कोविड योद्धाओं ने जब काम शुरू किया तो उन्हें अन्दाज़ा नहीं था कि यह कब ख़त्म होगा। हर गुज़रते हफ़्ते के साथ यह साफ़ होता गया कि यह संकट उनकी कल्पना से कहीं ज़्यादा लम्बा है। देखते-देखते सितम्बर आ गया,…
छह महीने के राशन-पानी और चालित चोके-चक्की की तैयारी के साथ राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर पहुँचे किसान अपने धैर्य की पहली सरकारी परीक्षा में ही असफल हो गए हैं ,क्या ऐसा मान लिया जाए ? जाँचें अब उनके सत्तर…
किसान आंदोलन भोपाल में दो कदम आगे बढ़ा है। नीलम पार्क पर जहां प्रशासन ने बैठने भी नहीं दिया है, तो वहीं मंडी गेट पर दो दिन तक नारों और भाषणों का दौर जारी रहा। अब आगे भी सीमित ताकत,…
किसी भी समाज में होने वाले आंदोलन उस समाज की जीवन्तता का प्रतीक होते हैं और इस लिहाज से देखें तो दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन, अपने तमाम सवालों के अलावा कृषि-क्षेत्र की जिन्दादिली का प्रतीक भी है।…
‘गणतंत्र दिवस’ की 26 जनवरी 71 साल पहले हमें अपने संविधान को अंगीकार करने की याद तो दिलाती ही है, साथ ही एक नागरिक की हैसियत से हमें अपने कर्तव्यों का बोध भी कराती है। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक…
कोरोना वायरस ने और कुछ किया हो, ना किया हो, उसने हमें पर्यावरण के लगातार बदहाल होते जाने की चेतावनी जरूर दे दी है। क्या इस चेतावनी से हमारी दुनिया कुछ सीख पाएगी? मौजूदा हालातों से तो ऐसा कतई नहीं…
किसान आंदोलन पर भी शिद्दत और नासमझी से सवाल उठाया गया है कि लाखों लोगों के भोजन (लंगर) और दूसरी व्यवस्थाओं का इंतजाम आखिर कैसे और कौन कर रहा है? कुछ अधिक ‘कल्पनाशील’ शहरी इसमें कनाडा, इंग्लेंड, अमरीका और वहां…
बीस जनवरी दो हज़ार इक्कीस को वाशिंगटन में केवल सत्ता का शांतिपूर्ण तरीक़े से हस्तांतरण हुआ है, नागरिक-अशांति की आशंकाएँ न सिर्फ़ निरस्त नहीं हुईं हैं और पुख़्ता हो गईं हैं। देश की जनता का एक बड़ा प्रतिशत अभी भी…
राजदीप अम्बानी-अदाणी को हो रहे नुक़सान की चर्चा करते हुए इस बात का ज़िक्र नहीं कर पाए कि किसी भी आंदोलन का इतना लम्बा चलना क्या यह संकेत नहीं देता कि सरकार के वास्तविक इरादों के प्रति किसानों का संदेह…
मधुरानी की गायकी के मुरीद लोगों की सूची बहुत लंबी है। इंदिरा गांधी और डॉ जाकिर हुसैन इन्हें खूब सुनते थे। उनके एलबम ‘इंतज़ार’ में दिलीप कुमार ने अपनी आवाज दी है। मुम्बई में जब इसकी रिकॉर्डिंग चल रही थी,…