दस मिनट में कोई सामान आप तक पहुंचाने वाले डिलीवरी बॉय या ‘गिग वर्कर्स’ लगभग हर शहर में बगटूट भागते, अपनी मोटर साइकलें दौड़ाते आपको दिख जाएंगे। क्या उनकी इस बदहवासी में सिर्फ कमाई का प्रोत्साहन भर रहता है? या उन पर ‘दस मिनट’ का भारी-भरकम आतंक भी सवार रहता है?
संजीव चांदोरकर
यह कोई ग्राहक सेवा नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य ‘गिग वर्कर्स’ के मन में दहशत पैदा करना था और वह वैसा ही रहने वाला है! ‘10 मिनट में डिलीवरी’ का उद्देश्य ‘गिग वर्कर्स’ पर दबाव बनाना था। खबर है कि यह मॉडल बंद किया जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि यह सुविधा ग्राहकों के बजाय ‘गिग वर्कर्स’ पर कॉर्पोरेट पूंजी का दबदबा बनाने के लिए थी। असली मुद्दा यह है कि क्या वह दबाव वैसा ही बना रहेगा?
कल की खबर के अनुसार ‘गिग वर्कर्स’ की हड़ताल और सरकार के दबाव के बाद ‘ब्लिंकिट’ और ‘स्विगी’ ने अपनी 10 मिनट की डिलीवरी सेवा को बंद करने का निर्णय लिया है। अगर ऐसा है, तो इसका स्वागत है। ग्राहक की किसी गंभीर बीमारी या इलाज के लिए कोई जीवन-रक्षक दवा या वैसी ही जरूरी वस्तु कुछ ही मिनटों में पहुँचना अनिवार्य है, यह आग्रह समझ में आता है, लेकिन इस स्थिति को छोड़कर, दैनिक उपयोग की ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो ग्राहक को कम-से-कम मिनटों में मिलनी ही चाहिए।
मैं फिर से दोहराता हूँ। अगर कोई वस्तु उस निश्चित मिनट पर नहीं मिली, तो कोई भी ग्राहक मर नहीं जाएगा। अगर ग्राहक को 12 बजे खाना है और उसे यह जानकारी दे दी जाए कि सामान पहुँचने में कम-से-कम एक घंटा लगेगा, तो वह उसी अनुसार योजना बना लेगा। गूगल मैप्स पर लाल रेखा देखकर ‘अनुमानित समय’ एक क्षण में मिल जाता है। तकनीक मौजूद है, पर इरादा कुछ और है।
कितने ग्राहक इस आधार पर ‘क’ कंपनी को ऑर्डर देते होंगे कि ‘ख’ कंपनी आधे घंटे में सामान देती है और ‘ग’ कंपनी दस मिनट में? ग्राहक अपने पसंदीदा ब्रांड, सामान की गुणवत्ता और कीमत के आधार पर तय करता है कि किसे ऑर्डर देना है। अगर उसे दस मिनट के बजाय आधे घंटे में सामान मिलने वाला हो, तब भी वह अपना पसंदीदा ब्रांड या खाने का निर्णय नहीं बदलेगा।
डिलीवरी बॉय को मिलने वाला मेहनताना अगर इस बात पर निर्भर है कि उन्होंने कितनी डिलीवरी की, तो अधिक डिलीवरी करने के लिए मिलने वाला वह ‘इंसेंटिव’ (प्रोत्साहन राशि) ही काफी है। इससे ‘गिग वर्कर्स’ को अपने समय, व्यक्तिगत कार्यों और शारीरिक स्वास्थ्य का प्रबंधन करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलेगा। उनकी भागदौड़ कम होगी और मानसिक तनाव भी घटेगा। अगर ऐसा है, तो ‘अमुक मिनटों में डिलीवरी’ के इस विचार के पीछे का तर्क क्या है?
इसका तर्क यह है कि ये सभी कॉर्पोरेट कंपनियां ‘गिग वर्कर्स’ को अमानवीय अनुशासन के खौफ में रखना चाहती हैं। भले ही दस मिनट का डिलीवरी मॉडल बंद कर दिया जाए, लेकिन उनका यह तर्क नहीं बदलेगा। तय समय के भीतर ग्राहक तक सामान नहीं पहुँचा, तो हमारी रेटिंग गिर जाएगी, मेहनताना काट लिया जाएगा, हमें ब्लॉक कर दिया जाएगा और हमारी कमाई बंद होते ही परिवार और छोटे बच्चों की बदहाली शुरू हो जाएगी… आप खुद कल्पना करके देखिए। उस इंसान के शरीर की नसें, मांसपेशियां और रक्तवाहिनियाँ हर पल कितने भारी तनाव में रहती होंगी?
जब मानवीय श्रम को जान की बाजी लगाने पर मजबूर कर दिया जाता है, तब वर्कर्स संगठित होने से डरते हैं और जो वेतन मिले उसे स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हैं। कंपनी के गेट के बाहर खड़े हजारों बेरोजगारों की ‘रिजर्व आर्मी’ इस सिस्टम के तरकश का एक और हथियार है! इसके जरिए मानवीय श्रम के हिस्से का ज्यादा-से-ज्यादा लाभ कॉर्पोरेट पूंजी अपनी जेब में डाल पाती है।
श्रमिकों पर अमानवीय और अविवेकी दहशत पैदा करने का यह ‘गिग वर्कर्स’ का कोई पहला उदाहरण नहीं हैं। ‘अमेज़न’ के दुनिया भर के गोदामों में यही हो रहा है। यहाँ तक कि मारुति कंपनी के गुड़गांव स्थित मानेसर प्लांट में हुई हिंसा भी इसी कारण हुई थी, क्योंकि श्रमिकों का टॉयलेट जाना तक दूभर कर दिया गया था। या फिर ऐप के जरिए घरेलू कामगार महिलाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भी आज यही कर रही हैं। दहशत! ‘ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट’ का यह बहुत पुराना तरीका है : दहशत! पुराने समय में विलासी सामंत गुलामों पर दहशत बनाए रखते थे। अब वही काम उच्च शिक्षित, सूट-बूट वाले कॉर्पोरेट मैनेजर कर रहे हैं। (सप्रेस)


