डॉ. कलाम : पृथ्वी ही आपके भविष्य की दुनिया है

डॉ. ओ.पी.जोशी

देश के पूर्व राष्ट्रपति स्व. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सहृदय, मृदुभाषी, सरल एवं ईमानदार होने के साथ-साथ पेड़ों एवं पशु-पक्षियों के प्रेमी भी थे। सन् 1989 में डॉ. कलाम के नेतृत्व में बनी ‘अग्नि मिसाइल’ की सफलता पूर्वक लान्चिंग पर प्रसन्न होकर तत्कालीन रक्षामंत्री के.सी. पंत ने पूछा था कि आपको इसके बदले में क्या चाहिये? इस पर डॉ. कलाम ने बड़ी सहजता से जबाव दिया था कि लांच किये गये स्थान पर एक लाख पौधे लगवाकर उनकी उचित देखभाल की व्यवस्था करें। पौधों के रूप में प्रकृति की मुस्कुराहट ही मनुष्य का सबसे बड़ा ईनाम है।

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वर्ष 2002 में राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण करने के बाद जब वे राष्ट्रपति भवन के विशाल परिसर में पहुंचे तो गुलाब का एक बागीचा देखकर उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्होंने विचार किया कि यहां इससे अधिक एवं अच्छे गार्डन होना चाहिये ताकि राष्ट्रपति भवन दुनियाभर में प्रसिद्ध हो। इस संदर्भ में वहां कार्यरत सेक्शन आफीसर पी.एन.जोशी से उन्होंने चर्चा की एवं गार्डन बनाने की योजना तैयार की। इसी योजना के तहत वहां हर्बल, हार्टिकल्चरल, न्यूट्रीशनल, स्प्रिचुअल, म्युजीकल एवं जैव-विविधता के गार्डन बनाये गये।

बाहर से मिलने आये लोगों को डॉ. कलाम अलग-अलग गार्डन में ले जाकर वहां चर्चा करते थे। नवम्बर 2006 में उनकी दक्षिण भारत की यात्रा के समय इर्नाकुलम के मरीन ड्राइव क्षेत्र में सुरक्षा के नाम पर कई गुलमोहर के पेड़ काट दिये गये। डॉ. कलाम को जब यह पता चला तो वे दुखी हुए एवं गुस्सा भी आया। उन्होंने अपने तत्कालीन प्रेस सचिव पी.एम. नायर के माध्यम से इर्नाकुलम के जिलाध्यक्ष को आदेश दिया कि काटे गये पेड़ों की संख्या से दस गुना पौधे लगाए जाएं एवं पूरी योजना राष्ट्रपति कार्यालय में भेजी जाए। इसके साथ ही वहां की नगर नियोजन समति के अध्यक्ष को भी आदेशित कर कहा कि रोपे गए पौधों की देखभाल कर नियमित जानकारी राष्ट्रपति सचिवालय में भेजी जाए।

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डॉ. कलाम सम्भवतः पहले ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपनी यात्रा के लिए काटे गये पेड़ों पर न केवल दुख जताया, अपितु नए पौधे लगवाकर उनकी देखभाल तक की जिम्मेदारी निभायी। वर्ष 2007 में राष्ट्रपति का कार्यकाल पूर्ण होने पर वे दिल्ली के 10, राजाजी मार्ग पर स्थित बंगले में रहने चले गये। इस बंगले के प्रवेश द्वारा के पास लगा अर्जुन का पेड़ उन्हें काफी पसंद था। मिलने आये लोगों को वे उस पेड़ को बताकर उसके औषधीय गुणों को भी समझाते थे।

पेड़-पौधों के साथ उन्हें पशु-पक्षियों से भी काफी लगाव था। ‘रक्षा एवं अनुसंधान संगठन’ (डी.आर.डी.ओ) के भवन की सुरक्षा दीवार पर कांच लगाने से डॉ.कलाम ने इसलिए मना कर दिया था कि इससे पक्षी वहां नहीं बैठ पायेंगे। एक बार डॉ. कलाम अपने निवास पर लंच के लिए जब डायनिंग टेबल पर पहुंचे तो वहां उन्हें पता चला कि पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी नहीं रखा गया है। बगैर किसी पर गुस्सा किए वे उठकर दाना-पानी डाल आये। वापस आकर अपने सहायक सृजनपाल सिंह से कहा कि जो पशु यहां रहते हैं एवं पक्षी जो आते हैं वे हमारे परिवार के सदस्य हैं, ये घर उन सभी का है, जब तक वे नहीं खा लेते हम लोग कैसे खा सकते हैं।

डॉ. कलाम ने अपने राष्ट्रपति के कार्यकाल एवं बाद में भी अपने व्याख्यानों में युवाओं से कहा कि ‘हमेशा प्रकृति से सीखने की कोशिश करो, जहां सभी कुछ छिपा है।’ प्रकृति में विविधता के साथ एकता, आपसी सामंजस्य, सहयोग एवं शांति है। प्रकृति तो उस पर प्रहार करने वालों को भी प्यार करती है। 27 जुलाई 2015 को ‘भारतीय प्रबंध संस्थान’ (आय.आय.एम.) शिलांग में छात्रों को दिये भाषण का विषय ‘रहने लायक बने पृथ्वी’ भी प्रकृति एवं पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर आधारित था। अपने भाषण में युवाओं को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘पृथ्वी के जीवन योग्य बने रहने के लिए प्रदूषण एवं कुछ अन्य मानवीय गतिविधियां खतरनाक हैं, यदि ऐसा ही चलता रहा तो हमें मजबूरन पृथ्वी छोड़नी होगी। प्रदूषण की जारी रफ्तार से शायद 30-40 वर्षों में ऐसी स्थिति सम्भव है। यह पृथ्वी ही आपके भविष्य की दुनिया है अत: इसे बचाने का भरपूर प्रयास करें। पृथ्वी को बचाने के इस आव्हान के साथ उन्होंने अंतिम सांस ली। (सप्रेस)

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