अब भी बचाई जा सकती है – धरती

डॉ.वीर सिंह

हर साल बाढ, सूखा, आंधी, गर्मी, बर्फवारी और तूफानों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बढने का एक मतलब यह भी है कि हमने एक वैश्विक समाज की हैसियत से धरती पर रहना अब तक नहीं सीखा है। एक तरफ, हमारे कार्य-कलाप पृथ्‍वी को लगातार घाव देकर समाप्‍त करने में लगे हैं तो दूसरी तरफ, ‘संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ’ जैसा वैश्विक संगठन अपने तौर-तरीकों से उन्‍हें नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।

हमारी समकालीन दुनिया का सबसे बड़ा संकट, जिसमें पृथ्वी का संपूर्ण जीवन ही दांव पर लगा है, निश्चित रूप से पारिस्थितिक और पर्यावरणीय संकट है। इस संकट की कोख में एक और संकट पल रहा है, जो शनैः-शनैः विकराल रूप धारण करता जा रहा है – जलवायु परिवर्तन। द्रुतगति से जारी सार्वभौमिक गर्माहट और फलस्वरूप जलवायु परिवर्तन के बारे में भौतिक शास्त्र  के मनीषी और सुप्रसिद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्वर्गीय स्टीफन हॉकिंग का आंकलन था कि 600 वर्षों में पृथ्वी आग का गोला बन जाएगी। लम्बे समय से चल रहे अध्ययनों से अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि सार्वभौमिक गर्माहट और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण स्वयं मानव ही है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि इस संकट का समाधान भी काफी कुछ मानव के हाथों में ही है।

वर्ष 2021 के आगमन के साथ, इस सदी के तीसरे दशक में हम एक नई आशा के साथ प्रवेश कर रहे हैं। एक मार्च 2019 को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यूएनओ) ने 2021 से 2030 के दशक को ‘इकोसिस्टम रेस्टोरेशन डिकेड,’ अर्थात ‘पारिस्थितिक तंत्र पुनरुत्थान दशक’ घोषित किया है। यदि इन दस वर्षों में वे सभी कार्यक्रम संपन्न हो जाएं जिनका दायित्व ‘यूएनओ’ की विभिन्न एजेंसियों ने लिया है तथा हमारे टूटे-फूटे, छिन्न-भिन्न और दूषित-प्रदूषित पारिस्थितिकी परिवेशों का जीर्णोद्धार हो जाए तो इससे हमारे जिन्दा ग्रह का भी उद्धार होगा और हमें भी एक उज्ज्वल भविष्य विरासत में मिलेगा। जीवन की जड़ों पर प्रहार करने वाले आर्थिक विकास की भेंट चढ़े हमारे ग्रह के पारिस्थितिक तंत्रों को फिर जीवटता प्रदान करना हमें स्वस्थ एवं सम्पोषित भविष्य निर्माण के एक अवसर के साथ जोड़ता है। हम व्यापक और सकारात्मक पुनरुत्थान कार्यक्रमों के माध्यम से अपने घायल पड़े पारिस्थितिक परिवेशों में पुनः नई जान फूँक सकते हैं, जिससे वन्य जीवों के निवास संरक्षित होंगे, हमारी जैव विविधता, मिट्टी और जल का संरक्षण होगा, जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगेगा, सामाजिक-आर्थिक ढांचा सुदृढ़ होगा तथा रोजगार जैसी संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे।

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‘यूएनओ’ के अनुसार, सभी सरकारें, समुदाय, संरक्षण-संगठन और निजी उद्यम ‘पारिस्थितिकी तंत्र पुनरुत्थान दशक’ के उद्देश्यों को पूरा करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ‘यूएनओ’ की एजेंसियां, ‘खाद्य और कृषि संगठन’ (एफएओ) तथा ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ (यूएनईपी), ‘दशक’ कार्यक्रमों की डिलीवरी सुनिश्चित करेंगी। ‘यूएनईपी’ के साथ ‘दशक’ के समन्वयक टिम क्रिस्टोफ़र्सन का कहना है : “जब हमने पुनरुत्थान की बात की तो हमने सकारात्मक प्रतिस्पर्धा की भावना देखी। अधिक-से-अधिक देश और लोग अधिक-से-अधिक पेड़ उगाना चाहते हैं, लेकिन अब यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सही समय पर, सही जगह पर और स्थानीय समुदायों के सहयोग से सही पेड़ लगाए जाएं। हम उन पारिस्थितिक तंत्रों का उत्थान करें जो अभी भी इन वैश्विक पारिस्थितिकी उत्थान प्रतिबद्धताओं में कुछ हद तक अविकसित हैं, जैसे – हमारे तटीय क्षेत्र, समुद्र और नदियां।”

 ‘यूएनओ’ की ‘इकोसिस्टम रेस्टोरेशन डिकेड’ की घोषणा के पीछे अल-साल्वाडोर की ‘पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन मंत्री’ सुश्री लीना पोहल प्रेरणा थीं, जिन्होंने ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ के अपने एक भाषण में ‘पारिस्थितिक तंत्र पुनरुत्थान दशक’ का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्‍ताव के प्रबल समर्थन के बाद ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ ने ‘इकोसिस्टम रेस्टोरेशन डिकेड (2021-2030)’ पर संयुक्त राष्ट्र के फैसले की घोषणा की।

इस ‘दशक’ के प्रमुख उद्देश्य हैं : पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण को रोकने हेतु सरकारों द्वारा ठोस कदम उठाना, विघटित हो चुके पारिस्थितिक तंत्रों का पुनः उत्थान करना, नीति, अर्थशास्त्र एवं जैव-भौतिकीय पहलुओं पर ज्ञान का आदान-प्रदान, दक्षता और प्रभाव बढ़ाने हेतु विभिन्न संस्थाओं को आपस में जोड़ना, निवेश हेतु सार्थक पोर्टफोलियो के निर्माण में रूचि रखने वालों में एक सम्बन्ध बनाना, तथा ‘पारिस्थितिकी तंत्र पुनरुत्थान दशक’ से होने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सामाजिक-आर्थिक लाभों को सामने लाना।

पारिस्थितिकी तंत्रों की वर्तमान दयनीय स्थिति को सुधारने की आवश्यकता क्यों है? भूमि क्षरण दुनिया के कम-से-कम 3.2 बिलियन लोगों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के बिगाड से ‘वार्षिक वैश्विक सकल उत्पाद’ में भारी गिरावट आ गई है। धरती की पारिस्थितिक दुर्दशा के कारण वर्ष 2000 और 2009 के बीच प्रति वर्ष कार्बन डाइऑक्साइड का वैश्विक उत्सर्जन 3.6 से लगाकर 4.4 गीगा टन था, जो कि सार्वभौमिक गर्माहट का गंभीर सूचक है। ‘पेरिस जलवायु समझौते’ के अनुपालन में औसत वैश्विक तापमान की वृद्धि 2 डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे बनाए रखने के लिए 2030 तक आवश्यक उपाय लागू करने की दृष्टि से पारिस्थितिक उन्नयन एक प्राथमिकता है।

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पारिस्थितिक समन्वय के साथ ही जैव विविधता का संरक्षण, खाद्य और जल सुरक्षा में वृद्धि एवं सामाजिक-आर्थिक प्रगति तथा ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (एसडीजी) को प्राप्त करने के लिए पारिस्थितिक तंत्रों का नैसर्गिक विकास सर्वाधिक आवश्यक है। धरती के पारिस्थितिक उन्नयन से वनों, चारागाहों, कृषि भूमि और सभी प्रकार की भूमि उपयोग प्रणालियों की उत्पादकता बढ़ेगी। नदियों-झीलों एवं अन्य जल संसाधनों के संरक्षण और पारिस्थितिकी सुधार से जल उपलब्धता बढ़ेगी। जैव-विविधता संरक्षण से जीवों के विलुप्त होने के खतरे कम होंगे। पर्यावरण प्रदूषण के नियंत्रण से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलेगी। और सबसे बड़ी बात – जैवमंडल का कार्बन-चक्र नियमित होगा तथा जलवायु अनुकूलन की नैसर्गिक प्रक्रियाएं शनैः-शनैः प्रभावी होने लगेंगी।

‘यूएनओ’ द्वारा ‘इकोसिस्टम रेस्टोरेशन डिकेड (2021-2030)’ घोषित करने का श्रेय तो अल-साल्वाडोर ले गया। अब अपने भौगोलिक क्षेत्र में पारिस्थितिक उत्थान से सार्थक, दीर्घकालिक प्रभाव वाले और अनुकरणीय कार्यक्रम चलाकर और दशक को उसके उद्देश्यों की पूर्ति में अग्रिम स्थान पर रखकर भारत दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। भारत में दशक के लिए निर्धारित कार्यक्रमों को सर्वथा सफल बनाने हेतु ‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ को विशिष्ट दायित्व दिया जाना चाहिए और ‘कृषि’ तथा ‘स्वास्थ्य’ मंत्रालयों को इसमें सहयोगी बनाना चाहिए। (सप्रेस)

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