आर्थिक विकास : गिरता रुपया, चढ़ता डॉलर

प्रेरणा

‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ (जेएनयू) से अर्थशास्त्र पढीं देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की इस बात में कितना दम है कि रुपए के गिरने की वजह डॉलर का मजबूत होना है? ध्यान से देखें तो उनकी यह टिप्पणी समूचे अर्थतंत्र को उजागर करती है।

देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारामण के हाल के एक बयान ने खलबली मचा दी है। रिकॉर्ड स्तर पर गिरते जा रहे रुपए का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि रुपया कमजोर नहीं हो रहा है, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है। रुपये के गिरने, रसोई गैस, पेट्रोल आदि के दाम बढ़ने, महंगाई के आसमान छूने जैसे मुद्दों पर कांग्रेस की खिल्ली उड़ाकर ही बीजेपी सत्ता में आयी थी। आज मियां की जूती, मियां के सर पड़ रही है।

इस पर दूसरी प्रतिक्रिया आर्थिक विशेषज्ञों की है। वे खुले तौर पर या फिर मजबूरी में बताते हैं कि मुद्रा या करेंसी का व्यापार हमेशा जोड़ी में होता है। यदि डॉलर ऊपर जाएगा तो उसके सामने जो भी मुद्रा होगी, वह नीचे आएगी ही। दुनिया भर की मुद्राएं अपने रिकॉर्ड स्तर पर नीचे जा पहुंची हैं, क्योंकि दुनिया में डॉलर की मांग बढ़ गई है। आलम यह है कि लोग दूसरी मुद्राएं बेच-बेचकर डॉलर खरीद रहे हैं।

डॉलर-रुपए की इस उठा-पटक को देखने का एक और नज़रिया भी है- आम आदमी का नजरिया ! दुनिया का आर्थिक कारोबार इतना जटिल हो गया है कि आम आदमी केवल लल्लू बनकर रह गया है। महंगाई हो, बेरोजगारी हो, शिक्षा हो या स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता हो कि घर का बजट – इनमें से कुछ भी नहीं है जो आम आदमी के क़ाबू में हो। आप कहेंगे : आम आदमी में इतनी काबिलियत है क्या कि वह वैश्विक कारोबार की पेचीदगियां समझ पाए? लेकिन अगर मैं यह पूछूं कि क्या आप आम आदमी मतलब समझते हैं, तो?

यह आम आदमी दुनिया का 95% है! दुनिया का आर्थिक कारोबार यदि मात्र 3 से 5% लोगों की समझ में ही आता है, तो बात खतरनाक बन जाती है और उनके निहित स्वार्थ की बात भी खुल जाती है। जो खेल 3 से 5 फीसदी की मुट्ठी में बंद है तो कहानी ऐसी बन जाती है कि उनका मुनाफा हमारी जेब खाली करके पूरा होता है ! सारी दुनिया के आम लोग उसकी कीमत चुकाते हैं – रोज-रोज चुका रहे हैं।

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महंगा पेट्रोल हो कि फर्टिलाइजर, इलाज हो कि शिक्षा, बेरोज़गारी हो कि विस्थापन – सभी मुनाफा कमाने की उस अंधी, अनैतिक दौड़ पर आधारित लंगड़ी अर्थव्यवस्था की वह क़ीमत है जो दुनिया का हर आम आदमी चुकाता रहता है। दुनिया के सारे विशेषज्ञ सर के बल खड़े हो जाएं तो भी यही दिखेगा कि मुट्ठी भर लोगों के हाथों में, दुनिया के सभी संसाधन – जल, जंगल, ज़मीन, साफ हवा, पैसा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि कैद हो गए हैं। बची अरबों-अरब की दुनिया रोटी के चंद टुकड़ों के लिए लड़ रही है।   

प्राकृतिक ढलानों पर संसार की सारी नदियां बहती हैं। आधुनिक वैश्विक समाज का ढलान प्राकृतिक नहीं है। 3 से 5 फीसदी लोगों ने अपनी सुविधा, अपने मुनाफे के लिए पूंजी के बहाव का रास्ता बनाया है। नहर, बांध, उद्योग या फिर शहरीकरण की तरफ ढलान बना रखा है तो पूंजी भी उधर ही बहेगी। कुछ समर्थ लोगों व सत्ताओं ने मिलीभगत से पूंजी को ऐसे ढलान पर डाल रखा है कि वह उसी तरफ बहे जिधर पहले से ही इफरात है। पूंजी बढ़ती है तो भी लौटती वहीं है जहां से वह चली थी। नतीजे में अमीर ज्यादा अमीर और गरीब ज्यादा गरीब होते जाते हैं।

अब इस रोशनी में हम मुद्रा बाजार को देखें। दुनिया की मुद्राओं का बाजार कितना बड़ा है, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा किसी को नहीं है, क्योंकि इस बाजार पर कोई नियंत्रण नहीं है। ‘दूसरे-विश्वयुद्ध’ के बाद, विजयी राष्ट्रों ने अपने लाभ का हिसाब लगाकर, दुनिया का सारा कारोबार कुल छह मुद्राओं में नियंत्रित कर दिया था, जिन्हें आज ‘रिज़र्व करेंसी’ के नाम से जाना जाता है। मतलब यह कि दो देशों के बीच कोई भी व्यापार केवल इन छह मुद्राओं में हो सकता है।

विश्वयुद्ध से सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे अमरीका ने अपने डॉलर को सबसे आगे रखा। वे तो चाहते ही नहीं थे कि 6 मुद्राओं के इस क्लब में कोई 7 वां दाखिल हो, लेकिन चीन ने उनका दरवाजा तोड़ दिया। उसने अपनी मुद्रा को इस तरह नियंत्रित कर आक्रामक बनाया कि चीन के युआन को 2016 में दुनिया की ‘रिज़र्व करेंसी’ में मान्य करना ही पड़ा। आज एक अनुमान बताता है कि पूरी दुनिया में मुद्रा-बाजार लगभग 7 लाख करोड़ डॉलर का है। अगर यह मुद्रा-बाजार कोई देश होता तो यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था होता! इससे आप यह समझ सकते हैं कि मुद्रा-खेल के नियम पहले से ही कुछ ऐसे बनाए गए हैं कि दुनिया डॉलर के इर्दगिर्द ही घूमती रहे।

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दुनिया की कुल जनसंख्या के कितने फीसदी लोग इस मुद्रा-बाजार में सीधे सक्रिय हैं? इसका कोई अधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन जानकार बताते हैं कि भारत के केवल 3% लोग शेयर बाजार में सक्रिय हैं। दूसरे नंबर पर जापान आता है जहां 6% प्रतिशत लोग शेयर बाजार में सक्रिय हैं। सबसे ऊपर अमेरिका है जहां लगभग 14% लोग शेयर बाजार में ‘सीधे’ सक्रिय हैं। अब हम थोड़ा अंदाजा लगा सकते हैं कि जब शेयर बाजार में इतने कम लोग सक्रिय हैं तो मुद्रा- बाजार में, जो शेयर मार्केट से कहीं ज्यादा जटिल संरचना है, में दुनिया के कितने प्रतिशत लोग सीधे सक्रिय होंगे? बहुराष्ट्रीय कंपनियां, आयात-निर्यात के काम में लगे उद्योग, बैंकें, सरकारें, म्युचुअल-फंड आदि में दुनिया के गिने-चुने अमीर लोग ही सक्रिय होते हैं।

अब हम रुपये की तरफ लौटते हैं। जब से यूक्रेन-रूस युद्ध शुरू हुआ है, यूरोप की मंदी और गहरी हो गई है। अपनी ही नीतियों के चक्रव्यूह में फ़ंसकर अमेरिकी और चीनी अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है। इन सबको जोड़ दें तो अनुमान है कि पूरी दुनिया की लगभग 60% अर्थ-व्यवस्था आज मंदी की चपेट में है या जल्दी ही आ जाएगी। ऐसे हाल में दुनिया के पूंजीपति अपनी कमाई करने कहां जाएंगे? वहीं न, जहां उन्होंने ढलान बना रखा है ! तो सारी पूंजी वहीं जाएगी जहां जल-जंगल-ज़मीन-मजदूर सस्ते हों, उनकी लूट पर सवाल उठाने वाली कोई ताकत जहां न हो, राजनीतिक व्यवस्था हो तो इतनी भ्रष्ट कि उसे पूंजी से खरीदा जा सके। जहां सस्ते संसाधनों के दोहन से सस्ते में उत्पादन करने और फिर दुनियाभर के बाजारों में उसे बेचकर अकूत दौलत कमाने में बाधा न हो।

‘मेक इन इंडिया’ के नारे को याद करें। यदि उत्पादन करने वाले देश का अपना ही बड़ा बाजार हो तो समझिए कि बोनस है। यही मोदीजी, उनकी सरकार और आर्थिक बाजार में उनकी तरफ से खेलने वाले कुल 3% भारतीयों के लिए ‘स्वर्णिम भारत’ है, ‘विश्वगुरू भारत’ है, दुनिया की सबसे तेज अर्थ-व्यवस्था है। बाकी का 97% भारत अपनी जेब उलटीकर झाड़ रहा है कि वहां कहीं कोई सिक्का अटक तो नहीं गया।  

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गांधी कहते हैं यह बांझ अर्थ-व्यवस्था है। उनका दिया ताबीज लागू करें तो दुनिया के सीतारामण और ऋषि सुनक जैसे लोग किसी कठपुतली-से नजर आएंगे। गांधी अपने ताबीज में कहते हैं : ‘जब भी तुम्हें अपने कदम के सही या गलत होने पर कोई संदेह हो या तुम्हारा अहंकार तुम पर हावी होने लगे, तब मेरी यह कसौटी आजमाओ। तुमने अपने जीवन में जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी देखा हो, उसका चेहरा याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो, वह उस आदमी के कितने काम का होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त हो रहा है।’  

सच यह है कि सीतारामण हों कि सुनक, सब कठपुतली हैं जिनकी डोर मुद्रा और पूंजी का खेल खेलने वाली दुनिया के 3% ‘ऊपर’ के लोगों के हाथ में है। खेल भी उनका, मैदान भी उनका, ढलान भी उनका बनाया तो सारा-का-सारा मुनाफा भी उनका ! बस, आप कुछ कर सकते हैं तो उनके खेल की कीमत चुका सकते हैं और वह भी डॉलर में ! रुपया गिर रहा हो कि डॉलर उठ रहा हो, नतीजा एक ही है कि दुनिया भर के आम आदमी का सर फूट रहा है, कमर टूट रही है। बाजार हंस रहा है और वे अपना मुनाफा संभाले बैंकों की तरफ भागे जा रहे हैं। इससे मनोरम दृश्य भी देखा है कभी? (सप्रेस)

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