समाज सेविका रिटायर्ड मेजर अनुराधा पंचतत्‍व में विलीन; सेवा, समर्पण और त्याग उनके जीवन के प्रतिमान थे

इंदौर, 27 मार्च। समाज सेविका रिटायर्ड मेजर अनुराधा जैन रविवार को पंचतत्व में विलीन हो गई। सोमवार की सुबह Khargone खरगोन में उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छानुसार आस्था ग्राम ट्रस्ट की भूमि पर ही हुआ। Retired Major Anuradh मेजर अनुराधा के अंतिम संस्कार में श्रद्धांजलि देने के लिए युवा जगत परिवार के रणजीत अजमानी, संजय सोलंकी, प्रवीण जोशी, कैलाश शर्मा, श्रीमती मनोरमा शर्मा, मृदुला नातू, रेणुका जोशी, अरुण सागर, हर्षवर्धन पटेरिया,राजेश मूंदड़ा सहित अनेक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, प्रशासनिक अधिकारी और स्‍थानीय ग्रामीणजन पहुंचे थे। निधन होने के बाद उनके परिवारिजनों ने 63 वर्षीय मेजर अनुराधा की इच्छा अनुसार नेत्रदान कराने का संकल्प पूरा किया।

बता दें कि Retired Major Anuradh रिटायर्ड मेजर अनुराधा जैन का रविवार 26 मार्च को खरगोन में हृदयाघात से निधन हो गया था। वे करीब 63 साल की थी। सेना की मेडिकल कोर में अपना सेवाकाल पूरा करने के बाद सेवानिवृत्त मेजर अनुराधा ने खरगोन जिले के आदिवासी अंचल के दिव्यांग बच्चों की सेवा व शिक्षा में अपना बचा जीवन लगा दिया।

वे Indore इंदौर के प्रतिष्ठित व संपन्न परिवार की बेटी होने के बावजूद एकदम जमीनी व संघर्षपूर्ण जीवन जीती थीं। उन्हें कभी पद, प्रतिष्ठा व मान, सम्मान की भूख नहीं रही। खरगेान में निर्जन आस्था ग्राम को उन्होंने एक चैतन्य भूमि का रूप दिया जहां ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ के रूप में सर्वोपरि रही। अंचल के दिव्यांग बच्चों का जीवन संवारने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।

सामाजिक जीवन की शुरुआत उन्होंने युवावस्था में इंदौर के अभ्यास मंडल व Yuva Jagat युवा जगत संगठन से की थी। समाज व युवाओं तथा वंचित बच्चों के लिए कुछ करने की कसक हमेशा उनके मन में रहती थी। शासन की मदद के बगैर उन्होंने अपना मिशन पूरा किया और आस्था ग्राम को एक आदर्श स्वैच्छिक संस्था के रूप में खड़ा किया।

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बीते कुछ वर्ष पूर्व दीदी एक दुर्घटना में उनका एक हाथ शिथिल हो गया था, बावजूद उन्होंने आस्थाग्राम में निराश्रित, निर्धन, दिव्यांगों की सेवा संभाल नहीं छोड़ी। लगातार वे अपने कर्तव्य पथ पर डटी रहीं।

युवा जगत को गढ़ने में अनुराधा दीदी का अहम योगदान

युवा जगत समूह के साथी एवं प्रख्‍यात दवा कंपनी से जुडे संजय मेहता (इंदौर) ने बताया कि अनुराधा दीदी से पहली मुलाक़ात युवा-जगत, इंदौर में लगभग सन् 87 में हुई थी। व्यक्तित्व को गढ़ने में युवा जगत का जो योगदान रहा है, उससे कई गुना ज़्यादा योगदान दीदी का युवा जगत को गढ़ने में रहा है। इंदौर के प्रतिष्ठित साँखला परिवार की बड़ी बेटी अनुराधा बचपन से ही बहुत विस्तृत सोच वाली रही। लड़के – लड़की का भेद उन्हें पीड़ा देता था। एम.जी.एम.मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई के बाद सन् 84 में युवा जगत, इंदौर की औपचारिक स्थापना के साथ दीदी की सामाजिक/ रचनात्मक/ मैदानी गतिविधियां शुरू हुईं।

समय पाबंदी, अनुशासन, कुछ नया करने का जुनून, भाषा की शुद्धता, सेवा भावना, कार्य के प्रति समर्पण भाव, सहनशीलता, स्वयं एवं समाज के प्रति प्रतिबद्धता, जीवंतता, मितव्ययिता, कर्तव्य बोध, नैतिकता,आत्मविश्वास, चिन्तनशीलता, व्यवहार कुशलता, सही के प्रति आग्रह, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नेतृत्व क्षमता… क्या क्या लिखूँ….. ये सब गुण उनको वहाँ ले जाते है, जहाँ कुछ ही लोग पहुँच पाते हैं।

आमतौर पर श्वेत वस्त्र पहनने वाली, काले पट्टे गोल डायल की घड़ी और दो झूला चोटी रखने वाली अनुराधा ने चिकित्सक बन कर एक मोबाइल आई सी यू वेन के माध्‍यम से गाँव – गाँव में मरीज़ों की सेवा करने का सपना देखा था और लक्ष्य भी बनाया।

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इसके बाद डॉ. अनुराधा जैन मेज़र डॉ अनुराधा हो गई। सेना में आर्मी मेडिकल कोर में शॉर्ट सर्विस कमीशन पर। यह बात है लगभग सन् 91 के बाद की, जब युवा-जगत ने शहर स्तर पर सद्भावना वर्ष मनाया था। सेना में जाने के बाद पहली बार टैंक चलाने वाली महिला सैन्य अधिकारी बनी अबोहर/ सूरतगढ़ में।

नौकरी से सेवामुक्ति के बाद दीदी ने आस्था ग्राम ट्रस्ट को अपना कर्मक्षेत्र बनाया लिया। वे लगभग ढाई सौ दिव्यांग बच्चों की माँ बन गई। अनेक रचनात्मक गतिविधियों का संचालन कर इन बच्चों के सर्वांगीण विकास की ज़िम्मेदारी निभाते हुए अनेक अभूतपूर्व आयोजन की नींव रखी जिसमें “तिरंगे का जन्मदिन” देश का पहला एवं एकमात्र कार्यक्रम है, जो लगातार जारी है। आज आस्था ग्राम ट्रस्ट अनेक अभूतपूर्व कार्य कर रहा है, जिसमें दिव्यांग बच्चों द्वारा वे सभी कार्य/ खेल किये जाते है, जो सामान्य बच्चा करता है। वे छोटी – छोटी बातों से, साधनों से कुछ बड़ा, कुछ अलग करने वाली व्‍यक्ति थी। बिना कुछ किये ही व्यक्तित्व गढ़ देती थीं, वे अपने क्रियाकलाप से व्यवहार से अपनी कार्यशैली से।

उनसे समझा, सीखा और पाया

पिछले दो वर्षों से घर की दिवाली आस्था ग्राम खरगोन के दिव्यांग बच्चों द्वारा बनाये दीयों से ही मनती रही है। वे बड़ी मासूमियत से सूचित कर बुकिंग कर लेती थी और आस्था ग्राम के बच्चों के लिये आग्रहपूर्वक निवेदन करने से भी नहीं चूकती थीं। मुझे याद है दो – तीन वर्ष पहले उनको नारी सशक्तिकरण विषय पर दिल्ली में एक व्‍याख्यान के लिये आमंत्रित किया गया था, इस विषय पर मुझसे लंबी बातें की थी। और फिर एक दिन रात को उन्‍होंने लिखा फाइनल भाषण फोन पर सुनाने के पहले कहा भाषण सुनना, फिर उस पर अच्छी बुरी राय और सुधार…. 40 मिनट तक फ़ोन पर। ख़ैर उस भाषण पर दीदी का जो बहुमान हुआ, वह अपने आप में महत्‍वपूर्ण है। सेवा, समर्पण और त्याग की प्रतिमूर्ति  मेजर अनुराधा दीदी का यूं चले जाना आस्थाग्राम सहित, हम सबके लिए बड़ी क्षति है।

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गजब की जीवटता

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं सप्रेस के संपादक राकेश दीवान ने कहा कि उनके काम की शुरुआत के दिनों में मैं उनसे खूब मिलता था। एक आग्रह था कि वे ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ के ‘शहीद अस्पताल’ में काम करें, लेकिन उन्हें इंदौर के आसपास रहना था। गजब की जीवटता वाली मेजर अनुराधा का विदा होना दुखद है। इंदौर के सामााजिक कार्यकर्त्‍ता सुदर्शन जटाले ने कहा कि अनु दीदी एक ऐसा नाम जो अपने आप मानवता की सेवा के सर्वजगत में मशहूर है। आज इस शून्यता, को कैसे भर पायेंगे। दीदी का विदा होना, एक अपूरणीय क्षति है। युवा जगत टोली के एक साथी कैलाश भाई ने रोते रोते लिखा कि दीदी हमारी स्मृति में शेष रहेगी या प्रकट हममें बहेगी।

अभ्‍यास मंडल के मुकुंद कुलकर्णी, कल्याण अग्रवाल, रंजीत डंडीर, मंजीत सिंह चावला, मनोज रघुवंशी, खरगोन एसडीएम, नरेंद्र गांधी, दिलीप करपे, रवि प्रकाश, डॉ ललित मोहन पंत, रवि अतरोलिया, शुभम कानूनगो आदि ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

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