जिन लहरों से हम अब मुख़ातिब होने वाले हैं उनका ‘पीक’ कभी भी शायद इसलिए नहीं आएगा कि वह नागरिक को नागरिक के ख़िलाफ़ खड़ा करने वाली साबित हो सकती है। जो नागरिक अभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा है वही…
कोरोना की महामारी के पिछले एक-डेढ साल ने हमें अपनी बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था, लापरवाही और बदइंतजामी के साथ-साथ लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप से भी दो-चार कर दिया है। क्या हम लोकतंत्र के इसी रूप की कल्पना करते थे जिसमें सत्ता…