ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तरफ लौटने का वक्त

सुरेंद्रसिंह शेखावत

सुरेंद्रसिंह शेखावत

कोविड-19 से बचने के लिए लगाए गए ‘लॉक डाउन’ के तीसरे चरण में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अब कोरोना के बाद क्‍या? आजादी के सत्‍तर सालों में हमने उद्योग, शहरीकरण और मशीनीकरण का उपयोग करके देख लिया है, लेकिन कई अर्थशास्‍त्री, समाजशास्‍त्री इसे असफल मानते हैं। ऐसे में क्‍या कृषि और गांव-आधारित अर्थ-व्‍यवस्‍था कारगर हो सकती है?

कोरोना महामारी  के विश्वव्यापी संकट के बीच भारत में करोड़ों प्रवासी मजदूरों के पलायन का संकट उठ खड़ा हुआ है। तालाबंदी के आरंभिक दौर में ही इसे लागू करने की हड़बड़ाहट के चलते राज्य सरकारों द्वारा बड़े उद्योगों और निर्माण इकाइयों को मजदूरों के प्रभावी प्रबन्धन बाबत कोई कठोर निर्देश जारी नहीं किए गए। जिसके चलते बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने घरों की ओर रवाना हो गए। पैदल चलते मजदूरों के रेले-के-रेले जब मीडिया की खबर बने तो सरकारों पर भी दबाव बना और तालाबंदी के 30-35 दिन बाद बसों और रेलगाड़ियों के द्वारा प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की सरकारी तैयारियां शुरू हुईं।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 40 करोड लोग दैनिक मजदूरी से अपना जीवन-यापन करते हैं। यह देश की सकल जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। इसी बीच उद्योग धंधे और निर्माण कंपनियों में काम करने वाले करोड़ों मजदूरों की घर वापसी से यह तो तय हो ही गया कि निकट भविष्य में हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आने वाली है। महामारी की भयावहता और उससे उपजा वैश्विक आर्थिक संकट, जो हमारे देश के सभी उद्योग-धंधों को प्रभावित कर रहा है, के मद्देनजर इतनी बड़ी संख्या में घर वापसी कर रहे मजदूर बहुत जल्दी वापस अपने कार्य-स्थलों पर लौटेंगे, ऐसा प्रतीत नहीं होता।

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यह पलायन मूल रूप से औद्योगीकरण और शहरीकरण की नीति का दुष्प्रभाव है जो अब महामारी के समय विभीषिका के रूप में हमारे सामने आया है। अंधाधुंध मशीनीकरण, औद्योगीकरण और शहरीकरण के जो दुष्परिणाम हम आज भुगत रहे हैं, महात्मा गांधी ने उसकी कल्पना सौ साल पहले ही कर ली थी। इसीलिए उन्होंने मशीनीकरण की पश्चिमी सभ्यता को *शैतानी सभ्यता कहा था।

गांव को भारत की आत्मा मानने वाले  गांधी ने भारत जैसी बड़ी आबादी के देश के लिए ग्राम स्वराज्य का आर्थिक मॉडल समझाया था, लेकिन बापू के ही राजनीतिक उत्तराधिकारी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गांधी के आर्थिक विचारों की बजाय औद्योगीकरण का रास्ता चुना। पश्चिम के पूंजीवादी और मार्क्स के साम्यवादी आर्थिक विचारों के बीच सन्तुलन रखने वाले नेहरू का नया रास्ता भारत के अनुकूल न था, यह आज प्रमाणित हो रहा है। गांधी ने भारत की परिस्थितियों के अनुकूल ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था का स्वप्न संजोया था, लेकिन दुर्भाग्य से उनके उत्तराधिकारियों ने उसे ध्वस्त कर दिया।

बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा था कि पूंजीवाद अपने ही पलट कर आए शस्त्र से घायल होगा। यह संकट पर्यावरणीय क्षरण और आय के आसमान वितरण के रूप में हमारे सामने आया है। बढ़ते शहरीकरण ने न केवल विकास के सारे दावों को झुठला दिया है, बल्कि गरीबी, कुपोषण, आय के असमान वितरण, पर्यावरणीय क्षति, जल और वायु के असीमित प्रदूषण के दुष्प्रभाव सामने आए हैं। यह जरूरी था कि गांवों और शहरों के बीच संतुलन रहे, लेकिन इसे हम नहीं कर पाए तो हमारा काम प्रकृति कर रही है। इस संकट में केवल कामगार ही गांव नहीं लौटे हैं, बल्कि समृद्ध और सक्षम लोगों को भी गांव की शुद्ध हवा और प्रदूषण मुक्त वातावरण की याद आई है।

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अब बीते पर अफसोस करने का वक्‍त नहीं है, बल्कि इतिहास से सबक लेकर वर्तमान हालातों में महामारी के कारण चौपट हो चुकी अर्थव्यवस्था को फिर नए सिरे से खड़ी करने का है। प्रकृति ने महामारी के रूप में फिर से हमें अपनी जड़ों की तरफ लौटने का अवसर दिया है। जानकार यह तो मानते ही हैं कि वैश्विक आर्थिक संकट के बीच जहां पश्चिमी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पूरी तरह धराशायी हो जाएगी, वहीं हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह सुखद पहलू है कि दूसरे मुल्कों की तुलना में वह भारत को बचा लेगी।

करोड़ो की संख्या में घर लौट रहे मजदूरों के रोजगार का प्रबंधन कृषि या कृषि आधारित लघु एवं कुटीर उद्योगों के जरिए किया जा सकता है और टिकाऊ एवं सतत विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। सरकार के नीति निर्माताओं को निश्चित ही इस मंदी रूपी चुनौती को भारत के लिए अवसर के रूप में देखना चाहिए। वे इस अवसर का लाभ उठाते हुए ग्रामीण भारत की आवश्यकता के अनुरूप नई नीतियां बनाकर क्रियान्वयन करावें, ताकि गांवों की ओर लौट चुकी श्रम-शक्ति को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मिल सके तथा प्रकृति एवं मानव के मध्य परस्पर निर्भरता के अनुकूल ढांचागत, टिकाऊ विकास सम्भव हो।

ग्राम स्वराज्य की अवधारणा में केवल गांवों के विकास की ही बात नहीं की गई है। यह आर्थिक चिंतन तो सम्पूर्ण, सतत विकास की बात कहता है, जिसमें शहर और गांव सब शामिल हैं, परंतु इस व्यवस्था में अर्थव्यवस्था की मूल ईकाई गांव को मानकर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप  मानव और प्रकृति के परस्पर निर्भरता वाले विकास के मॉडल की अवधारणा दी गई है। औद्योगीकरण पर जोर देने के बाद भी, आज भारत की बहुसंख्यक आबादी का रोजगार कृषि पर निर्भर है। यह सोचने की बात है कि सत्तर सालों में इंडस्ट्री, कॉरपोरेट और सर्विस सेक्टर मिलकर भी कृषि क्षेत्र जितना रोजगार नहीं दे पाए तो फिर क्यों न एक बार बजट का बड़ा हिस्सा कृषि और कृषि आधारित लघु उद्योगों के विकास को समर्पित करते हुए ग्राम स्वराज की अवधारणा  के अनुरूप रास्ता तय किया जाए। निश्चित ही यह नया दौर भारत का होगा। इतनी बड़ी मानव श्रम की ताकत और नई तकनीक के बेहतर समन्वय से हम इक्कसवीं सदी का नया भारत बना पाएंगे। (सप्रेस)

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