चुनावी राजनीति असंभव संभावनाओं का अनोखा खेल है!

प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

जंगल की कटाई की जगह वृक्ष-रोपड़ संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा हो। उनकी देखरेख की संस्कृति हमारे जीवन की संस्कृति बने। यह तभी होगा जब हमारी विश्वास की सघनता बढ़ेगी इस प्रकृति से, जल से और हमारे जलवायु से। यह तभी होगा जब हम अपनी नवोदित पीढ़ी में भी प्रकृति से प्रेम करने का बीज अंकुरित कर सकेंगे। ऐसा करने पर, एक अहिंसक सुखद यात्रा का मनुष्य तभी भागीदार बन सकेगा जब हमारे जीवन में हमारे जीवन के संबल होंगे।

इन्दौर लोकसभा क्षेत्र में नोटा का सवाल 2024 की चुनावी राजनीति में सबसे बड़ा बवाल बन गया है! चुनाव पूर्व किसी भी मतदाता या चुनावी राजनैतिक विश्लेषक या व्याख्याकार के मन के किसी कोने में भी यह सवाल नहीं था कि इन्दौर में नोटा इतना चर्चित हो जावेगा या नोटा में इतनी बड़ी प्रतिरोध क्षमता छिपी हुई है। चुनाव की शुरुआत मे हम सबके मन के किसी भी कोने में सुप्तावस्था में भी नोटा की हलचल या चर्चा भी मौजूद नहीं थी।

कांग्रेस प्रत्याशी द्वारा छुपकर अंतिम क्षण में अपने दल को बिना बताये नामांकन पत्र वापस ले लेना और सत्तारूढ दल में शामिल होने के चौंकाने वाले घटना क्रम के पश्चात जब कांग्रेस ने किसी अन्य दल या निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन देने के बजाय नोटा को समर्थन देने की घोषणा की साथ ही इंडिया गठबंधन से जुड़े राजनैतिक दलों के साथ कुछ आम मतदाताओं ने भी नोटा को अपनाने का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन जाहिर किया । तब से इन्दौर लोकसभा क्षेत्र की चुनावी राजनीति में नोटा के पक्ष-विपक्ष में राजनैतिक दलों में व्यापक चर्चा और मत मतान्तर इन्दौर लोकसभा क्षेत्र के साथ ही राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता सहित आम मतदाताओं में भी नोटा को विकल्प कहे जाने से व्यक्तिश: और सामूहिक रूप से राजनैतिक हलचल पक्ष-विपक्ष दोनों समूहों में में तेज होने लगी। यदि कांग्रेस का प्रत्याशी राजनैतिक दबाव में आकर अपना नामांकन वापस नहीं लेता और सतारूढ़ दल में शामिल होकर दल-बदल नहीं करता तो नोटा की इन्दौर लोकसभा क्षेत्र के मतपत्र में उपस्थिति तो होती पर नोटा की जनचर्चा जिस तरह आज हो रही है वैसे नहीं होकर सामान्य रूप से मतपत्र में अंतिम स्थान पर उसी तरह उपस्थिति होती जैसे देश के सभी लोकसभा क्षेत्र के मतपत्र में अंतिम स्थान पर नोटा मौजूद हैं।

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इन्दौर लोकसभा क्षेत्र में अलोकतांत्रिक परिस्थिति वश कांग्रेस का प्रत्याशी न होने से नोटा की विशेष स्थिति बनना और व्यापक रूप से राजनैतिक चर्चा होने का मुख्य कारण है। 13 मई को मतदान के पश्चात इन्दौर लोकसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम में विजेता उम्मीदवार और निकटतम प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी चाहे वह किसी राजनैतिक दल या निर्दलीय प्रत्याशी हो को इन्दौर लोकसभा क्षेत्र में कितने मत मिलेंगे इसका कोई आकलन या चर्चा ही नहीं हो रही है इसके उलट विजेता उम्मीदवार से भी ज्यादा नोटा जो इन्दौर लोकसभा क्षेत्र में उम्मीदवार न होकर इन्दौर लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं कि प्रतिरोध की अभिव्यक्ति का प्रतीक है को मिलने वाले मतों की संख्या से कई गुना ज्यादा इस बात की चर्चा हो रही है कि नोटा को कितने मत प्राप्त होगे?

आम जनता सहित सारे राजनैतिक पंडित और सरकारी, असरकारी और दरबारी व्याख्याकार इस सवाल को लेकर आपस में उलझ गए हैं कि इन्दौर लोकसभा क्षेत्र में आखिर नोटा को कितने मत मिलेंगे। भारतीय चुनाव के इतिहास में इससे पहले ऐसा प्रसंग चुनावी विश्लेषण के लिए उपस्थित ही नहीं हुआ था । यह पहला मौका है जिसमें नोटा का चुनावी गणित किसी को इस रूप में हल करना होगा यह किसी ने सोचा ही नहीं था। चुनावी राजनीति असंभव संभावना का अनोखा खेल है।

इन्दौर लोकसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम में कौन विजेता होगा? इस पर किसी भी मतदाता और राजनैतिक व्याख्याकार के मन में कोई जिज्ञासा, संशय या सवाल ही नहीं है पर नोटा किस संख्या तक मतसंख्या के रूप में पहुंचेगा इस सवाल पर ही हर कोई गुत्थमगुत्था है।इस अनोखे अंदाज में नोटा एक राजनैतिक सवाल से ज्यादा राजनैतिक बवाल के रूप में खड़ा हो गया है। नोटा को लेकर कोई भी भाष्यकार आत्मविश्वास के साथ कहने की या निश्चित संख्या का अनुमान बताने की स्थिति में नहीं है। इन्दौर लोकसभा क्षेत्र का चुनावी धमासान इस मायने में भी अनोखा है कि विजेता का निकटतम प्रतिद्वंद्वी जो निराकार है और विपक्षी दल भी नहीं है से मुकाबला हो रहा है ।

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इन्दौर लोकसभा क्षेत्र में नोटा निराकार ब्रह्म की तरह उपस्थित हैं। इन्दौर लोकसभा क्षेत्र के मतपत्र में नोटा न तो निर्वाचन में खड़ा प्रत्याशी हैं न ही नोटा की उपस्थिति को नकारा जा सकता है, न नोटा को पराजित किया जा सकता है और न ही नोटा से जीता जा सकता है। नोटा को न तो किसी राजनैतिक दल ने अपना प्रत्याशी घोषित किया है और नहीं नोटा ने लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया है, तो नोटा की जांच का भी कोई सवाल ही नहीं खड़ा हो सकता है। नोटा को न तो जमानत राशि जमा करना है और न ही नामांकन पत्र दाखिल करना है। नोटा मतपत्र में बिना किसी औपचारिक कार्यवाही के सनातन रूप से मौजूद हैं नोटा को न कोई खरीद सकता है, न नोटा भयभीत हो नामांकन खुलेआम या छिपकर वापस ले सकता है। नोटा को कोई दल भी अपने दल में शामिल भी नहीं कर सकता है।

मतपत्र में नोटा की उपस्थिति सनातन है। नोटा को कोई नकार नहीं सकता पर नोटा सभी उम्मीदवारों को नकारने के लिए ही जन्मा है। नोटा न तो किसी राजनैतिक दल विशेष का प्रत्याशी हैं और नहीं किसी राजनैतिक दल से नोटा का जुड़ाव है। नोटा को न तो कोई पराजित कर सकता है और नहीं नोटा किसी निर्वाचन में विजेता हो सकता है। नोटा की न तो ज़मानत जप्त हो सकती है और न ही नोटा की उपस्थिति पर कोई सवाल उठाया जा सकता हैऔर नहीं नोटा को चुनाव में कुछ खर्च करना है और नहीं चुनाव समाप्त हो जाने पर कोई हिसाब किताब या औपचारिक कार्यवाही सम्पन्न करना है।

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नोटा मतदाता का सर्वशक्तिमान विशेषाधिकार है जिसे कोई राजनैतिक जमात का उम्मीदवार और निर्दलीय प्रत्याशी नकार नहीं सकता। नोटा सबको नकार सकता है पर नोटा को कोई भी नकार नहीं सकता। सबको नोटा की उपस्थिति में ही चुनावी धमासान में भागीदारी करना है। यही नोटा की संवैधानिक ताकत है जो मतदाताओं को विशेषाधिकार से सम्पन्न नागरिक चेतना से ओतप्रोत निर्भीक नागरिक का दर्जा प्रदान करता है ।यह अपने आप में भारतीय मतदाता की विवेकशीलता की अनोखी ताकत है जिसे कोई भी किसी भी परिस्थिति में छीन नहीं सकता है।

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