गांधी पुण्‍यतिथि 30 जनवरी : गांधी से सीखने के युवा शिविर

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किसी विचार को सीखने, समझने के लिए शिविर और संभाषण बेहतरीन माध्यम होते हैं। गांधी विचार को सीखने, समझने के लिए भी नारायण भाई देसाई और डॉ. एसएन सुब्बराव ने इन्हीं पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया था। क्या होता था, इन शिविरों, संभाषणों का असर? ‘गांधी पुण्यतिथि’ पर बता रहे हैं, अशोक चौधरी


अशोक चौधरी

महात्मा गांधी ने सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को अपने रचनात्मक कार्यों में प्रमुख स्थान दिया था। उनके अनुयायी रहे नारायण देसाई और डॉ. एसएन सुब्बराव जैसे लोगों ने अपना जीवन गांधी विचार के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। महात्मा गांधी के निजी सचिव रहे महादेव भाई देसाई के पुत्र नारायण देसाई महात्मा गांधी की गोद में खेलकर बड़े हुए थे। ‘गांधी शताब्दी वर्ष 1969’ में नारायण देसाई ने ‘तरुण शांति सेना’ की स्थापना की और युवाओं को शांति सेना और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में लगाने हेतु देश भर में सैकड़ों शिविर आयोजित किए। इसी की एक झलक हम 1971 के बांग्लादेश निर्माण के समय देखते हैं जब ‘तरुण शांति सेना’ के युवाओं ने भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में आए शरणार्थियों के बीच सेवा और राहत के कार्य किए। उस दौरान लाखों बांग्लादेशी शरणार्थियों में भोजन वितरण, स्वच्छता व प्राथमिक चिकित्सा जैसी सुविधाएं प्रदान की गईं व संकट के दौर में अनुशासन बनाए रखा जिससे दुनियाभर में शांति, करुणा व भाईचारे का संदेश गया।

नारायण भाई कहा करते थे कि अहिंसा सिखानी पड़ती है, अर्थात अहिंसा के लिए भी प्रशिक्षण आवश्यक है। हर काल में युवाओं को भ्रमित करने के बहुत से कारण होते हैं जिससे वे अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं, लेकिन जब उन्हें प्रशिक्षण मिलता है तो अहिंसा एक संस्कार के रूप में उनके जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है। गांधीवादी लोगों में विनोबा ने ‘भूदान यात्रा’ के दौरान लाखों युवाओं को गांधी जीवन व मूल्यों का साक्षात्कार करवाया था। महात्मा गांधी ने समाज के समग्र विकास के लिए रचनात्मक कार्यक्रम बताए थे। गांधीवादी युवा शिविरों में उन रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रशिक्षण मिलता था जो न्यायपूर्ण, आत्मनिर्भर व नैतिक समाज की जीवन जीने की पद्धति है। नारायण भाई ने ‘तरुण शांति सेना’ के युवा शिविरों व ‘गांधी कथा’ के माध्यम से लाखों लोगों तक शांति, अहिंसा व रचनात्मक विकास का संदेश पहुंचाया।

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इस कड़ी में दूसरा बड़ा नाम डॉ. एसएन सुब्बराव का है जिन्हें युवा प्यार से ‘भाईजी’ कहकर संबोधित करते थे। सुब्बराव जी आज के युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय थे। गांधीवादी डॉ. एनएस हार्डिकर के सानिध्य में सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले सुब्बराव ने 1950 के दशक से छोटे-छोटे युवा शिविर लगाना प्रारंभ किया था। 1970 में उन्होंने दस्युग्रस्त चंबल घाटी में एक 10 महीने का सामाजिक, शैक्षिक शिविर लगाया था जिसमें देशभर के युवा सम्मिलित हुए थे। दस्युओं के आतंक के क्षेत्र में हृदय परिवर्तन व सकारात्मकता की एक नई लहर इस शिविर से पैदा हुई थी जिसके फलस्वरुप 1972 तक सैकड़ों डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था। यह गांधी की अहिंसा की ताकत थी। सुब्बराव जी ने मुरैना जिले के जौरा में ‘गांधी सेवा आश्रम’ स्थापित किया जो आज भी स्वावलंबन का प्रतीक बनकर लोगों को सेवाएं दे रहा है।

गांधी विचारों के प्रसार का सबसे श्रेष्ठ माध्यम शिविर होते हैं जहां सामूहिक जीवन, श्रम और सर्व-धर्म-सम-भाव जैसे कार्यक्रमों में राष्ट्रीय एकता की बुनियाद तय होती है। शिविरों से रचनात्मक संगठन बनता है जिससे सुसंस्कृत भारत का निर्माण होता है। समाज में अहिंसा व शांति स्थापना के लिए युवा शिविर बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन शिविरों में आने वाले युवाओं का स्वभाव विचार व चिंतन बदल जाता है। महात्मा गांधी चाहते थे कि युवा वर्ग शांति, सेवा और रचनात्मक कार्य करें। डॉ. एसएन सुब्बराव प्रतिवर्ष बाल-शिविर लगाते थे जिसमें देशभर से बच्चे अपने अभिभावकों के साथ भागीदारी करते थे। बाल्यावस्था में ही गांधी के विचारों व कार्यों की झलक देखकर उसकी अमिट छाप उनके मन पर पड़ती थी। बच्चों को ये संस्मरण जीवन भर याद रहते हैं। उनका जीवन भी गांधी के मार्ग को अंगीकार कर लेता है।

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मेरा संस्मरण भी है जब बचपन में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘मालगुडी डेज’ में ‘स्वामी और उसके फ्रेंड्स’ शीर्षक से एक एपीसोड आता था जिसमें स्वामी एवं उसके मित्र खेल रहे होते हैं और एक मैदान में आजादी के सेनानियों की सभा होती है। इस सभा में विदेशी कपड़ों के बहिष्कार पर बात होती है। उस भाषण से प्रभावित होकर स्वामी भी महात्मा गांधी और स्वतंत्रता के मूल्य से प्रेरित होता है। एक और उदाहरण है जिसमें खादी पहने, ‘गांधी टोपी’ लगाए लोगों की एक रैली निकलती है जिसमें लोग ‘भारत माता की जय,’ ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाते हैं। इनके साथ स्वामी व उसके दोस्त भी प्रेरित होकर नारे लगाने लगते हैं। इस धारावाहिक ने मेरे जैसे लाखों बच्चों के मन में महात्मा गांधी के प्रति जिज्ञासा बढाई थी।

आज 21 वीं सदी के भारत में युवा वर्ग बेरोजगारी, धार्मिक कट्टरपन, नशाखोरी सहित बहुत सी समस्याओं से जूझ रहा है। उसका स्वाध्याय कम हो गया है व मोबाइल स्क्रीन पर समय ज्यादा व्यतीत हो रहा है। इस कारण वह सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रहे दुष्प्रचार व बुराई को ग्रहण करके अपने लक्ष्य व पथ से भ्रमित हो रहा है।

एक शोध के मुताबिक भारत के एक तिहाई युवा नशे की गिरफ्त में हैं। ये युवा भारत के लिए गंभीर खतरा हैं। युवाओं का विवेक और उनकी चेतना मजबूत करके उनके जीवन को सकारात्मक दिशा देने में गांधी विचार प्रेरित युवा शिविर बड़ी भूमिका अदा करते हैं।इन शिविरों में भाग लेने पर देश के कोने-कोने से आए हुए लोगों से परिचय होता है वे भारत की सांस्कृतिक विविधता व समृद्धता से रूबरू होते हैं। उनमें क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति प्रेम बढ़ता है, आपसी गुणों का आदान-प्रदान होता है व एक-दूसरे से प्रेरणा भी प्राप्त करते हैं। शिविर के दौरान श्रमदान, स्वाध्याय, वैचारिक विमर्श, सर्वधर्म प्रार्थना व रचनात्मक कार्यक्रमों का अभ्यास करते हैं और बाद में यह उनके जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में गांधी युवा शिविर देश की बुनियाद को मजबूत करने का माध्यम हैं। (सप्रेस)

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