विकास की दौड़ में हरियाली की पुकार : जंगल बचेंगे तभी जीवन बचेगा

संध्या राजपुरोहित

तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास की इस दौड़ में एक ऐसी आवाज़ है जिसे बार-बार अनसुना किया जाता है—जंगलों की। ये जंगल, जो सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं बल्कि जीवन का आधार हैं, हर दिन विकास की कीमत चुका रहे हैं। क्या सचमुच हम आगे बढ़ रहे हैं, या फिर अपने ही भविष्य की जड़ें काट रहे हैं?

संध्या राजपुरोहित

22 April, World Earth Day

हर साल 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है — यह एक ऐसा दिन है जब पूरी दुनिया मिलकर धरती के प्रति अपने कर्तव्यों को याद करती है। यह सिर्फ एक दिवस नहीं बल्कि प्रकृति से जुड़ने, उसे समझने और बचाने का एक संकल्प है। इस अवसर पर यदि किसी  की भूमिका सबसे अहम मानी   जाए, तो वह है हमारे जंगल- हमारे पेड़।

आज का युग प्रगति और विकास का है। हर देश, हर समाज और हर व्यक्ति आधुनिकता की ओर अग्रसर है। विज्ञान और तकनीक की दुनिया ने हमारे जीवन को पहले से अधिक सुविधाजनक और सक्षम बना दिया है। लेकिन इस तेज़ रफ्तार विकास की दौड़ में हम कुछ बहुत महत्वपूर्ण पीछे छोड़ते जा रहे हैं—हमारी प्रकृति, हमारे पेड़ , हमारे जंगल। जो जंगल कभी हमारी सभ्यता का आधार हुआ करते थे, वे आज विकास के नाम पर नष्ट किए जा रहे हैं। यह आलेख उन्हीं जंगलों की व्यथा को स्वर देने का एक प्रयास है, जो हर दिन, हर क्षण विकास की बलि चढ़ रहे हैं।

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पृथ्वी का फेफड़े  हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर के शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, जलवायु को संतुलित रखते हैं, मिट्टी के क्षरण को रोकते हैं, जल स्रोतों को पोषित करते हैं और लाखों जीवों को आवास देते हैं।  जंगलों का महत्त्व केवल हरियाली तक सीमित नहीं है। ये पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। वे न केवल हमें शुद्ध वायु प्रदान करते हैं, बल्कि लाखों प्रजातियों के लिए आवास, नदियों के स्रोतों की रक्षा और जलवायु नियंत्रण में भी सहायक होते हैं। हमारे देश भारत में, जहाँ प्रकृति को सदैव देवी-देवताओं का रूप माना गया है, वहाँ जंगल केवल पर्यावरणीय संसाधन नहीं, अपितु सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी रखते हैं। ‘अरण्यक’, ‘वनवास’, ‘वन देवता’ जैसे शब्द हमारी सांस्कृतिक स्मृति में आज भी जीवित हैं।

See also  Climate change : आग से जूझते जंगल

विकास की परिभाषा जब हम आधुनिक संदर्भ में देखते हैं, तो उसमें आधारभूत ढाँचे का विस्तार, औद्योगीकरण, शहरीकरण और आर्थिक वृद्धि जैसे संकेतक शामिल होते हैं। लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह विकास एकतरफा है? क्या यह विकास प्रकृति को दरकिनार कर के ही संभव है? जब एक सड़क या बाँध के लिए हजारों पेड़ काटे जाते हैं, जब खनन के लिए घने जंगलों को नष्ट कर दिया जाता है, तब क्या वास्तव में हम आगे बढ़ रहे हैं, या खुद के ही भविष्य को खोखला कर रहे हैं?

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, विश्व में हर वर्ष लगभग एक करोड़ हेक्टेयर जंगल समाप्त हो जाते हैं। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। वन क्षेत्र बढ़ने के जो दावे किए जाते हैं, वे अकसर शहरी वृक्षारोपण या झाड़ियों को शामिल करके किए जाते हैं, न कि जैवविविधता से परिपूर्ण प्राकृतिक वनों को आधार बनाकर। दरअसल, विकास की आड़ में जंगलों का विनाश एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है।

भारत जैसे विकासशील देश में औद्योगीकरण एक बड़ी आवश्यकता है। लेकिन खनन, निर्माण, परिवहन और ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर जो वनों की कटाई हो रही है, वह असंतुलित विकास की ओर संकेत करती है। जंगलों के स्थान पर जब नई रिहायशी कॉलोनियाँ, सड़कें या फैक्ट्रियाँ बनाई जाती हैं, तो यह सोचा ही नहीं जाता कि हम क्या खो रहे हैं। यह केवल हरियाली नहीं, बल्कि जीवन के अनेक रूप हैं जो नष्ट हो जाते हैं—प्रकृति के संतुलन से लेकर जैव विविधता तक।

वनों की कटाई का प्रभाव बहुआयामी होता है। सबसे पहले इसका सीधा प्रभाव जलवायु पर पड़ता है। जंगल वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर के ग्लोबल वॉर्मिंग को नियंत्रित करते हैं। जब पेड़ काटे जाते हैं, तो वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है और पृथ्वी का तापमान तेज़ी से बढ़ता है। इसका परिणाम जलवायु परिवर्तन, असमय वर्षा, सूखा और बाढ़ के रूप में सामने आता है।

जंगलों की अनुपस्थिति से वर्षा चक्र प्रभावित होता है। पेड़ वाष्पोत्सर्जन द्वारा बादलों के निर्माण में सहायक होते हैं, और जलवायु को नम रखते हैं। जब जंगल समाप्त हो जाते हैं, तो वर्षा की मात्रा कम हो जाती है या असंतुलित हो जाती है। इससे कृषि प्रभावित होती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

See also  पर्यावरण और स्वास्थ्य की राह : क्यों जरूरी है वनस्पति-आधारित आहार?

जंगल जैव विविधता के सबसे बड़े केंद्र होते हैं। लाखों जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ जंगलों में निवास करती हैं। जब जंगल कटते हैं, तो उनके प्राकृतिक आवास समाप्त हो जाते हैं। इससे कई प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच जाती हैं। यह केवल पशु-पक्षियों का नुकसान नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की क्षति है, जिसका प्रभाव अंततः मानव जीवन पर ही पड़ता है।

वनों की कटाई का सबसे अधिक असर उन समुदायों पर होता है जो सदियों से जंगलों में रहते आए हैं—आदिवासी और वनवासी। उनका जीवन, उनकी संस्कृति, उनकी आस्था और आजीविका सब कुछ जंगलों पर निर्भर होती है। जब जंगल उजड़ते हैं, तो ये समुदाय न केवल अपना घर खो देते हैं, बल्कि उनकी अस्मिता और पहचान पर भी संकट आ जाता है। विस्थापन और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

भारत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों का भारी नुकसान हुआ है। मुंबई की आरे कॉलोनी में मेट्रो कारशेड के लिए हज़ारों पेड़ों की कटाई की गई, जिसका स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने विरोध किया। उत्तराखंड में चारधाम परियोजना के अंतर्गत सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए, जिससे भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ गईं। छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे खनिज संपन्न राज्यों में खनन के कारण जंगल और वहाँ रहने वाले समुदाय संकट में हैं।

इन सबके बीच एक सवाल उठता है—क्या विकास और पर्यावरण का संतुलन संभव है? इसका उत्तर है—हां, यदि हम सतत विकास की ओर बढ़ें। सतत विकास का अर्थ है—ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों से समझौता न करे। इसके लिए हमें विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव का उचित मूल्यांकन करना होगा। निर्माण कार्यों से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जंगलों की क्षति न्यूनतम हो और जितनी क्षति हो, उसकी भरपाई वृक्षारोपण और पुनर्वनीकरण द्वारा की जाए।साथ ही, वनों की सुरक्षा में स्थानीय समुदायों की भूमिका को भी सशक्त करना होगा। आदिवासी और ग्रामीण समाज जंगलों के सबसे अच्छे संरक्षक होते हैं, क्योंकि उनका जीवन उससे जुड़ा होता है। जब उन्हें निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाएगा, तो संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी होंगे।

See also  पर्यावरण : ‘कैम्पा’ से रोकी जा सकती है, वनों की कटाई

तकनीकी विकास का उपयोग भी जंगलों की निगरानी और संरक्षण में किया जा सकता है। सैटेलाइट इमेजिंग, ड्रोन सर्वेक्षण और GIS तकनीकों के माध्यम से जंगलों की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है, अवैध कटाई रोकी जा सकती है, और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर के वहां विशेष संरक्षण उपाय अपनाए जा सकते हैं।

सरकारों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, उनका प्रभावी क्रियान्वयन और जन-जागरूकता भी आवश्यक है। इसके साथ-साथ नागरिकों की जिम्मेदारी भी बनती है कि वे प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें। पेड़ लगाना, प्लास्टिक का कम प्रयोग, पानी की बचत, जैविक उत्पादों का उपयोग और स्थानीय संसाधनों को प्राथमिकता देना—ये छोटे-छोटे कदम भी बड़ा असर डाल सकते हैं।

अंतत:  कहा जा सकता है कि विकास की दौड़ में अगर हमने जंगलों को पूरी तरह खो दिया, तो यह प्रगति नहीं, विनाश का संकेत होगा। जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, जीवन के आधार हैं। वे हमारे अस्तित्व का मूल हैं। यदि हमें अपने भविष्य को सुरक्षित रखना है, तो जंगलों की रक्षा करना अनिवार्य है। जंगल बचेंगे, तभी जीवन बचेगा। और जब जीवन बचेगा, तभी विकास का कोई अर्थ होगा।

पृथ्वी एक सुंदर ग्रह है, लेकिन इसकी सुंदरता तभी तक है जब तक यह हरी-भरी है। पेड़ न केवल पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखते हैं, बल्कि हमारे अस्तित्व की डोर भी थामे हुए हैं। अगर हम सच में पृथ्वी से प्रेम करते हैं, तो हमें पेड़ों से भी प्रेम करना होगा — उन्हें लगाना, सहेजना और उनकी रक्षा करना होगी। क्योंकि जब तक जंगल जिंदा हैं, तब तक जीवन की साँसे चलती हैं। जंगल विकास में बाधा नहीं, बल्कि सहायक हैं। यदि हमने आज चेतना नहीं दिखाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ न तो स्वच्छ वायु में साँस ले पाएंगी, न ही हरियाली देख पाएंगी। विकास तभी सार्थक है जब वह जीवन को बेहतर बनाए, न कि उसे संकट में डाले। विकास की दौड़ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जंगलों का होना ही जीवन का होना है। पेड़ कटने की गिनती यदि प्रगति बन जाए, तो यह हमारे समय की सबसे दुखद विडंबना होगी। इसलिए आज समय है एक सामूहिक निर्णय का—जहाँ हम कहें: “विकास चाहिए, लेकिन जंगलों की कीमत पर नहीं।”

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »