विनाश को विस्तार देते युद्ध !

कुमार प्रशांत

आजकल दुनियाभर में जारी युद्धों की अमानवीय क्रूरता, वीभत्स हिंसा और असंख्य मौतों के नतीजे में आखिर क्या मिलता है? दवाओं जैसी अकूत पूंजी कूटते, हथियारों के सौदागरों की कमाई के अलावा इनसे किसी पक्ष को, किसी तरह की कोई जीत हासिल हो पाई है? और युद्धों के इस गोरखधंधे का कोई विपक्ष भी है? ऐसे में युद्धों को विनाश का समानार्थी मानने में क्या हर्ज होना चाहिए?

आजकल की राजनीतिक शैली में बात कुछ ऐसी बना दी गई है कि देश के बारे में, फौज के बारे में, युद्ध के बारे में, देश की सुरक्षा के बारे में कुछ भी न बोलो, न पूछो, न सोचो ! पहलगाम के बाद तमाम विपक्ष ने कह दिया कि हम सरकार के साथ हैं ! यह घबराई हुई, जड़विहीन, राजनीतिक दृष्टि से कायर विपक्ष की सोच है। संकट का आसमान रचना और फिर उस आसमान में अपने शिकार करना सरकारों का पुराना हथकंड्डा है। ऐसे में विपक्ष की एक ही भूमिका होनी चाहिए कि हम हर हाल में देश के साथ खड़े रहेंगे। हमारी इस भूमिका से सरकार को जितनी मदद, जितना समर्थन मिलता है, उससे हमें एतराज़ भी नहीं है, लेकिन सरकार की आंखों हम देखें, सरकार के कानों हम सुनें तथा सरकार के पांवों हम चलें, यह कैसे हो सकता है? यह तो बौनों का बला का संकट है और इससे घिरा हमारा विपक्ष बौने-से-बौनातर हुआ जा रहा है।

तीन दिन के युद्ध के बाद, गंभीर चर्चा व समीक्षा की हर संभावना को खत्म करते हुए प्रधानमंत्री ने संसदीय विपक्ष की आवाजों को चुन-चुनकर विदेश-यात्रा पर भेज दिया। कहा कि विश्व मंच पर भारत सरकार का पक्ष अच्छी तरह रखने का राष्ट्रीय कर्तव्य निभाने की चुनौती है, सो आप सब तैयार हो जाएं। आख़िर पाकिस्तान को जवाब देना है न ! कहने की देर थी कि सभी तैयार हो गए। किसी ने नहीं कहा कि हमें अपनी पार्टी की सहमति लेनी पड़ेगी ! जब राष्ट्रीय कर्तव्य निभाना हो, तो पार्टी की क्या बात है। पार्टी से राष्ट्र बड़ा होता है कि नहीं ! नतीजे में जहां, जिसे, जैसा मौका मिला, उसने वहां, वैसा सरकार का पक्ष रखा। लौटने पर सबने पाया कि वे तो विदेश से लौट आए हैं, लेकिन उनकी आवाज कहीं विदेश में ही रह गई है। आज हमारे संसदीय विपक्ष के पास न चेहरा है, न आवाज़ !

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जब विपक्ष के ऐसे हालात हों और सत्तापक्ष के भीतर सत्ता-सुख व अहंकार के अलावा कुछ हो ही नहीं, तो यह सवाल कौन पूछे कि अंगुलियों पर गिने जाने जैसे आतंकवादी हमारी सीमा में घुस आए और उन्होंने हमारे 26 नागरिकों की हत्या कर दी, इतने से सारा देश कैसे खतरे में आ गया? पहलगांव में घुस आए आतंकवादियों व उन नागरिकों की हत्या से देश खतरे में नहीं आया था, बल्कि वह खतरे में इसलिए आया कि आप कश्मीर की सीमा की सुरक्षा में विफल रहे। केंद्र सरकार की सीधी निगरानी में जो कश्मीर है, चोर उसकी दीवार में सेंध लगा लेता है तो यहां खतरा आपका निकम्मापन है। खतरा यहां है कि आप उस आतंकी कार्रवाई का जवाब देने के लिए ऐसा रास्ता अख़्तियार करते हैं जो काइंया अंतरराष्ट्रीय शक्तियों को अपना खेल खेलने के लिए उकसाता है।

अलबत्ता, सच भी कहीं-न-कहीं से अपना सर उठा ही लेता है। हमारे वायुसेना प्रमुख एयरमार्शल एपी सिंह और बाद में ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ जनरल अनिल चौहान की बात ऐसी नहीं है कि हम उसे नजरंदाज करें। वे कह रहे हैं कि तीन दिनों का यह युद्ध दोनों तरफ़ को बेहद नुक़सान पहुंचा गया है। पाकिस्तान का नुक़सान ज्यादा हुआ है, लेकिन उसने हमारा जितना नुक़सान किया है, वह स्थिति को ख़तरनाक बनाता है। पाकिस्तान ने हमारे विमान भी गिराए और सैनिक अड्डों को भी नुक़सान पहुंचाया। यह युद्ध रुकना ही चाहिए था, क्योंकि इस युद्ध से हासिल कुछ नहीं हो सकता था। परिस्थिति का यह आकलन व अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का दवाब हमें युद्धविराम तक ले आया।

हमें यह सच्चाई समझनी चाहिए कि हथियार के व्यापारियों से खरीद-खरीदकर जो जखीरा हम भी और पाकिस्तान भी जमा करता रहता है, वह हर देश को करीब-करीब एक ही धरातल पर ला खड़ा करता है। इसलिए आज की दुनिया में कोई लड़ाई अंतिम तौर पर किसी को जीत नहीं दिलाती, बल्कि विनाश ही आज के युद्ध का सच है। रूस-यूक्रेन का दो बरस से ज्यादा लंबा युद्ध  कौन जीत रहा है? दोनों बर्बाद हो रहे हैं। अमरीका व यूरोप की फौजी मदद से लड़ रहा यूक्रेन और हथियारों का अकूत जखीरा रखने वाला रूस – दोनों का दम फूल रहा है। दोनों का देश बर्बाद हो रहा है। फौजी भी मारे जा रहे हैं, नागरिक भी; शहर-गांव-कस्बे सब मलबों में तब्दील हो रहे हैं। ऐसे में आप जीत-हार की बात क्या पूछेंगे !

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पूछने वाला सवाल यही है कि बताइए, कितना विनाश हो चुका है और कितना विनाश करके आप रुकेंगे? इसराइल ने ईरान पर हमला कर किया क्या? या फिर ट्रंप ने वहां अपनी नाक घुसेड़ कर क्या किया? आप सोचिए, अगर ईरान ने अमरीका पर हमला बोला तो क्या होगा? जीत या हार? नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा। विश्वयुद्ध भी नहीं होगा, वैश्विक विनाश होगा – शायद वैसा, जैसा दुनिया ने अब तक देखा नहीं है।

कोई आश्चर्य नहीं कि देश में आज एक ही विपक्ष राहुल गांधी बचा है, लेकिन इस एक आदमी का विपक्ष भी हर कदम पर ठिठकता, भटकता और असमंजस में पड़ा दिखाई देता है। यह इसलिए कि वह हर तरफ़ से अकालग्रस्त है – अकाल संख्या का नहीं, प्रतिभा, प्रतिबद्धता का अकाल है ! किसी भी नेता के लिए निर्णायक भूमिका निभाने या उसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कुछ आला सहकर्मियों की ज़रूरत होती है। ऐसे सहकर्मी बने-बनाए नहीं मिलते, बनाने पड़ते हैं। राहुल के पास वे नहीं हैं, क्योंकि अब तक का अनुभव बताता है कि उन्हें ग़लत सहकर्मियों को चुनने में महारत हासिल है। हिंसा में से वीरता तो पहले ही निकल चुकी है, अब युद्ध में से जीत-हार भी निकल गई है। बची है विशुद्ध हैवानियत- क्रूरता, अश्लीलता और अपरिमित विनाश ! कोई राहुल गांधी यदि पूछता है कि बताइए, तीन दिनों के इस युद्ध में हमारा कितना नुक़सान हुआ, कितने विमान गिरे, कितने जवान मरे तो यह देशभक्ति की कमी या अपनी सेना की क्षमता पर भरोसे की कमी जैसी बात नहीं है। यही सवाल है जो पाकिस्तान में भी पूछा जाना चाहिए, इसराइल में भी, यूक्रेन और गाजा व ईरान में भी। आज किसी भी कारण जो जंग का रास्ता चुनते हैं या जबरन किसी को जंग में खींच लाते हैं उन सबके संदर्भ में यही सबसे अहम सवाल है जो आंखों में आंखें डालकर पूछा जाना चाहिए। लेकिन पूछे कौन? जिस विपक्ष की ज़ुबान खो गई है वह पूछे भी तो कैसे? (सप्रेस)

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