शराब से आदिवासियों का उत्‍थान : बड़े खतरे हैं इस राह में

राजेन्द्र जोशी

मध्यप्रदेश हेरिटेज (पारंपरिक) शराब नीति 2022 में आदिवासियों को महुए की शराब बनाए जाने को अनुमति दी गई है। फिलहाल, महुआ से शराब बनाया जाना पायलट प्रोजेक्ट के रूप में डिंडोरी और आलीराजपुर में लागू होगा। जहां तक पारम्परिक शराब बनाने के पायलट प्रोजेक्ट की बात है आशंका यही है कि इस नीति से कहीं जनजातीय समाज के लोग मोहरा न बन जायें, जैसा कि बडे शराब ठेकों में होता है। याने ठेका किसी के नाम का और पूंजी किसी और की और इसे संचालित करने वाला कोई और।

मप्र सरकार मंत्रीमंडल समूह की बैठक में जनजातियों के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु हेरिटेज लीकर (पारम्परिक शराब) का पेटेंट कराने पर सहमति बनी और प्रारम्भिक रूप से प्रदेश के दो जिलों, डिंडोरी और आलीराजपुर में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तहत लागू करने की बात कही गई। सरकार की इस तरह की योजना जनजातीय समूहों को आर्थिक सशक्तिकरण के बजाय उन्हें आपसी विवाद एवं वर्ग संघर्ष की ओर धकेलने का कार्य करेगी।

सम्पूर्ण देश में जनजातीय समाज के अधिकांश रहवासी क्षेत्रों में अनादिकाल से स्वयं के उपयोग एवं पारिवारिक कार्यक्रमों हेतु पारम्परिक शराब बनाई जाती रही है और आज भी बन रही है। जिस पर न तो किसी की अनुमति की जरूरत किसी को पडी है, ना ही समाज वालों ने कभी इस पर कोई नीति बनाने का आग्रह किया है। आज भी जनजातीय समाज बाहुल्य जिलों के गांव-गांव और शहरी सीमा तक पारम्परिक शराब बनाई जा रही है और वह कई परिवारों की आजीविका का साधन भी बनी हुई है।

इन दिनों सरकारों द्वारा जनजातीय समाज के उत्थान, शिक्षा, रोजगार, कृषि, स्वास्थ पर चर्चा करने के बजाय समाज के इतिहास पुरूषों के जन्मोत्सव बडे पैमाने पर मनाए जा रहे हैं जिनमें मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक शिरकत कर रहे हैं। साथ ही स्थानों, चौराहों के नामों के साथ उनकी मूर्तियों को स्थापित किया जा रहा है। आज जनजातीय समाज के उत्‍थान के लिये बनाई गई योजनाओं की तो भरमार है, ये बात दीगर है कि इन सबका लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है। हालांकि पिछले कुछ सालों में सडकों का जाल ग्रामों तक जरुर पहुँचा है।

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जहां तक पारम्परिक शराब बनाने के पायलट प्रोजेक्ट की बात है तो योजना के नियम बनने के बाद स्‍पष्‍ट हो सकेगा कि इसके आदिवासी समुदायों पर कितने गहरे प्रभाव पड़ेंगे। लेकिन, आशंका यही है कि इस नीति से कहीं जनजातीय समाज के लोग मोहरा न बन जायें, जैसा कि बडे शराब ठेकों में होता है। याने ठेका किसी के नाम का और पूंजी किसी और की और इसे संचालित करने वाला कोई और। आर्थिक विपन्‍नता के कारण बरसों से उधारी की दशा में जीवन यापन करने वाले जनजातीय समाज के आम आदमी को इस तरह की योजना में कई प्रायोजक बिना मांगे सहयोग करने आगे आ जायेंगे, क्‍योंकि जनजातीय समाज में साधन सम्पन्न आबादी की संख्या कम है और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की संख्या ज्यादा है।

जो सहयोगी आयेगे वे असल व्यापारी होंगे उनमें वे ठेकेदार आगे आयेंगे जो बरसों से इस धंधे में लगे हुये हैं। जनजातीय समाज का व्यक्ति मजदूर बनकर रह जायेगा, याने उसकी योजना के नाम पर मलाई सम्पन्न वर्ग ही खायेगा।

इस नीति का दूसरा पहलू यह है कि जनजातीय बहुल जिलों में ताड़ के पेड बडी संख्या में खेतों की मेढों पर लगे होते हैं। आलीराजपुर जिले में ये बडी संख्या में हैं और जनजातीय बन्धु ताडी को बेचने का कार्य अभी भी करते हैं। ऐसे में पारम्परिक शराब बनाने की नीति से जनजातीय समूहों का दो भागों मे विभाजित हो जाने का खतरा बना रहेगा, क्‍योंकि सरकार द्वारा अधिकृत शराब बनाने वाले ताडी बेचने वालों पर रोक लगायेंगे। ऐसे में पहले से आपसी झगडों के कारण उलझे ये लोग नित नई समस्याओं से जूझेंगे।

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नर्मदा नदी के सहारे बडवानी, धार जिले सहित महाराष्ट्र राज्य से आने वाली अवैध शराब आलीराजपुर जिले तक जाती है। इस कार्य में बडे ठेकेदारों के साथ रसूखदारों का हाथ होने के कारण इन पर लगाम लगा पाना फि‍लहाल सम्भव दिखाई नहीं देता है। (सप्रेस)

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