विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। विवाह या ‘लिव-इन’ को स्थायी बंधन मानने के बजाय, इसे एक समझौते के रूप में देखा जाए, जहाँ दोनों पक्षों को स्वतंत्रता और सम्मान मिले। इसके अलावा, विवाह और ‘लिव-इन’ संबंधों में कानूनी सुरक्षा और अधिकारों की स्पष्टता बढ़ाई जाए, ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा या असुरक्षा को रोका जा सके। विवाह और ‘लिव-इन’ संबंधों की असफलता को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि समाज संबंध के नए मॉडल की खोज करे, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षा को प्राथमिकता दे। (सप्रेस)

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