महात्मा गांधी की धार्मिक आस्था

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खुद को सनातनी हिन्दू मानने वाले महात्मा गांधी आखिर कैसे हिन्दू थे? क्या किसी खास धर्म का अनुयायी होने के साथ-साथ गांधी की तरह उदारता को आत्मसात किया जा सकता है?


आज देश में धर्म के नाम पर काफी राजनैतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। इसी आधार पर समाज और लोगों को बांटने का काफी प्रयास चल रहा है। कोई धार्मिक रुप से अल्पसंख्यक समाज के तुष्टीकरण की बात करता है तो कोई धार्मिक रुप से बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण की बात करता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे फैलाए जाते रहे थे। देश के विभाजन के समय जिस प्रकार से दंगे हुए वे इतिहास के पन्नों पर हमेशा काले अध्याय के रुप में याद रखे जाएंगे। गांधीजी ने अपनी सनातनी हिन्दू धार्मिक आस्था को कायम रखते हुये सदा हिन्दू-मुस्लिम समुदायों में सौहार्द बनाए रखने का प्रयास किया। जब देश आजादी का जश्न मना रहा था तो गांधी जी बंगाल में दंगों की आग बुझाने में लगे थे। 

महात्मा गाँधी हिंदू धर्म में पैदा हुए थे, परंतु उन्होंने उसे एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा था। वे स्वयं को एक सनातनी हिंदू धर्मावलम्बी मानते थे, लेकिन वे कहते थे कि सत्य ही उनका धर्म है। गाँधीजी ने सभी धर्मों का सम्मान किया और सभी धर्मों की अच्छी बातों को अपनाने में विश्वास रखा। गाँधीजी का परिवार वैष्णव धर्म का पालन करता था। यह हिंदू धर्म की प्रमुख परंपराओं में से एक है और जैन धर्म के कठोर नैतिक सिद्धांतों से प्रभावित है। इसमें तप और अहिंसा जैसी अवधारणाएं महत्वपूर्ण हैं।

गांधीजी के धार्मिक विचार सर्व-धर्म-समभाव और सत्य ही ईश्वर है पर आधारित थे। उनका मानना था कि सभी धर्मों में कुछ-ना-कुछ सच्चाई है और सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने धर्म को राजनीति से अलग नहीं माना, बल्कि उनका मानना था कि धर्म मनुष्य को सदाचारी बनाता है और राजनीति को सेवाभाव से करने में मदद करता है। धर्म और राजनीति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और धर्महीन राजनीति आत्मा का हनन करती है।

वे कहते थे कि बहुत से धार्मिक व्यक्ति छद्मवेश में राजनेता होते हैं, लेकिन मैं एक राजनेता के वेश में धार्मिक व्यक्ति हूं। उनके लिए सत्य ही ईश्वर था। इसलिए सत्याग्रह को उन्होंने धार्मिक और नैतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया। उनका मानना था कि धर्म का पालन करने के लिये आत्मशुद्धि आवश्यक है और राजनीति को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता।

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गांधीजी ने ‘सर्व धर्म समभाव’ को ध्यान में रखते हुए अपने सभी आश्रमों में सर्व-धर्म प्रार्थना आरंभ की। इस प्रार्थना में कुरान, बाइबल, गीता, बौद्ध, जैन, सिख धर्म का पाठ होता था और आज भी उनकी संस्थाओं में हो रहा है। दिल्ली में राजघाट और महात्मा गांधी के शहीदी स्थल पर दो अक्टूबर को भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्ति प्रार्थना सभाओं में भाग लेते हैं। कई स्कूलों में भी सर्व-धर्म प्रार्थना का आयोजन किया जाने लगा है।

उन्होंने भगवत गीता को बहुत महत्त्व दिया और इसे ‘अपनी सनातन मां’ कहा। गीता को उन्होंने अपने जीवन को जीने के लिए एक व्यावहारिक नैतिक मार्गदर्शक माना। उनका मानना था कि गीता कर्म-योग, ज्ञान-योग और भक्ति-योग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और यह जीवन के हर पहलू में मार्गदर्शन प्रदान करती है। खुद गांधीजी ने गीता के माध्यम से स्वार्थ रहित कर्म करने की प्रेरणा प्राप्त की। उन्होंने गीता के सिद्धांतों को सत्य और अहिंसा के अपने दर्शन से जोड़ा। गांधीजी ने गीता को अपने जीवन के लिए एक व्यावहारिक नैतिक मार्गदर्शक माना जिससे उन्हें एक शक्ति और सांत्वना मिली।

महात्मा गाँधी 12 अक्टूबर 1921 के “यंग इंडिया” में लिखते हैं कि मैं अपने आप को सनातनी हिंदू कहता हूँ, क्योंकि मैं वेदों, उपनिषदों और समस्त हिंदू शास्त्रों में विश्वास करता हूँ। अवतारों और पुनर्जन्म में भी मेरा विश्वास है। मैं वर्णाश्रम धर्म में विश्वास करता हूँ। इसे मैं उन अर्थों में मानता हूँ जो पूरी तरह वेद सम्मत हैं, लेकिन उसके वर्तमान प्रचलित भोंडे रूप को नहीं मानता। मैं प्रचलित अर्थों से भिन्न, कहीं अधिक व्यापक अर्थ में गाय की रक्षा में विश्वास करता हूँ। मूर्ति पूजा में मेरा विश्वास नहीं है।

गांधी जी हिन्दू धर्म के वास्तविक स्वरूप से सहमत नहीं थे जिसमें जाति-पाति, छुआ-छूत, बाल विवाह आदि कुरीतियाँ समाहित थीं। वे जाति प्रथा के इतने खिलाफ थे कि एक बार उन्होंने कस्तूरबा को तलाक देने की बात कह दी थी। एक बार उन्होंने ‘साबरमती आश्रम’ में एक दलित परिवार दादू भाई उनकी पत्नी दानी बैन और एक छोटी बच्ची को रख लिया। इससे अहमदाबाद में रोष पैदा हो गया। जुलूस निकला, नारे लगे। जो सवर्ण आश्रम को चंदा देते थे उन्होंने चंदा देना बंद कर दिया और आश्रम बंद होने की कगार पर आ गया, लेकिन गांधी जी अपने निर्णय पर अडिग रहे। जब उनको पता चला कि कस्तूरबा अन्य महिलाओं के साथ दादू भाई के आश्रम में रहने का विरोध कर रही हैं तो उन्होंने कस्तूरबा से कहा कि वे अपना फैसला नहीं बदलेंगे। उन्होंने कस्तूरबा से कह दिया यदि वो चाहें तो अपना अलग रास्ता अपना सकती हैं। वो दोनों एक साथ नहीं रह सकते, उनका तलाक होगा।

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गाँधीजी स्वामी विवेकानंद द्वारा ‘विश्व धर्म-संसद’ में दी गई हिंदू धर्म की उस परिभाषा के बिल्कुल निकट हैं जो उन्होंने 11 सितंबर 1893 को शिकागो में दी थी। उन्होंने कहा था – ‘मुझे गर्व है कि मैं उस हिंदू धर्म से हूँ जिसने पूरी दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिकता की सीख दी। भारत की सभ्यता और संस्कृति सभी धर्मों को सच के रूप में मान्यता देती है और स्वीकार करती है। भारत एक ऐसा देश है जिसने सभी धर्मों और अन्य देशों में सताये हुए लोगों को भी अपने यहाँ शरण दी। उन्होंने बताया कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं जिनके धर्म स्थलों को रोम के हमलावरों ने तोड़कर खंडहर में तब्दील कर दिया था। मुझे इस बात का भी गर्व है कि मैं उस हिंदू धर्म से हूँ जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और उन्हें पाल रहा है।’

गांधी जी का मानना था कि सभी धर्मों में मूल रुप से समानता है और सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए। धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को अपने धर्म में सुधार करने और उसके अच्छे गुणों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए, बजाए इसके कि वह किसी दूसरे धर्म में चला जाए। गांधी जी का मानना था कि धर्म आस्था का विषय है और किसी पर भी धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव नहीं डाला जाना चाहिए।

अन्य धर्म ग्रंथों के अध्ययन के संबंध में उन्होंने कहा था कि “अन्य धर्मग्रंथों की आलोचना करना, उनके दोषों को इंगित करना मेरा काम नहीं है। केवल अपने अलावा अन्य धर्मों के प्रति श्रद्धा पूर्ण दृष्टिकोण के माध्यम से ही मैं सभी धर्मों की समानता के सिद्धांत को समझ सकता हूँ, लेकिन हिंदू धर्म को शुद्ध करने और उसे पवित्र बनाए रखने के लिए उसमें दोषों को इंगित करना मेरा अधिकार और कर्तव्य दोनों है। जब गैर-हिंदू आलोचक हिंदू धर्म की आलोचना करने और उसके दोषों को सूचीबद्ध करने लगते हैं तो वे हिंदू धर्म के बारे में अपनी अज्ञानता और हिंदू दृष्टिकोण से इसे देखने की अपनी अक्षमता को ही उजागर करते हैं। यह उनकी दृष्टि को विकृत करता है और उनके दृष्टिकोण को दूषित करता है। इस प्रकार मेरा अपना अनुभव मुझे मेरी सीमाओं से परिचित कराता है और मुझे इस्लाम या ईसाई धर्म और उनके संस्थापकों की आलोचना करने से सावधान रहना सिखाता है।

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गांधीजी अपने गृह राज्य गुजरात में हिन्दू और जैन धार्मिक माहौल में पले बढ़े, लेकिन उन्हें हिन्दू भक्त संतों, इस्लाम, बौद्ध, ईसाई धर्म और टॉल्सटॉय, रस्किन और थोरो जैसे विचारकों और साहित्य ने भी प्रभावित किया। भीखू पारिख कहते हैं कि गांधी पर सबसे गहरा प्रभाव हिन्दू, ईसाई और जैन धर्म के लोगों का था। गांधीजी के राजनैतिक गुरु बालकृष्ण गोखले कहते हैं कि गांधीजी हिन्दू और जैन धर्म तथा रस्किन और टॉल्सटॉय के अपने अध्ययन से प्रभावित थे।

गांधीजी हिन्दू धर्म की स्वामीनारायण परंपरा के सुधारों और शिक्षाओं से प्रभावित थे। गांधीजी ने जैन दार्शनिक और कवि श्रीमद राजचन्द को अपना सलाहकार माना। उन्होंने उनके बारे में 1930 मे लिखा कि वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने धार्मिक मामलों में मेरे दिल को मोहित कर लिया। मेरे आंतरिक जीवन को आकार देने में टॉल्सटॉय और रस्किन ने कवि राजचन्द के साथ प्रतिस्पर्धा की, लेकिन कवि का प्रभाव निःसंदेह गहरा था। गांधीजी को सूफी संतों ने भी काफी प्रभावित किया। (सप्रेस)

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