किसानी के प्रतिकूल हैं, हाल में बने कानून

राजगोपाल पीव्‍ही

राजगोपाल पीव्‍ही

कुछ दिन पहले खेती-किसानी से जुडे दो कानूनों के बनने और एक कानून के संशोधन ने देशभर के किसानों में बवाल खडा कर दिया है। ऐसे में बरसों से कृषि और जमीन के मुद्दे पर सक्रिय ‘एकता परिषद’ का क्‍या कहना है?

सरकार ने हाल में खेती-किसानी से जुड़े तीन कानून पारित करवाए हैं। उनको लेकर किसानों के बीच आक्रोश तो है ही, किसान, आदिवासी और मछुआरा समुदाय के साथ काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के मन में भी आक्रोश है। नतीजतन देश भर में एक आंदोलन का माहौल बनता जा रहा है। ऐसे में इन कानूनों को जल्द-से-जल्द वापस लेने में ही सरकार की बुद्धिमानी होगी।

किसानों के संदर्भ में कोई निर्णय लेना जरुरी हो तो भी किसानों के साथ परिचर्चा कर उनकी अभिलाषाओं के अनुकूल नियम-कानून बनाना चाहिए था। सलाह, परिचर्चा और व्यापक संवाद के बिना जो कानून बनाए गए हैं और उनके माध्यम से देश भर की कृषि को चलाने की जो कोशिशें हो रही हैं, उससे लोकतंत्र को भी खतरा है।

यदि खेती-किसानी के लिये कानून बनाना बहुत जरुरी हो तो भी सरकार को पहले ‘एमएस स्वामीनाथन कमीशन’ का ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) और कर्जमाफी के सुझाव को लागू करना चाहिये था। उसके बाद बाकी बातों पर सरकार को चर्चा शुरू करना चाहिए थी। यह नहीं करने से जाहिर होता है कि सरकार को जो करना चाहिए, वह नहीं कर रही और जो नहीं करना चाहिए वह कर रही है। यह कोई प्रजातांत्रिक तरीका नहीं है।

देश भर में मंडियों का गठन इसलिए हुआ था कि किसान को स्वाभिमान से जीने के लिए उनकी एक संस्थागत व्यवस्था कायम हो सके, ताकि किसान को भी लगे कि हमारे संरक्षण के लिए कोई संस्था है। खुले बाजार में बाजार की ही शर्तों पर बेचने और ताकतवर लोगों के सामने हाथ फैलाकर खड़े रहने के खिलाफ और इस व्‍यवस्‍था को बदलने के लिए ही तो मंडी व्यवस्था कायम की गई थी। उस मंडी व्यवस्था को समाप्त करना कोई बुद्धिमता नहीं है।

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इसी तरह संविदा खेती (कांट्रेक्ट फार्मिंग) की बात की जा रही है। हम सब जानते हैं कि यह संविदा खेती कितनी खतरनाक है। हमने कोयले का व्यापार कर लिया, अन्य खनिजों का व्यापार कर लिया, पानी का व्यापार कर लिया और अब खेती का व्यापार करने जा रहे हैं। संविदा खेती में ताकतवर लोग आएंगे। खेती पर स्वाभिमानी ढंग से जीवन-यापन करते साधारण किसानों को ताकतवर बनाने के बदले उनको संविदा खेती के तहत कमजोर करने की जो प्रक्रिया है, वह सही नहीं है। कोविड के दौरान प्रधानमंत्री ने भी कहा था कि ‘मैं इस देश को स्वावलंबी बनाना चाहता हूँ।’

ऐसा स्वावलंबी समाज गाँव से ही तो बनेगा। जल, जंगल और जमीन पर यदि लोगों का अधिकार नहीं है, जीवन जीने का निर्णय लेने का अधिकार उन लोगों को नहीं है तो स्वावलंबी समाज की रचना कैसे होगी? इसमें समन्वय की कमी झलकती है। एक तरफ हम स्वावलंबी समाज बनाना चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ आप जो कर रहे हैं वह इसके बिल‍कुल विपरीत है।

सन् 2012 में बड़े आंदोलन के बाद, जहाँ एक लाख लोगों को लेकर ‘एकता परिषद’ और उसके सहयोगी संगठनों ने दिल्ली की ओर कूच किया तो 2013 में ‘भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार, सुधार तथा पुनर्वास अधिनियम’ कानून लाने में हम सफल हुए थे। इस कानून में यह कोशिश की गई है कि जैसे भूमि-अधिग्रहण के मामले में अच्छी भूमि उद्योग के लिए नहीं देने की बात है, उसी तरह सिर्फ भूमि-स्वामी को ही नहीं, बल्कि भूमि-स्वामी के अलावा जो भूमि पर आश्रित समाज है उसका पुनर्वास इस कानून में शामिल है। इसके साथ-साथ ‘सामाजिक प्रभाव आंकलन’ (एसआईए) भी किया जाए, ऐसी कई बातें इस कानून में हैं। इस कानून को बदलने के लिए भी सरकार ने विधेयक का ही प्रयोग किया था, इसलिए हमको बड़े पैमाने पर पलवल से दिल्ली तक आंदोलन करना पड़ा था।

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मेरा निवेदन है कि पूरे देश को आंदोलन में झोंकने के बदले, बिना किसी सलाह-मशविरा के, विधेयक के माध्यम से देश को चलाने की बजाए सरकार चर्चा के आधार पर काम को आगे बढ़ाए। मैं केन्‍द्रीय कृषि मंत्री से हमेशा यह निवेदन करता रहा हूँ कि ‘एकता परिषद’ के दिल्‍ली-कूच के दौरान आगरा में भूमि सुधार के लिए जो सहमति बनी थी, किसानों की समस्या हल करने के लिए सरकार पहले उसे लागू करे। उसको लागू किए बिना जल्दीबाजी में कानून बनाकर बड़े लोगों को ताकत पहुंचाने और ताकतवर लोगों तथा कॉर्पोरेट को फायदा पहुंचाने के लिए ये जो प्रयास किए जा रहे हैं उनसे तो पूरे देश में आंदोलन होगा।

सरकार से निवेदन है कि वह इन कानूनों को वापस ले और किसान, आदिवासी, मछुआरा और खेतीहर मजदूरों को सम्मान देना सीखे। इससे बने माहौल में मिल-जुलकर बैठकर बात करें कि देश का भविष्य क्या होना चाहिए। (सप्रेस)

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