2014 के बाद का भारत : संकट में गणतंत्र

76 वें स्‍वतंत्रता दिवस पर विशेष

रघुराज सिंह

आजादी के लगभग साढे़ सात दशकों बाद यह सीधा, सरल और सहज सवाल तो उठता ही है कि आखिर इतने सालों में हमने क्या हासिल किया? हम कहां पहुंचे? इस सवाल का कई लोगों ने, कई तरह से जबाव दिया है। इसमें एक जबाव देश के ख्यातनाम अर्थशास्त्री डॉ. परकला प्रभाकर ने अपनी किताब ‘द क्रुकेड टिम्बर आफ न्यू इण्डिया, एसेज ऑन ए रिपब्लिक इन क्राईसिस’ की मार्फत दिया है। प्रस्तुत है, इसी किताब पर टिप्पणी करता रघुराज सिंह का ‘स्वतंत्रता दिवस’ के मौके पर यह विशेष लेख।

हाल के दिनों में प्रकाशित अर्थशास्त्री डॉ. परकला प्रभाकर Parakala Prabhakar की किताब ‘द क्रुकेड टिम्बर आफ न्यू इण्डिया, एसेज ऑन ए रिपब्लिक इन क्राईसिस’ वर्ष 2014 से 2022 के दौर में आए महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को अपने में समेटे है। यह वक्ती इतिहास का वह हिस्सा है जिसमें सरकार की सक्रियता बेहद गतिमान रही है। इस सक्रियता में कॉमा, फुलस्टाप, ब्रेकेट आदि नहीं हैं, केवल इनवरटेड कोमा और विस्मयबोधक चिह्नों की ही भरमार है। पहले पृष्ठ पर, जहाँ अमूमन लेखक किताब समर्पित करते हैं, जर्मन दार्शनिक एमानुएल कांट का एक वाक्य दर्ज है जिसका हिन्दी तर्जुमा कुछ इस तरह है–‘मानवता की टेढ़ी लकड़ी से कभी कोई सीधी चीज नहीं बनी।’ ग्यारह शब्दों का यह वाक्य बताने के लिए पर्याप्त है कि किताब के भीतर क्या है।

आजादी के 67 साल बाद शुरू हुआ यह वह दौर है जिसमें नई शैली के प्रजातंत्र, संविधान की मनमाफिक व्याख्या, संवैधानिक संस्थाओं के अवमूल्यन, श्रेष्ठतम शिक्षण संस्थानों को उजाड़ने, धार्मिक बहुसंख्यकवाद के दबाव, नए आकल्पित राष्ट्रवाद की गूंज, असहमति के नए अर्थ, मीडिया का ‘गोदी मीडिया’ में रूपान्तरण, सीबीआई, ईड़ी और आईटी के राजनीतिक उपयोग जैसे सफल नवाचारों को जगह मिली है। यही वह दौर है जिसमें देश के श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों और छात्र नेताओं को लंबे समय तक जेलों में रखने, दिल्ली की देहरी पर बैठे लाखों किसानों को थका देने वाले आन्दोलन में धकेलने और कोविड महामारी से न निपट पाने जैसी सरकारी उपलब्धियाँ भी रही हैं। उपरोक्त सभी का विस्तृत ब्यौरा ‘टेढ़ी लकड़ी’ से समाधान के रूप में इस किताब में दर्ज है।

परकला ने इसे बहुत प्रामाणिक और विश्वसनीय सबूतों के साथ लिपिबद्ध किया है। यह वक्त का वह फौरी इतिहास है जिसे लिखना असंभव तो नहीं है, लेकिन उन्होंने लिखने के लिए जो समय चुना है वह कठिन से भी आगे का है। इन निबन्धों को लिखने और एक किताब के रूप में देश के सामने रखने के लिए जिस साहस की जरूरत है, वह डॉ. परकला में कुछ ज्यादा ही है। बीसियों साल बाद जब इतिहासकार इस दौर (2014-2024) पर शोध करेंगे तो यह किताब आधारभूत दस्तावेज होगी।

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किताब उस भाषण से आगे बढ़ती है, जब वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से पहली-पहली बार देश से मुखातिब हुए थे। पहले संबोधन में प्रधानमंत्री ने सभी को साथ लेकर चलने, कड़ी मेहनत और आम सहमति से सुशासन देने का संकल्प लिया था। लोकसभा में भी अपने पहले संबोधन में उन्होंने अपनी पार्टी की जीत को नई उम्मीद बताया था और इसे गरीबों और वंचितों को समर्पित किया था। आठ सालों में ही ये सभी वादे धोखे में तब्दील हो गए। नरेन्द्र मोदी ने दो भारी-भरकम राष्ट्रीय और कई राज्यस्तरीय जनादेश वृथा गंवा दिए। भाजपा समर्थकों को यकीन था कि पार्टी, सरकार और उनका शिखर पुरूष देश में एक नए जमाने की शुरूआत कर रहे हैं। उनके लिए अब यह एक नया भारत था, जो विश्व गुरू था, लेकिन भारत तो असल में एक गहरे संकट का मुकाबला कर रहा है। हमारी राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था टूट गई है और उसके निशान चारों ओर बिखरे पडे हैं।

डॉ. परकला कहते हैं, मैं हमारे प्रधानमंत्रियों द्वारा स्वतंत्रता दिवस के संबोधनों को सुनना कभी नहीं भूलता। रविवार, 15 अगस्त 2021 के नरेन्द्र मोदी के संबोधन का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि मोदी बहुत सक्षम ‘कम्युनिकेटर’ हैं, वे अपने भाषणों की सटीक संदेश के साथ जमावट करते हैं जिसे वे व्यक्त करना चाहते हैं और बेहतर असर के लिए सैद्धान्तिक उपकरणों का उपयोग भी करते हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं वह पहले से ही एक उद्देश्य के साथ योजनाबद्ध होता है। असल में सबसे महत्वपूर्ण सालाना भाषण में प्रधानमंत्री क्या कहते हैं, इसको सावधानीपूर्वक समझना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकार के पास देश के लिए क्या है।

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डॉ. परकला दूर तक देखने और भेदने वाली दृष्टि से भाजपा के चाल-चलन और समर्थन का ऐसा चित्र उकेरते हैं जो वास्तविक है और सीधे-सीधे पाठकों पर असर डालता है। इसी पृष्ठभूमि में किताब में संकलित निबन्धों ने आकार लिया है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि बहुसंख्यक शासन के लिए प्रतिबद्ध यह दल ऐसी स्थिति में है जहाँ यह हमारे संविधान के बुनियादी मूल्यों को नष्ट कर सकता है। उसे लगता है कि लगभग 150 करोड़ लोगों का यह देश उसकी निजी सम्पत्ति है।

यह बात विवाद से परे है कि भाजपा देश में प्रमुख राजनीतिक ताकत बन गई है। वह अब चुनावी रथ है। अपनी गंभीर विफलताओं के बावजूद लगातार दो राष्ट्रीय चुनावों और कई राज्यों के चुनावों में इसे निर्णायक वोट मिले हैं। स्वयं के आक्रामक कॉडर के अलावा उसे कई हिन्दू-वर्चस्ववादी संगठनों और संघ परिवार का समर्थन प्राप्त है। जरूरत पड़ने पर समर्थन खरीदने के लिए उसके पास विशाल वित्तीय संसाधन हैं। उस पर संवैधानिक मानदण्डों और लोकतांत्रिक बारीकियों का बोझ नहीं है और उसे झूठ बोलने और धोखा देने से भी कोई गुरेज नहीं है। वह अपने राजनीतिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए राज्य के संसाधनों का उपयोग करने को तैयार है। वह सतह के नीचे तैरते अंधेरे तत्वों को बुलाने और भारत जैसे बहुस्तरीय और विविधता-पूर्ण समाज में निष्क्रिय रहने वाली दुश्मनी और दरारों को पकड़ने में संकोच नहीं करता है।

कोविड महामारी की दूसरी और तीसरी लहर, जिसने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया था, को लेकर भी पचपन पृष्ठों का एक लम्बा अध्याय ‘ए पेण्डेमिक लाग बुक, 2021’ किताब में है। इस अध्याय में बडी मानवीय त्रासदी को नकारने की बारीक और विस्तृत पड़ताल लेखक ने की है। उन्हें लगता है कि हमारे नागरिक समाज का कतिपय प्रभावशाली वर्ग इसमें सरकार के साथ शामिल हो गया था। इस त्रासदी के बारे में सोचना, लिखना और बोलना अपराध करने जैसा लगता था। उन्होंने वेक्सीनेशन के झमेले, 33 करोड़ बच्चों की शिक्षा में हुए नुकसान और नैतिक पक्षाघात से बीमार अहंकारी सरकार को प्रमाण सहित आडे हाथों लिया है। इसी अध्याय में संघ प्रमुख के उस बयान का भी उल्लेख है जिसमें उन्होंने लोगों को सचेत किया था कि भारत विरोधी ताकतें कोविड के हालात का फायदा उठाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश में हैं।

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देश में ऊँची शिक्षा दे रहे विश्वविद्यालय भी उनकी चिन्ता के केन्द्र में हैं और उनकी ओर भी डॉ. परकला ने खासा ध्यान दिया है। तीन निबन्धों के दो तथ्यों की ओर विशेष ध्यान जाता है। प्रथम तो देश के पहले 10 विश्वविद्यालयों में ‘जेएनयू’ (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय), ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’  और ‘एएमयू’  (अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) शामिल हैं। ये वे विश्वविद्यालय हैं जो प्रशासन के निशाने पर रहते हैं और जिन्हें नापसन्द किया जाता है। दूसरा यह कि कार्पोरेट फण्डेड पांच सितारा बोनसाई विश्वविद्यालयों में से एक भी पहले दस में शामिल नहीं है। यह आकलन सरकारी एजेन्सियों ने निर्धारित मापदण्डों के अनुसार किया है।

डॉ. परकला की ‘क्रुकेड टिम्बर ऑफ न्यू इण्डिया’ का वितान व्यापक और बहुआयामी है। इसमें धार्मिक भारत-राजनीतिक भारत, मोदी बनाम मोदी, भाजपा-आरएसएस, भाजपा की जनसंख्या राजनीति, डिजिटल फ्रीडम और डाटा प्रायवेसी, अमृत महोत्सव-आईएमएफ और भारत की पुनर्कल्पना, हिजाब बनाम भगवा स्कार्फ, फादर स्टेनस्वामी की मौत, आक्सफेम की गैर-बराबरी संबंधी रिपोर्ट, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की बिक्री और खेती के तीनों कानूनों की वापसी पर भी निबन्ध हैं। ये जानकारियों से भरपूर सामान्य पाठकों के लिए नए हैं।

डॉ. परकला प्रभाकर की यह किताब केवल आनंदित करने वाली किताब नहीं है, बल्कि सरकार द्वारा लागू नीतियों को उस परिप्रेक्ष्य में बहुत दिलचस्प ढ़ंग से पेश करती है जिसे नागरिकों को जानना चाहिए। कई घटनाओं, जानकारियों और उनका विश्लेषण सार्वजनिक प्रकृति का है। किताब कई तरह से मोदी सरकार के दस सालों का इनसाइक्लोपीड़िया है। इस किताब में शामिल 23 निबन्धों में एक मजबूत पारदर्शी धागा है जो इन्हें आपस में गूंथे है। एक नागरिक के लिए यह एक अनिवार्य पुस्तक है। (सप्रेस)

अर्थशास्त्री डॉ. परकला प्रभाकर ‘जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी’ और ‘लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स’ में पढ़े हैं। उनकी यह पुस्तक ‘स्पीकिंग टाइगर बुक्स’ से प्रकाशित है। 273 पेज की इस पुस्‍तक की कीमत 249 रू. है।

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