बचपन की यादें समेटती पुस्तक : लौटा मन अतीत की ओर

सुरेश उपाध्‍याय

लौटा मन अतीत की ओर’ डा. भोलेश्वर दुबे का वन अलाइन पब्लिकेशन, दिल्ली से प्रकाशित अपनी जन्मस्थली ‘सीतामऊ’ की स्मृतियों पर आधारित आलेख संकलन है। सत्तर के दशक की स्मृतियों को डा. दुबे ने 13 खंडों के माध्यम से सीतामऊ के इतिहास, भूगोल, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन के विभिन्न पक्षों को रखने की कोशिश की है। कस्बाई इस शहर के लोकजीवन में व्याप्त सद्भाव, सौहार्द, सहयोग, प्रेम, मिलनसारिता जैसे विशिष्ठ जीवन मूल्यों को रेखांकित किया गया है।

शहरी बसाहट, व्यापार – व्यवसाय, कृषि, शिक्षण संस्थाओं, जनजीवन में साठ वर्षों में आए बदलाव तथा उन पर वैश्विकरण व बाजारीकरण के प्रभावों को भी दर्शाया गया है। डा. दुबे ने छोटी -छोटी बातों को अपनी स्मृति में संजोकर खूबसूरती व रोचकता से प्रस्तुत किया है। उनके सूक्ष्म प्रेक्षण (आबजर्वेशन) व स्मृति से आलोकित यह पुस्तक लोकजीवन व लोकसंस्कृति से गहरा परिचय कराती है। राजपरिवार से लेकर सामान्यजन के विचार, व्यवहार की झलक को इसमें देखा जा सकता है। राजपरिवार का स्थानीय नागरिकों से जुडाव, उनसे आत्मीयता के रिश्तों का वर्णन है तो पनघट पर पनिहारिनों के सुख-दुख के दृश्‍य भी है। कस्बे के हीर – रांझा / रोमियो – जूलियट के किस्से हैं तो एक छोटे व सुविधाहीन कस्बे से विभिन्न क्षेत्रों में शहर को गौरवान्वित  करती हस्तियों का उल्लेख भी है।

अपने छात्र जीवन में शहर के गौरव श्रीराम विद्यालय के बरक्स निजी / नैगमिक विद्यालयों की बाढ़ का उल्लेख है तो अपने विद्यालय की वर्तमान स्थिति को लेकर स्वाभाविक चिंताएं भी है। परम्परागत व्यवसाय यथा सुतारी, कुम्हारी, लुहारी, भाड आदि के विलुप्त होने तथा उनसे जुडे परिवारों के रोजगार के संकट हैं तो बर्तन, कपडा, किराना, दवाई, रेस्टोरेंट/ होटल आदि व्यवसायों के विस्तार तथा माल संस्कृति के प्रभाव का वर्णन भी हैं।

यह पुस्तक बताती है कि सीतामऊ की ख्याति ‘लघु काशी’ के रुप में रही है तथा अध्ययन – अध्यापन की समृद्ध परम्परा रही है। इस परम्परा का जीवंत प्रतीक “नटनागर शोध संस्थान’ आज भी एक धरोहर की तरह मौजूद है, जिसकी स्थापना में सीतामऊ रियासत के राजपरिवार के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डा. रघुवीर सिन्हा की इच्छाशक्ति व योगदान से सभी परिचित हैं। इतिहास के शोध के इस उत्कृष्ट संस्थान का उल्लेख होते ही, सीतामऊ व डा. रघुवीर सिन्हा का स्मरण स्वाभाविक रुप से आता है।

सीतामऊ से जुडे सुप्रसिद्ध फिल्म संगीत निर्देशक श्री सज्जाद हुसैन की अपने ताऊजी के आवास पर अनौपचारिक संगीत महफिल में गांव के लोगों की उपस्थिति तथा मेंडोलिन वादन का देर रात तक रस्सावादन का सरस वर्णन आकृष्ट करता है।

इस पुस्तक से गुजरते हुए हमें अपने पैतृक या ननिहाल पक्ष के गांव – कस्बों की याद स्वाभविक रुप से आती है। एक चलचित्र की तरह वह समय, उस समय के लोगों के जीवन संघर्ष, पर्वो / त्यौहारों / मेलों के उल्लास, चलित सिनेमा, नौटंकी, कथा, भजन, गंगा-जमनी तहजीब के संस्कार, सुख-दुख में सहभागिता के दृश्‍य एक साथ हमारे स्मृति पटल पर उभर आते हैं, बेतरतीब शहरीकरण व तथाकथित आधुनिक विकास के प्रभावों से कुछ जीवन मूल्यों में आए बदलाव को लेकर लेखक की चिंताएं भी स्पष्ट दिखाई देती है। नदी, तालाब, कुओं, बावडी आदि परम्परागत जलस्त्रोतों तथा घटते वनों को लेकर लेखक की स्वाभाविक चिंताएं हैं तो इनके संरक्षण, संवर्द्धन व पुनर्जीवन की आवश्यकता भी रेखांकित की गई है।

परम्परा व आधुनिकता का इसमे द्वंद नहीं है। परम्परा में जो श्रेष्ठ है, उनका निर्वाह आधुनिक जीवन शैली में भी हो, ऐसी आकांक्षा लेखक की दिखाई देती है।

लोकजीवन, लोकसंस्कृति को चित्रित करती इस पुस्तक में लोकोक्तियों, मुहावरों, लोकगीत, लोकसंगीत, लोकनृत्य आदि से भी परिचय कराने की पहल की गई है। भाषाओं व बोलियों के विलुप्तीकरण के दौर में लेखक की चिंताएं मालवी बोली व भाषा के लिए स्पष्ट दिखाई देती है। अपने परिवार में मालवी बोली का उपयोग करने का आव्हान करते हुए लेखक क्षेत्रीय स्तर पर मालवी बोली के स्वरुप परिवर्तन का उल्लेख करते है।

सीतामऊ की मीठी बोली का उल्लेख ‘हितामू की मीठी मालवी’ में प्रभावी तरीके से करते हुए ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ में देखा जा सकता है। मालवी शिक्षण के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को ‘सीतामऊ में प्रचलित मालवी शब्द’ तथा ‘कुछ प्रचलित कहावतें’ वाले खंड में देखा जा सकता है, पाठकों की सुविधा के लिए लेखक ने उनके अर्थ स्पष्ट करने के भी प्रयास किए हैं। विशिष्ठ व्यक्तियों व स्थलों के रंगीन फोटोचित्र का भी उपयोग लेखक ने पुस्तक में किया है।

डा. भोलेश्वर दुबे के आलेख संकलन “लौटा मन अतीत की ओर” को स्मृति के आलोक में लोकजीवन व लोकसंस्कृति से परिचय की पहल की तरह देखा जा सकता है। इस क्षेत्र में रुचिवान विद्यार्थियों / शोधार्थियों के लिए यह एक संदर्भ पुस्तक हो सकती है और अपनी जन्मभूमि से आने वाली पीढी को परिचित करने के आकांक्षियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हो सकती है।

इस संकलन का स्वागत करते हुए डा. भोलेश्वर दुबे को बधाई देता हूँ तथा पाठकों को लोकसंस्कृति, लोकजीवन व मालवी भाषा के प्रति आकृष्ट करने में यह पुस्तक सहयोगी होगी, ऐसा विश्वास करता हूँ।

Table of Contents

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके

Read More »

पर्यावरण संरक्षण : केवल पौधारोपण नहीं, जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास

Read More »

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित

Read More »