विनोबा जयंती : सरकार नियामत नहीं बरसाती

प्रस्तोता-महेन्द्रकुमार

विनोबा भावे की जयंती हमें याद दिलाती है कि सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर सेवा ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है। उनका विचार था कि गांव का भला गांव के लोगों के हाथ में है, न कि केवल सरकार के भरोसे। सत्य, अहिंसा और आत्मनिर्भरता पर आधारित उनका संदेश आज भी समाज में एकता, नैतिकता और स्थायी विकास की राह दिखाता है।

11 सितंबर : विनोबा जयंती

प्रस्तोता महेन्द्रकुमार

हम लोग यही जानते हैं कि राजनीति के द्वारा सत्ता प्राप्त करके ही सेवा की जा सकती है। याने गांवों की सेवा कोई बहुत बड़ा बिच्छू है और उसे राजसत्ता के चिमटे से पकड़ा जाए। राजनीति में पड़े हुए कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जिन्हें सेवा करने की इच्छा होती है लेकिन उनके दिमाग पुराने जमाने के होते हैं। इसलिए उन सेवापरायण, धर्मनिष्ठों को लगता है कि सत्ता भी अपने हाथ में रहे, तो ठीक होगा। अंग्रेजी शासन के समय उस राज्य को उलटकर सत्ता अपने हाथ में ली जाए, यह एक प्रमुख कार्यक्रम ही बन गया था। उन दिनों राजनीति में बहुत से लोग सद्भावना के साथ काम कर रहे थे। लेकिन स्वराज्य के बाद क्या हुआ ? सत्ता किसके हाथ में रहे, यही वाद-विवाद शुरु हो गया। देश विभाजन, फिर भी कश्मीर-समस्या का लटकते रहना, आपस में भाई-भाई में भी अनबन, भाषावार प्रान्तों के झगड़े-ये सारी समस्याएं  हम आपसे छिपी नहीं हैं। अगर सेवा के लिए सत्ता चाहिए तो फिर ये झगड़े क्यों? सारांश, जब तक लोग सत्ता रूपी देवता के भक्त बने रहेंगे, तब तक ये झगडे़-फसाद चलाते ही रहेंगे और सेवा को महत्व प्राप्त न होगा। उसका गौणत्व ही बना रहेगा और सर्वत्र अशांति ही रहेगी।

मैं किसी को ज्यादा अमीर देखता हूं तो मुझे दुःख होता है। मैं अपने अमीर मित्रों से कहता रहता हूं कि खबरदार रहो, जैसे दुःख में खतरा है, वैसे ही सुख में भी है। चढ़ाई में खतरा है, तो उतराई में भी है। उतराई हो तो बैल जोर से दौड़ना चाहते हैं। उस समय उन्हें काबू में न रखा जाए तो गाड़ी गड्ढ़े में गिरने का खतरा रहता है। जैसे उतराई पर बैल बेकाबू होते हैं, वैसे ही सुख में, ऐशो-आराम में इन्सान दौड़़े जाता है और पता नहीं चलता कि वह किस गड्ढ़े में गिरेगा। जैसे चढ़ाई पर बैल आगे बढ़ना ही नहीं चाहते, उन्हें पीछे से ढ़केलना पड़ता है, वैसे ही दुःख में हमारी इन्द्रियां, आगे बढ़ने से इंकार करती हैं। चढ़ाई और उतराई दोनों हालत में इंसान को सावधान रहना ही पड़ता है। हां, लेकिन जहां ऊंचा-नीचा न हो, बिलकुल समान, सीधा रास्ता हो, वहां सावधान रहने की जरुरत नहीं पड़ती। ऐसे रास्ते पर बैल आगे बढ़ते रहते हैं और गाड़ीवाला सो भी जाता है। इस तरह यूरोप-अमेरिका का अनुभव दिखा रहा है कि जहां बहुत ज्यादा सुख होता है, वहां भी खतरा है। अपने देश का अनुभव बता रहा है कि जहां बहुत ज्यादा दुःख-गरीबी होती है, वहां भी खतरा है। टीले और गड्ढ़े हों तो वहां खेती नहीं हो सकती। इसलिए करना यह चाहिए कि टीले की मिट्टी खोदकर गडढ़े में भरनी चाहिए। तभी खेती होगी।          

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घर में भाई-भाई प्यार से रह सकते हैं और एक-दूसरे के दुश्मन भी बन सकते हैं। भाई-भाई जब दुश्मनी करते हैं, तब बेरहमी से दुश्मनी करते हैं। दुश्मन भी दुश्मनी करता है, लेकिन वह हमारे उतने भेद नहीं जानता, जितने कि भाई जानता है। भाई सिर्फ संगदिल नहीं, तंगदिल भी बनता है। दुनिया में ज्यादा से ज्यादा प्यार दोस्त करता है या भाई करता है। दुश्मन दोस्ती नहीं कर सकता है और दोस्त दुश्मनी नहीं कर सकता है। लेकिन भाई दोनों कर सकता है। इसलिए हिन्दुस्तान में हम सब भाई प्यार से रहेंगे तो बहुत बड़ी इज्जत होगी, जीनत होगी, इसमें कोई शक और सुबहा नहीं है। अगर हम ऐसा न कर सकें तो यहां झगड़ों की कोई इन्तहा (सीमा) नहीं है। ये झगड़े एक कौम में भी हो सकते हैं। शिया और सुन्नी झगड़ते हैं। पंजाब के अखबारों में सिखों के झगड़ों की खबरें आती हैं। ये सब कौम के झगड़े हैं।

 अल्ला और हमारे बीच में है-मुल्ला। इबादत का काम हमारी तरफ से मुल्ला करेगा और सेवा का काम करेगा नुमाइन्दा। तब फिर हम क्या करेंगे? खायेगे, पीयेंगे और रोयेगें (अच्छी हालत के अभाव में)। इबादत और खिदमत जैसी जिन्दगी की महत्व की बातें हम तरजमान तथा नुमाइन्दों पर रखेंगे, तब तक हम सुखी नहीं बन सकते। अगर इत्तफाक से हम सुखी बन भी गये, तब भी वह गलत होगा। दूसरे की अक्ल से सुखी या दुःखी बनना, दोनों ही गलत है।

  आज लोगों को यह समझाया जाता है कि हमें चुन कर दे दो तो हम आपको स्वर्ग में ले जाएंगे। दूसरे को वोट दोगे तो वह तुम्हें नर्क में ले जाएगा। हर कोई आकर यही समझाता है। कोई यह नहीं कहता कि ’तुम्हारा भला तुम करो। गांव का भला तुम लोगों के हाथ में है।’ तुम्हारा स्वर्ग और नर्क तुम्हारे हाथ में है। वेलफेयर स्टेट (कल्याणकारी राज्य) के नाम से प्रजा का भला करेंगे, ऐसी भावना रखते हैं। यह नहीं सोचते हैं कि गांव का भला गांव करेगा। जनता का भला हम करेंगे, इस भावना में बहुत ही लोगों के दिमाग उलझे हैं और इसके कारण वे सत्ता के पीछे पड़ते हैं। जो लोग सत्ता में नहीं हैं वे सत्ता की अभिलाशा रखते हुए सत्तासीन लोगों से द्वेश करते हैं। जनता में सीधा जाकर सेवा करने काम कोई नहीं कर रहा है।

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 कल्याण राज्य में राज्य चलाने वाले लोग अच्छे हों तो प्रजा सुखी होती हैं और खराब हों  तो प्रजा दुःखी होती है। यद्यपि यह जमाना लोकशक्ति का है, फिर भी जैसा पुराने राजा-महाराजाओं के जमाने में चलता था, वैसा ही आज भी चल रहा है। योजना करना सरकार का काम न होकर लोगों का काम होना चाहिए। सरकार का काम है-सिर्फ मदद देना। लेकिन आज योजना सरकार करती है, पैसा भी सरकार खर्च करती है और योजना के अमल की भी जिम्मेवारी सरकार की ही होती है। इससे लोग समझते हैं कि जैसे आसमान से बारिश बरसती है, वैसे ही सरकार की तरफ से हम पर नियामतें बरसे और हमारा भला हो। लेकिन ऐसा चाहने वाले लोग इस जमाने के लायक नहीं हैं। इस जमाने में वे टिक नहीं सकेंगे।

 इन दिनों कहा जाता है कि दुनिया में नास्तिकता बढ़ रही है। इससे सभी धार्मिक भयभीत हैं। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मुझे उस नास्तिकता से कोई खतरा नहीं लगता। मैं उन ईमानदार नास्तिकों को लाख गुना पसन्द करता हूं, बनिबस्त उन आस्तिकों के, जो भगवान का नाम लेकर इन्सान को चूसते हैं। अल्लाह का नाम लेकर दीन, हीन, गरीबों को ही चूसने वालों पर अल्लाह कैसे खुश होगा? गीता का नाम लेने वाले गरीबों को लूटते रहेंगे तो क्या उन्हें धार्मिक कहा जा सकेगा? धर्म का नाम लेने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता और न भगवान का नाम लेने से ही भक्त होता है। जिसके जीवन में ईमान न हो, आचरण में अहिंसा न हो, व्यवहार में धर्म न हो, वह आस्तिक नहीं हो सकता। जिस नास्तिक के पास सचाई हो, वह नामधारी आस्तिक से भगवान के ज्यादा नजदीक है।  

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 नैतिक मूल्यों की गिरावट का सबसे बड़ा कारण लोगों का यह विश्वास है कि हम सारा काम सत्ता के जरिये करेगें। इसीलिए सारी योजना सत्ता प्राप्त करने की ही बनायी जाती है। सत्ता प्राप्ति के बाद फिर आपस-आपस में संघर्ष शुरु हो जाता है। कोई सत्ता में चला गया और कोई नहीं जा सका तो उनका आपस-आपस में मत्सर शुरु हो जाता है। ’अमुक शख्स सिर्फ 6 साल जेल में था, वह तो मंत्री बन गया और मैं 9 साल जेल में था, फिर भी मुझे मंत्री नहीं बनाया गया।’ इस प्रकार के व्यवहार का परिणाम यह हुआ है कि जनता में पुरुषार्थहीनता आ गयी है। सब अलग-अलग टुकड़ों मेंं बंट गए हैं। आज आपस में किसी की नहीं बनती।

जनता में एक पक्ष का नेता जाता है, दूसरे पक्ष के नेता को गाली देता है। दूसरे पक्ष का नेता भी जाकर वही काम करता है। जनता दोनों की गालियां सुनती है, दोनों की गालियां इकट्ठी करती है, और फिर दोनों को गालियां देती है। मतलब यह कि जनता में अब किसी के लिए कोई आदर नहीं रहा है। ऐसी आदरशून्य जनता से हिन्दुस्तान की तरक्की कैसे होगी? यह निष्क्रियता खतरनाक है।(सप्रेस)     

महेंद्रकुमार सर्वोदय प्रेस सर्विस के संस्थापक संपादक एवं सक्रिय सर्वोदय कार्यकर्ता थे। वे लंबे समय तक गांधी शांति प्रतिष्‍ठान, अ. भा. सर्व सेवा संघ सहित अनेक रचनात्‍मक संस्‍थाओं से सम्‍बद्ध रहे।   

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