प्राकृतिक व जैविक खेती ही समाधान

राजकुमार सिन्हा

देश के गृह व सहकारिता मंत्री अमित शाह ने ‘प्राकृतिक’ और ‘जैविक’ खेती की पैरवी करते हुए खुद को इन पद्धतियों का प्रशंसक बताया था। केन्द्रीय कृषि बजट के 70 फीसदी को उर्वरक सब्सीडी में लगाने वाली सरकार के वरिष्ठ मंत्री का यह कथन क्यों महत्वपूर्ण है?

‘प्राकृतिक’ और ‘जैविक खेती’ ऐसी कृषि पद्धति है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उत्पादन बढ़ा सकती है। ‘प्राकृतिक खेती’ से कार्बन उत्सर्जन में 35% से 50% तक की कमी आ सकती है। ‘प्राकृतिक खेती,’  जिसे ‘नो-इनपुट’ या ‘जीरो-बजट’ खेती कहा जाता है, ‘बाहरी इनपुट’ (जैसे उर्वरक, कीटनाशक, यहां तक कि खाद) के उपयोग को कम या खत्म करने पर जोर देती है और इसकी बजाय प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जैसे कि मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन को प्रोत्साहित करती है।

जुताई (मिट्टी को जोतना) से बचने वाली ‘प्राकृतिक खेती’ को आमतौर पर कम लागत वाली कृषि माना जाता है, क्योंकि इसमें ‘बाहरी इनपुट’ की आवश्यकता नहीं होती। ‘जैविक खेती’ को आमतौर पर प्रमाणीकरण की आवश्यकता होती है, जबकि ‘प्राकृतिक खेती’ के लिए प्रमाणीकरण आवश्यक नहीं है। ‘प्राकृतिक खेती’ एक ऐसा व्यापक दृष्टिकोण है जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है, जबकि ‘जैविक खेती’ एक विशिष्ट प्रणाली है जो ‘जैविक इनपुट’ पर जोर देती है। ‘प्राकृतिक खेती’ मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाकर, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करती है और कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से हटाकर मिट्टी में जमा करती है।

रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को बंद करने से ‘ग्रीनहाउस गैसों’ के उत्सर्जन को कम करने में मदद होती है। ‘प्राकृतिक खेती’ में मिट्टी की जल-धारण क्षमता में सुधार होता है, जिससे जल-संरक्षण होता है और सूखे और बाढ़ जैसी चरम मौसम की घटनाओं के प्रति लचीलापन बढ़ता है। ‘प्राकृतिक खेती’ जैव-विविधता को बढ़ावा देती है और जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। विभिन्न प्रकार की फसलों को उगाना, मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कीटों और बीमारियों को नियंत्रित करने में मदद करता है।

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हजारों वर्षों के अनुभव से विकसित हुई वर्षा आधारित स्थायी या टिकाऊ खेती का विज्ञान मूलतः पुनर्चक्रण से जुङा हुआ है। ‘प्राकृतिक खेती’ पर हुए शोध दर्शाते हैं कि इस विधि से विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है। इस विधि से उगाई फसलें सूखे, अतिवर्षा में भी खड़ी रहती हैं। ‘मिश्रित खेती’ अपनाने से एक ही खेत में कई फसलें ली जा सकती हैं जिससे किसान को नियमित आय सुनिश्चित होती है। इस खेती में पानी की खपत बाकी विधियों के मुकाबले 40 प्रतिशत तक कम है और इसमें फसल सुरक्षा के लिए स्थानीय वनस्पतियों को ही प्रयोग किया जाता है।

कृषि ‘ग्रीनहाउस गैसों’ का एक प्रमुख स्रोत है जिससे भविष्य में खाद्य-सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न होने की संभावना है। जल के बढ़ते उपयोग और सूखे के कारण उत्पादन के लिए पानी की कमी हो सकती है। वैश्विक खाद्य-सुरक्षा पर्याप्त खाद्य-उत्पादन और खाद्य-पहुंच, दोनों पर निर्भर करती है। जलवायु परिवर्तन पर ‘अंतर-सरकारी पैनल’  (आईपीसीसी) की आम सहमति है कि 1950 से अब तक जलवायु में व्यापक परिवर्तन हो चुका है और इस सदी के उत्तरार्ध में वैश्विक औसत तापमान में 0.4 से 2.6°C की वृद्धि होने की संभावना है।

तापमान और कार्बन डाइऑक्साइड में क्रमिक वृद्धि के परिणामस्वरूप कुछ फसलों की पैदावार बढ़ाने वाली अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में फूल आने के दौरान होने वाली चरम घटनाओं, विशेष रूप से अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण यह संभावित वृद्धि सीमित हो सकती है। जलवायु परिवर्तन के कारण 21वीं सदी में फसल उत्पादन में कमी आने का अनुमान है। जलवायु परिवर्तन वैश्विक कृषि व्यवस्था पर वृहद प्रभाव डालता है।

दूसरी ओर, कीटनाशकों के प्रयोग से भूजल और पर्यावरण में जहर घुल रहा है। पृथ्वी में पाए जाने वाले मित्र कीट खत्म हो रहे हैं। खेती में रासायनिक खाद का इस्तेमाल होने से मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। इस अनाज के सेवन से कैंसर, रक्तचाप और अन्य बीमारियों के खतरे बढ़ गए हैं। भारत सरकार ने वित्त-वर्ष 2025-26 में उर्वरक सब्सिडी के लिए 1.67 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बजट निर्धारित किया है, जो भारत के कृषि बजट का लगभग 70% है।

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भारतीय कृषि के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है – 1967-68 में शुरू हुई ‘हरित क्रांति।’  इसकी मुख्य बात थी – सिंचाई की गारंटी के साथ अधिक फसल वाले बीजों, अधिक उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल। ‘हरित क्रांति’ के कारण देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो हो पाया, लेकिन 1980 के दशक से ‘हरित क्रांति’ भी संकट में फंस गई। खेती में बढ़ती लागत के कारण किसान कर्ज के दलदल में फंसकर आत्महत्या करने को विवश हो गए। इस दलदल से किसानों को निकालने के लिए भी गृहमंत्री का ताजा सुझाव महत्वपूर्ण है।

‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने एक जनवरी से 31 दिसंबर 2024 के  366 में से 322 दिनों में चरम मौसमी घटनाओं का सामना किया है। इन घटनाओं में 3,472 लोगों की जानें गईं और 40.7 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को नुक्सान पहुंचा। सरकार की ओर से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिहाज से किसानों को रसायन मुक्त कृषि के प्रति प्रोत्साहित किया जा रहा है। कृषि में स्थिरता बनाए रखने के लिए किसानों को ‘जैविक खेती’ जैसी टिकाऊ प्रणालियों को अपनाना चाहिए। भारत में लगभग 14 करोड हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है, जिसमें से लगभग 65 लाख हेक्टेयर में जैविक खेती होती है। मध्यप्रदेश में अब जैविक खेती का विस्तार कर इसे 17 लाख हेक्टेयर से 20 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

‘किसान एवं कृषि कल्याण विभाग’ के अनुसार मध्यप्रदेश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख टन जैविक उत्पाद तैयार हो रहा है। इसमें पांच लाख टन से अधिक जैविक उत्पाद निर्यात किया जाता है। भारत में जैविक उत्पादों की मांग और उत्पादन दोनों में वृद्धि हो रही है। भारतीय जैविक बाजार 16,800 करोड़ रुपये का है। मध्यप्रदेश के मंडला, डिण्डोरी, बालाघाट, छिंदवाड़ा, बैतूल, कटनी, उमरिया, अनूपपुर जिलों में ‘जैविक खेती’ प्रमुखता से की जा रही है। भारत के जैविक खाद्यान्न का एक बड़ा हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों द्वारा उत्पादित किया जाता है। इनमें से कई किसानों के लिए, ‘जैविक खेती’ लागत कम करते हुए अपनी आजीविका में सुधार लाने का एक ज़रिया बन गई है। हमारे नीति निर्धारकों का दायित्व है कि वे किसानों को केन्द्र में रखकर, कृषि पारिस्थितिकी वाले तरीकों पर ध्यान दें जो देश के लिए टिकाऊ खाद्य-सुरक्षा और किसानों के लिए आजीविका सुनिश्चित कर सकें। (सप्रेस)

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