इस हफ्ते भारत से अमरीका को निर्यात होने वाले सामानों पर ‘टैरिफ’ के नाम से लगाए गए भारी-भरकम शुल्कों ने हमें बदहवास कर दिया है। नतीजे में हमारी विदेश नीति तरह-तरह के कौतुक दिखा रही है, लेकिन क्या इस गफलत के पीछे हमारी घरेलू नीतियां जिम्मेदार नहीं हैं?
देश की गर्दन पर डोनॉल्ड ट्रंप का वार हो चुका है। देश हलाल हो रहा है और हम पूछ रहे हैं कि यह ‘झटका’ है या ‘हलाल?’ ट्रंप कह रहे हैं कि अपनी गर्दन बचा सको तो बचा लो, सवाल मत पूछो! जब अप्रैल में टैरिफ़ की जंग शुरू हुई थी तब मैंने लिखा था कि इससे भारतीय कृषि क्षेत्र किस तरह के खतरों से घिर सकता है। हालांकि तब मीडिया आश्वस्त था कि ट्रंप और मोदी की जोड़ी तो ‘रब की बनाई हुई’ है, यह कैसे टूटेगी!
कोविड के बाद भारत सरकार, भारतीय बाजार, भारतीय पूंजीपति और मोदी-अंधभक्त, सभी जुट गए थे कि अब तो गया चीन ! कहा जा रहा था कि चीन में उत्पादन कर रही सारी कंपनियों का साम्राज्य जड़ से उखड़कर भारत में आ जाएगा ! नतीजे में हम बन जाएंगे चीन के विकल्प यानी दूसरा चीन ! सरकार ने ‘उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना’ (पीएलआई) बनाई और इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, वैकल्पिक ऊर्जा, केमिकल, कपड़ा और ऑटो सेक्टर में हज़ारों करोड़ के निवेश भी होने लगे।
आजादी के बाद पहली बार लगने लगा था कि बड़े विकसित देशों, विशेषकर अमेरिका के बाजार का दरवाज़ा अब भारत के लिए ‘खुल जा सिम-सिम!!’ कहते ही खुल जाएगा। हम दौड़ भी पड़े थे अमेरिका की गोद में बैठने के लिए, लेकिन पाकिस्तान ने ट्रंप की गोद कभी छोड़ी ही नहीं थी। हम यह भूल ही गए थे कि गोद जिसकी है, वही तय करेगा न कि किसे बिठाना है और किसे नहीं? अब भारत की अजीब-सी स्थिति हो गयी है। टैरिफ़ की हड्डी गले में फ़ंस गयी है – न निगलते बन रही, न उगलते!
27 अगस्त से भारत पर लगाए जाने वाले अमेरिका के 50% टैरिफ़ से हमारा कौन-सा कृषि-आधारित सेक्टर सीधा, सर्वाधिक प्रभावित होगा और कौन-सा अप्रत्यक्ष रूप से? हमारा मत्स्य उद्योग पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर है। भाजपा सरकार ने मत्स्य पालन और जलीय कृषि की बढौतरी के लिए 2015 में ‘नीली क्रांति’ की नींव रखी थी। उसके बाद इस पर हज़ारों करोड़ रुपए का निवेश हुआ – ‘नीली क्रांति योजना,’ ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना,’ ‘राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास योजना,’ बजट में प्रावधान, निर्यातकों के लिए छूट और दूसरी अनेक संरचनाएं बनाई गयीं।
यह निवेश उत्पादन के स्तर पर इसलिए किया गया, ताकि उसका निर्यात किया जा सके। भारत के 60 हज़ार करोड़ रुपयों (2024-25) के समुद्री-खाद्य निर्यात में, ‘फ्रोजन श्रिंप’ (बर्फ में जमाई हुई झिंगा मछली) का सबसे बड़ा हिस्सा है। कुल समुद्री-खाद्य निर्यात का 66% इसी एक उत्पाद से मिलता है और इसका लगभग 92% अमेरिका जाता है। अमेरिका पर इस तरह की निर्भरता का कोई कारण नहीं था। वह भारत से आने वाले समुद्री आयात पर हमेशा से ड्यूटी लगाता आया है। बीच में कुछ साल ड्यूटी हटायी थी, पर 2018 के बाद से लगातार यह ड्यूटी ऊंची रखी गई, ताकि भारत के निर्यातकों को इक्वाडोर के निर्यातकों से कड़ी टक्कर मिलती रहे। यह कैसी योजना थी? पिछले दस साल में भारत ने लगभग साढ़े छत्तीस हज़ार करोड़ रुपयों का सीधा निवेश इस ‘नीली क्रांति’ में किया और आज वही सेक्टर भारत की संप्रभुता पर ख़तरा बनकर खड़ा है !
ऐसा ही एक और सेक्टर है, कपड़ा उद्योग ! पिछले 10 सालों में ‘चाइना प्लस’ की नीति के तहत हमारे इस उद्योग की रीति-नीति बनी। ट्रंप जब पहली बार राष्ट्रपति बने थे तो उन्होंने चीन के जिंग्जियांग क्षेत्र के कपास से बनने वाले हर सामान पर जुलाई 2020 में यह कहकर प्रतिबंध लगा दिया था कि वहां अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। इसका नतीजा यह हुआ कि 2020-2022 के दौरान भारत ने रेकॉर्ड टेक्स्टाइल का निर्यात किया। यह संभव हो पाया, क्योंकि हमारी उत्पादन क्षमता ऐसे निर्यात के लिए तैयार की गयी थी।
बाद में राष्ट्रपति बाइडेन ने भी ये प्रतिबंध जारी रखे जिसके चलते भारत में टेक्स्टाइल सेक्टर में ‘चाइना प्लस’ के तहत चीनी उत्पादन का भारतीय विकल्प खड़ा करने की सरकारी योजना बनी। किसी समय दुनिया का सबसे अच्छा कपड़ा भारत में बनता था। टेक्स्टाइल सेक्टर आज भी सबसे ज्यादा, लगभग 5 करोड लोगों को सीधे रोजगार देता है, लेकिन गलत सरकारी योजनाओं के चलते यही सेक्टर हमारे गले की हड्डी बन गया है। मोदी सरकार की विशेष कोशिश रही है कि टेक्स्टाइल सेक्टर को प्राकृतिक रुई की बजाए कृत्रिम टेक्स्टाइल की तरफ मोड़ा जाए।
आप ‘हर घर झंडा’ अभियान तो नहीं भूले न? सन् 2022 के पहले भारत के राष्ट्रीय ध्वज की शर्त थी कि वह खादी का बना हो। हर घर झंडा पहुंचाने की सरकार की ललक तब भी क्रांतिकारी बन जाती, यदि प्रधानमंत्री खादी की इस शर्त का मान रखते और खादी के उत्पादन को इतना बढ़ा देते कि उसी से लाखों रोजगार खड़े हो जाते, लेकिन वह सरकार की समझ नहीं, केवल सनक थी जिसे पूरी करने के लिए झंडा सस्ता बनाने के चक्कर में खादी की शर्त हटा दी गई। नतीजे में ‘हर घर तिरंगा’ पोलिएस्टर से बनने लगा जो मुख्य रूप से चीन से आयात होता है। प्राकृतिक रुई के प्रति ऐसे उदासीन रवैए का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम हुआ कि देश में कपास का उत्पादन पिछले दो दशकों के निचले स्तर पर है और आज हम कपास के रिकॉर्ड आयातकर्ता बन गए हैं।
कृत्रिम धागों से बने जिस टेक्स्टाइल को बढ़ाने के पीछे मोदी सरकार पिछले दस सालों से जुटी है, उसका हाल भी ‘नीली क्रांति’ जैसा ही है। ‘उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना,’ ‘पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल पार्क योजना,’ ‘संपूर्ण वस्त्र क्लस्टर विकास योजना,’ ‘टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड स्कीम’ जैसी योजनाएं इन दस सालों में बनायी गयीं और हज़ारों करोड़ रुपयों का निवेश भी हुआ। सन् 2024-25 में 51 हजार करोड रुपयों की केवल चादरें, टॉवेल और घर सजावट के अन्य सामानों के निर्यात का आधा अमेरिका को निर्यात हुआ है। आज भारत का मत्स्य उद्योग और टेक्स्टाइल उद्योग अमेरिकी बाजार पर अपनी अति-निर्भरता के कारण मुसीबत में है जिसका सीधा या परोक्ष असर भारत के कृषि क्षेत्र पर भी पड़ेगा।
भारत का कुल निर्यात उसके ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) का केवल 20% है, लेकिन तेजी से विकास करने की होड़ में पिछले दस साल की आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम दिखाई देने लगे हैं। देश की निर्यात योजना भी उसका एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन अब विश्व व्यापार का स्वरूप बदल चुका है। वैश्वीकरण की बस ने यू-टर्न ले लिया है और भारत अपने आने वाले पचास साल की योजना ‘मेक इन इंडिया’ बना रहा है! पहले देश ‘मुक्त व्यापार,’ निवेश, तकनीक और लोगों की आवाजाही बढ़ा रहे थे, अब कई देश स्थानीय उत्पादन, आत्मनिर्भरता और सीमाओं को मज़बूत करने की ओर लौट रहे हैं। नेहरू की गुट निरपेक्ष-नीति के विपरीत और अमेरिका की मान्यता पाने की चाह में आज भारत न घर का है, ना घाट का! (सप्रेस)


