किसान भारत की आत्मा है, उसे सम्‍मान दें

राजेन्द्र सिंह

किसान और सरकार वार्ता के छः दौर पूरे हुए है। सीधी मामूली माँग है। किसान विरोधी जो तीन कानून अलोकतांत्रिक तरीके से बनाये है, उन्हें जल्दी से जल्दी रद्द करो। इस मांग के ऊपर ज्यादा संवाद या वार्ता में समय नहीं बिताना चाहिए। किसान विरोधी कानून रदद् करने में कोई अडचन नहीं है। केवल सरकारी हठ धार्मिता है। इस सरकार ने अपना किसान विरोधी चेहरा पेश कर दिया है।

किसान ही सच्चा उत्पादक है। अन्य उद्योग तो केवल वस्तुओं का रूपांतरण ही करते हैं। किसान पारिस्थितिकी को स्वस्थ रखने का ही काम करता है। उसकी खेती को उद्योगों ने अनुदान हेतु रसायनिक खाद-जहरीली दवाई बनाकर ही उद्योगों की तरह प्रदूषण बढ़ाने के रास्ते पर चलाने का प्रयास किया है।
किसान धरती माँ की सेहत ठीक रखने हेतु अपनी श्रमनिष्ठा से पहले मिट्टी को तैयार करता है। उसमें बीज बोकर, फिर उसका पोषण ही करता रहता है। किसान धरती, प्रकृति, मानवता, वनस्पति व जीव जगत का शोषण नहीं करके पोषण में ही लगा रहता है। उसके उस पोषण करने की कीमत ही पारिस्थितिकी सेवा है। उसकी उस सेवा को आर्थिकी का आधार बनाये।

फसल खेती वातावरण से जहरीली गैसों को अपने अंदर खींचती है। प्राणवायु जीवनीय गैंसों का उत्सर्जन करके धरती के जीव-जगत को पोषित, संचालित करती रहती है। यह पारिस्थितिकी सेवा का सबसे बड़ा-जरूरी संसाधन है। इसने पारिस्थितिकी को स्वस्थ रखकर हमारे जीवन को बनाया चलाया है।
किसान आज सड़कों पर दर-दर भटक रहा है। वह तो पारिस्थितिकी की आर्थिकी की मांग अभी बहुत ज्यादा नहीं कर रहा है। जिस दिन पारिस्थितिकी सेवा की आर्थिकी माँगेगा तब क्या होगा? तो वही पारिस्थितिकी का सच्चा सेवक है। उसकी सेवा का दाम उसे मिलना आरंभ हो जाएगा तभी मैं मानूँगा हमारा महान भारत समृद्धि और सनातन विकास के रास्ते पर चल पड़ेगा है। जब तक किसान को उसकी पारिस्थितिकी सेवा का दाम देना शुरू नहीं करते। तब तक भारत को आत्म स्वाबलंबी बनाने की बातें बेईमानी है। किसान स्वावलम्बी होकर ग्राम स्वराज्य लायेगा। वही भारत को आत्म निर्भर बनायेगा।

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बापू ने ग्राम स्वावलंबन के लिए ही अंग्रेजों की लूट रोकने हेतु चरखा चलाकर मैनचेस्टर कंपनी की लूट रोकी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत से भगाया था। अंग्रेजों का राज खत्म करके अपना ‘ग्राम स्वराज्य’ कायम करने की कल्पना की थी। हमारा संविधान भी ग्राम स्वराज्य के रास्ते खोलता है। लेकिन सरकार व बाजार ही इसमें अड़चन बनकर ग्राम स्वराज्य के रास्ते बंद कर रहे है।

सरकारों, नेताओं, अधिकारियों को मिलकर अब आर्थिकी द्वारा पारिस्थितिकी को न्याय दिलाने का काम किया जा सकता है। 21वीं सदी में हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। किसान मजदूर सभी को पारिस्थितिकी सेवा का मूल्य मिले। आज किसान को उसके श्रम की कीमत एक मजदूर जितना भी नहीं मिलती। मजदूर के बच्चे और किसानों के बच्चे पढ़ाई-दवाई के लिए भी आज मोहताज है।

किसान की खेती से जैवविविधता का संरक्षण होता है। मेरी खेती में 200 से ज्यादा मोर फसलों की हरि पत्तियाँ और कोपल खाकर नष्ट करते रहते है।  जब उन्हें हटाते है, तो उड़कर पेड़ों पर बैठ जाते है। हम हार मानकर उन्हें जो वे करे करने देते है। बंदर-नीलगाय, सुअर सभी जानवर हमारी खेती को नष्ट करके ही जिन्दा है। सारिस्का से निकलकर बघेरा और जरख हमारी गाय और कुत्ते को खा जाता है। यह कभी-कभी नहीं; हर साल गर्मी में हम जंगली जानवरां की मार भुगत रहे है।

फसलों की रखवाली करने वाली महिलाओं-पुरुषों को बाघ-बघेरे मार देते है। हम किसान इसे भगवान का काम मानकर शांति से घर बैठ जाते है। आज जब बहुत कठिनाई से अन्न पैदा हुआ है। आज हम अन्न की बाजार में लूट रोकने तथा अपने केवल भौतिक उत्पादन का दाम ही मांग रहे है। सहकारी व सरकारी मंडी, जहाँ दलालों की दादागिरी से बचने का उपाय था, उसे बचाना चाहते है। अब दिल्ली की सड़कों पर रात-दिन बिताकर दिसम्बर की कढ़कती ठंड़ की रातों में तड़फ-तड़फ कर समय बिताने की तपस्या और संघर्ष मानकर शांतिमय-अहिंसक तरीके से दिल्ली की सड़कों की निगरानी कर रहे है।

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किसान और सरकार वार्ता के छः दौर पूरे हुए है। सीधी मामूली माँग है। किसान विरोधी जो तीन कानून अलोकतांत्रिक तरीके से बनाये है, उन्हें जल्दी से जल्दी रद्द करो। इस मांग के ऊपर ज्यादा संवाद या वार्ता में समय नहीं बिताना चाहिए। किसान विरोधी कानून रदद् करने में कोई अडचन नहीं है। केवल सरकारी हठ धार्मिता है। इस सरकार ने अपना किसान विरोधी चेहरा पेश कर दिया है।

किसान की लूट एकाध परिवार का राज्य कायम कराने के लिए है। सरकार किसानों की बातों को प्यार से मानकर-सरलता और सहजता से स्वीकार करके आगे बढ़ जाती है। तब इस सरकार का चेहरा किसान हित में ही दिखाई देता है। सरकार इसे जितना ज्यादा खींच रही है, उतना ही सरकार तथा देश के लिए मुश्किल बढ़ेगी। किसान भारत की आत्मा है। इसे मत दुखाओ, इसकी दुखी दुआये; कुछ भी भगवान से करा देंगी।

किसानों ने अपना शांतिमय स्वरूप, अहिंसात्मक रास्ता पकड़ा है। महात्मा गांधी ने इसी रास्ते पर देश को खड़ा करके अंग्रेजों को भगाया था। आज तो किसान नेतृत्व पूर्ण समझदारी से शांति कायम करके राष्ट्रहित में लगा है। सरकार भी कानूनों को रदद् करना भारत हित में माने।
किसानों को पूरी दुनिया में अब पारिस्थितिकी सेवा मूल्य के आर्थिकी के साथ जोड़ने का काम शुरू हो गया है। दुनिया भर में किसानों ने अपने उत्पाद का मूल्य तय करना भी शुरू किया है। इस किसान मूल्य निर्धारण कार्य में सरकारों ने उनकी मदद में कानून किसानों द्वारा बताये रास्ते पर चलकर बनाये है। भारत सरकार भी किसानों से बात करके किसान हित में नए कानून बना सकती है। (सप्रेस)

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