Sarvodaya Press Service

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जनजातीय गौरव दिवस और सत्ता प्रतिष्ठान का दोहरा चरित्र

राज कुमार सिन्हा

आज सत्ता प्रतिष्ठान बिरसा मुंडा का नाम लेते हैं परन्तु यही सत्ता विकास के नाम पर लाखों आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर विस्थापित कर दिया है। विस्थापन की त्रासदी ऐसी की शहर के झुग्गी झोपड़ी में रहकर मजदूरी करने के लिए बाध्य हैं। इस विकास की आंधी ने स्वाभिमानी आदिवासी किसान को उद्योग के लिए सस्ता मजदूर में बदल दिया है। प्रशासनिक अमला द्वारा वन अधिकार, ग्राम सभा के जल, जंगल, जमीन पर मालिकाना हक, संस्कति और परम्परा पर लगातार हमला किया जा रहा है।

देश में आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कति एवं विरासत, धरोहर और उनके द्वारा दिए गए राष्ट्र निर्माण में योगदान के लिए साल 2021 में केंद्र सरकार ने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। मध्यप्रदेश सरकार ने इस अवसर पर शहडोल में जनजातीय समुदाय का एक बङा आयोजन कर राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री की उपस्थिति में पेसा कानून 1996 का नियम 2022 को अधिसूचित करने की घोषणा किया है। केन्द्रीय कानून 1996 को लेकर 25 साल बाद राज्य सरकार ने इसका नियम बनाया है।

आदिवासी इलाकों के लिए पेसा कानून में दो महत्वपूर्ण विषय है। पहला गांव सीमा के अंदर प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन एवं नियंत्रण ग्राम सभा करेगा दूसरा रूढ़िगत और परम्परागत तरीके से विवाद निपटाने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है। जिसमें ग्राम सभा को न्यायालय का अधिकार (विशेष परिस्थित को छोड़कर) दिया जाएगा ताकि पुलिस उन मामलों में हस्तक्षेप नहीं करे। परन्तु नियम में इस प्रक्रिया की स्पष्टता नहीं है।

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धरती आबा बिरसा मुंडा जल- जंगल- जमीन की लूट के खिलाफ लङ़ते हुए और आदिवासियों के अपने राज को स्थापित के लिए संघर्ष (उलगुलान) करते हुए 25 साल के उम्र में शहीद हो गए। परन्तु आजादी के 75 साल बाद भी देश के आदिवासी उसी जल, जंगल, जमीन की लूट, शोषण और अत्याचार का सामना कर रहा है, जिसके खिलाफ देश भर के आदिवासियों ने शहादत दिया था।

आज सत्ता प्रतिष्ठान बिरसा मुंडा का नाम लेते हैं परन्तु यही सत्ता विकास के नाम पर लाखों आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर विस्थापित कर दिया है। विस्थापन की त्रासदी ऐसी की शहर के झुग्गी झोपड़ी में रहकर मजदूरी करने के लिए बाध्य हैं। इस विकास की आंधी ने स्वाभिमानी आदिवासी किसान को उद्योग के लिए सस्ता मजदूर में बदल दिया है। प्रशासनिक अमला द्वारा वन अधिकार, ग्राम सभा के जल, जंगल, जमीन पर मालिकाना हक, संस्कति और परम्परा पर लगातार हमला किया जा रहा है।

केन्द्र सरकार वन संरक्षण नियम 2022 के माध्यम से बदलाव कर जंगलों की लूट को आसान करना चाहिए रही है। पहले यह प्रावधान था कि किसी परियोजना को वन भूमि देने से पहले ग्राम सभा की अनुमति लेना आवश्यक होगा परन्तु नये नियमों में इस प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। दूसरा वन अधिकार कानून 2006 की प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही किसी परियोजना या कम्पनी को वन भूमि दिया जा सकता था। परन्तु नये नियमों में वन अधिकार कानून की प्रक्रिया पूरी किये ही कम्पनियों और परियोजनाओ को वन भूमि दे सकते हैं। अर्थात 2005 के पहले जो वन भूमि पर अतिक्रमण कर खेती कर रहे हैं उस परिवार को अतिक्रामक बताकर उजाङा जाएगा। सरकार को न तो उसे मुआवज़ा देना पङेगा न ही पुनर्वास करना पङेगा। देश भर में वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू होने के बाद 27144 परियोजनाओं के लिए लगभग लगभग 15 लाख 10 हजार हेक्टेयर वन भूमि दिया गया है, जो दिल्ली के दस गुना है। उसी प्रकार मध्यप्रदेश में भी 1163 विकास परियोजनाओं के लिए 284131 हेक्टेयर वन भूमि परिवर्तित किया गया है। जिसमें 279 सिंचाई परियोजनाओं के लिए 83842 हेक्टेयर वन भूमि परिवर्तित किया गया है।

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