दिल्ली की चौहद्दी पर पिछले करीब 21-22 दिनों से जारी किसान आंदोलन ने खेती-किसानी को कम-से-कम बहस के लायक तो बना ही दिया है। इस लिहाज से देखें तो पिछले तीन-साढे तीन सप्ताह देशभर के लिए कृषि-प्रशिक्षण का बेहतरीन मौका…
पिछले बडे आंदोलनों को देखें तो दिल्ली का मौजूदा आंदोलन कई मायनों में भिन्न दिखाई देगा। तरह-तरह से उकसावे के बावजूद अपने अहिंसक स्वरूप, जाति-धर्म-वर्ग के हमारे अंतर्निहित विभाजन से परे, सामूहिक नेतृत्व और युवाओं-बुजुर्गों, महिलाओं-पुरुषों आदि को यथायोग्य जिम्मेदारी…
देश की राजधानी की सीमाओं पर बैठे किसानों में यह विभाजन दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन आखिर यह एक ‘आपातकाल’ भर है। बिना किसी बहस-मुबाहिसे के पहले अध्यादेश जारी करके और फिर संसद के दोनों सदनों में पारित करवाकर लाए गए…
खेती किसानी में क्रांतिकारी बदलाव लाने की उम्मीद में दम-खम लगाते करीब 3 दर्जन किसानी संगठन व केन्द्र सरकार दोनो खेती कानूनों को लेकर बुने गए अपने – अपने चक्रव्यूह से किसी तरह बाहर आने के लिए छटपटा रही है।…