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कोविड के बाद की कक्षाएं

कोविड के बाद की कक्षाएं

कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 बीमारी अब धीरे-धीरे कम होते हुए समाप्ति के संकेत देने लगी है। जाहिर है, ऐसे में हमें अपने बच्चों के स्कूल फिर से शुरु करना होंगे। लंबे समय बाद स्कूलों, खासकर उच्च और उच्च-माध्यमिक स्तर...

अरविन्द सरदाना

कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 बीमारी अब धीरे-धीरे कम होते हुए समाप्ति के संकेत देने लगी है। जाहिर है, ऐसे में हमें अपने बच्चों के स्कूल फिर से शुरु करना होंगे। लंबे समय बाद स्कूलों, खासकर उच्च और उच्च-माध्यमिक स्तर के स्कूलों में क्या और कौन-सी सावधानियां बरतनी होंगी?

हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने हाईस्कूल खोलने का निर्णय लिया है। यह निर्णय अच्छा है और अब हमें जल्द‍ ही प्राथमिक शालाओं को शुरू करने के लिए कदम उठाने चाहिए। जब सभी जगह लोग आना—जाना कर रहे हैं, तो स्कूलों को बंद रखने का कोई औचित्य नहीं हैं। कोविड नियमों के साथ स्कूल खोले जा सकते हैं। इस दिशा में यह ज़रूरी है कि स्थानीय स्तर पर सावधानी बरती जाए। बेहतर होगा कि स्कूल खोल दिए जाएं और परिस्थिति के अनुसार जिला प्रशासन को निर्णय लेने की छूट दे दी जाए।  जिला प्रशासन यदि अपने जिलों में ‘टेस्टिंग, ट्रेसिंग एवं आयसोलेशन’ पर ‘कंट्रोल रूम व्यवस्था’ बनाए रखे तो हम सबके लिए विश्वास बना रहेगा। एक पारदर्शी माहौल चाहिए। स्कू्ल डर के कारण बंद हैं और इस डर को गहरा बनाया जा रहा है।  

स्कूलों में ‘कोविड प्रोटोकॉल’ अपनाया जा सकता है। बच्चों के कोविड संबंधी सवालों पर ध्यान दें तो समाज में उससे जुड़े भ्रम पर चर्चा हो सकती है। उदाहरण के लिए, एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि कैसे पता करें कि यह बुखार सामान्य सर्दी-जुखाम का है या कोविड का? यदि परिवार में यह भेद करने की क्षमता बढ़े तो हम इस महामारी से जूझ सकते हैं। टीके के फायदे और उसकी सीमाएं समझना ज़रूरी है। यह एक लंबे समय की आपदा है और इसके साथ हमें जीना सीखना होगा।

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हाईस्कूल लम्बे समय बाद खुल रहे हैं। उनमें ऊर्जा भरने की ज़रूरत है। इसके लिए पहला कदम होगा कि हम स्कूल टीम को दुरुस्त करें। मध्यप्रदेश में इसके क्या मायने होंगेॽ हमें ऐसे प्रिंसिपल नियुक्त करने होंगे जो शालाओं को व्यवस्थित चला पाएँ। आप किसी भी प्रिंसिपल से बात करें तो वे कहेंगे कि हमें स्टाफ चाहिए जिसमें गणित, अंग्रेज़ी और विज्ञान के शिक्षक हों। काम-चलाऊ व्यवस्था से ऊपर उठना है तो ‘अतिथि’ या ‘गेस्टस’ शिक्षक की जगह नियमित शिक्षक चाहिए। आज तीस हज़ार के करीब ‘अतिथि शिक्षक’ राज्य के स्कूलों में काम कर रहे हैं। 

स्कूलों को टाईम-टेबल के अनुसार चलाने के लिए स्कूल को नियमित रूप से और समय पर लगाना आवश्यक है। यह तब ही संभव है जब राजनैतिक दखल कम हो। यह बहुत पुरानी आदत है और ‘अडजस्ट’ करने की ये मज़बूरियाँ व्यवस्था को अंदर से लाचार बना देती हैं। प्रिंसिपल चाहें भी तो स्कूलों को व्यवस्थित चला नहीं पाते। इसके लिए कोई नई योजना की आवश्यकता नहीं है, परंतु राजनैतिक चैनल से यह संदेश भेजना कि दखल कम हो और समस्याएँ प्रशासन के नियमों के अनुसार सुलझाई जाएँ।

इस बात को स्वीकार करें कि सरकारी शालाओं को सुचारु ढंग से चलाने का विश्वास समाज में कम हो गया। इस विश्वास को फिर से बनाने और मजबूत करने की जरूरत है। हमारी यह विडंबना है कि सरकार ‘केन्द्रीय विद्यालय,’ ‘मॉडल स्कूल’ और ‘नवोदय विद्यालय’ तो सुचारु रूप से चला पाती है, किन्तु सामान्य सरकारी स्कूल इस तरह नहीं चला पाती। ऐसा क्यों होता है?  

स्कूल टीम को मज़बूत करने के साथ-साथ दूसरा कदम होगा कि हम स्कूल की बुनियादी आवश्यकताओं पर ध्यान दें। एक अध्ययन के अनुसार मध्यप्रदेश के स्कूलों में 23 प्रतिशत कमरों में मरम्मत की जरूरत है। इसके अलावा स्कूलों में पानी की व्यवस्था, लड़कियों के लिए शौचालय, चहारदीवारी एवं सामान्य देखरेख की ज़रूरत है। स्कूल ऐसे स्थान पर बनें जहाँ बच्चे और शिक्षक उसे अपना मानें और एक सहज माहौल कायम हो सके। जहाँ सभी शालाओं को एक परिसर में लगाया जा रहा हो, वहाँ ‘परिसर प्रबंधक’ नियुक्त होना चाहिए, ताकि प्राचार्य पर बोझ न पड़े। कई राज्यों में इस तरह के उपाए किए गए हैं। 

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कोरोना माहमारी का असर केवल स्कूली पढ़ाई पर ही नहीं हुआ है, बल्कि इससे बच्चों का पोषण भी प्रभावित हुआ है। इस बात का उल्लेख कई अध्ययन रिपोर्टों में देखा जा सकता है। स्पष्ट है कि परिवार पर पड़ने वाले आर्थिक संकट का असर उनके भोजन पर पड़ा है। कई परिवारों में भोजन की कमी है। ऐसे माहौल में हमें हाईस्कू्ल के लिए मध्यप्रदेश में मध्यान्ह भोजन व्यवस्था शुरू करनी चाहिए। कई राज्य, जैसे – तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना आदि के हाईस्कूलों में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था पहले से ही है। मध्यप्रदेश में स्कूल खोलने के साथ-साथ यह व्यवस्था भी कायम करनी चाहिए।

माहमारी का प्रभाव हमें बच्‍चों पर अलग-अलग तरह से दिख रहा है। यह बात सामने आई है कि बाल मज़दूरी एवं कम उम्र में लड़कियों की शादी की संख्या बढ़ रही है। बच्चों के मन में भी भय और असमंजस की भावना है। स्कूल आने पर उन्हें हीनभावना होगी, क्योंकि वे बहुत कुछ भूल गए होंगे एवं पढ़ाई की आदत छूट गई होगी। इस शर्म से बचने के लिए वे शाला-त्यागी बनने की कगार पर होंगे। ऐसे समय में उनका मनोबल बढ़ाने और उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है। यह शिक्षक कर सकते हैं, जैसे वे पहले किया करते थे – गाँव में चक्कर लगाकर पालकों और बच्चों से बात करके। सबसे आवश्यक होगा कि हम स्कूल टीम पर भरोसा करें ताकि वे अपने हिसाब से बच्चों को स्कूल में वापस लाएँ और अपनी शाला के लिए एक सामूहिक योजना बनाएँ।

हम जो भी टेस्ट लें वह सकारात्मक बने और बच्चों को दोषी न ठहराए। हमें याद रखना होगा कि पहले भी नौवीं में आने वाले कई बच्चे कमज़ोर होते थे। अब स्थिति कुछ और गंभीर है। इसकी जड़ कोरोना नहीं, बल्कि हमारी बुनियादी शिक्षा है। हमें बच्चों के समूह बनाकर उनके स्तर के अनुसार मदद करनी होगी। यह काम पहाड़ जैसा लगेगा, पर संभव है। ‘ट्वेंटी क्वेस्चन’ का शॉर्टकट न अपनाएं। बच्चों को अधिक समय देने और पाठ्यक्रम की पूर्ति को दरकिनार रखने की ज़रूरत है।  

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यदि हम हाईस्कूल खोलने के साथ-साथ उसमें ऊर्जा भरते हैं तो इससे प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल खोलने की दिशा में भी एक संदेश मिलेगा। इन शालाओं को खोलने में चुनौतियाँ अधिक हैं। मध्यप्रदेश में हाईस्कूल और हायर सेकेण्डरी स्कूलों की संख्या लगभग 8,500 है, जबकि  प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं की संख्या 1,14,000 के करीब है। प्रदेश में लगभग 18,000 स्कूलों में सिर्फ एक ही शिक्षक है। इस दिशा में हमें शाला अनुसार योजना बनाने की आवश्यकता होगी, क्योंकि कई स्कूलों में शिक्षक ‘सरप्लस’ हैं और कई स्कूलों में कम हैं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे कमजोर आर्थिक परिस्थितियों के कारण सरकारी स्कूलों में वापस आ रहे हैं। इसे एक मौका समझकर, अपनी व्यवस्था को बेहतर बना लेना चाहिए। इन बच्चों को सरकारी स्कूल एक मज़बूरी न लगें और यह स्कूल पुन: जोश के साथ जीवित हो पाएं। (सप्रेस)

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