हमारा पैसा हमारा हिसाब : क्‍या कॉरपोरेटस् हमारे बैंकों को डूबो देंगे ?

क्रेडिटसाइट्स के एक अध्ययन से पता चला है कि भारतीय बैंकों के कुल ऋण का 45% कॉरपोरेट ऋण है। अगर ये ऋण न चुकाये जाएँ तो ये अपने साथ कई बैंकों को डुबो देंगे। इसके बावज़ूद, सरकारी बैंक भी कॉरपोरेट ऋण व्यवसाय में आगे बढ़कर शामिल हो रहे हैं। इसी कारण शाखाएं बंद कर हो रही हैं, कर्मचारियों की संख्या में कटौती हो रही हैं और छोटे ऋण भी धीरे धीरे गायब हो रहे हैं। संक्षेप में, सरकारी बैंक भी अधिक लाभ के लिए लोगों के बजाय कॉर्पोरेट्स को चुन रहे हैं। अडानी जैसे बड़े समूह की ऋण स्थिति देखकर बैंकों को चौकन्ना हो जाना चाहिए वर्ना उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। इन्ही सवालों के संदर्भ में पेश है सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी टीम व्‍दारा तैयार ‘हमारा पैसा हमारा हिसाब‘ का नया एपिसोड।
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सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

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अपने जैसा ‘एआई’

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मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

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