क्रांति गौंड : गांव की गली से वर्ल्ड कप क्रिकेट तक

पारस प्रताप सिंह ‘पुरुषार्थ’

बुंदेलखंड की वीर भूमि ने एक बार फिर अपनी बेटी के साहस से इतिहास लिखा है। घुवारा की क्रांति गौंड ने गरीबी, तानों और अभावों को मात देकर क्रिकेट के मैदान पर भारत का नाम रोशन किया। जिसने कभी फटे जूते पहने थे, वही आज नीले जर्सी में तिरंगे के लिए गर्व से खड़ी है। बुंदेलखंड की यह बेटी अब नई पीढ़ी की लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

पारस प्रताप सिंह ‘पुरुषार्थ’

बुन्देलखंड की धरती सदियों से वीरता और संघर्ष की गाथाओं से सराबोर रही है। रानी लक्ष्मीबाई की तलवार और महाराजा छत्रसाल की रणनीति-वीरता ने इतिहास में जो स्थान पाया, आज उसी मिट्टी की एक और बेटी ने क्रिकेट के मैदान पर देश का परचम लहराया है। यह कहानी है क्रांति गौंड Kranti Gaud की, एक ऐसी साधारण लड़की की, जिसने असाधारण जज्बे से अपने सपनों को हकीकत में बदला।

मध्यप्रदेश, छतरपुर जिले के छोटे से गांव घुवारा में 11 अगस्त 2003 को जन्मी क्रांति का बचपन अभावों से भरा था। एक कहावत है “जहां चाह, वहां राह।” क्रांति के जीवन ने इस बात को बिल्कुल सच कर दिखाया। उसके पिता, जो पुलिस में मुंशी के पद पर थे, लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से निलंबित कर दिया गया, उसके बाद कभी खेतों में मजदूरी करके,  परिवार का भरण पोषण करते और क्रांति के क्रिकेट के जुनून को जिंदा रखते थे। परिवार बड़ा था, छह भाई-बहनों में वह सबसे छोटी थी। एक वक्त ऐसा भी था जब पहनने के लिए पूरे कपड़े और पांव में जूते तक नहीं होते थे, लेकिन आंखों में था तो सिर्फ एक सपना क्रिकेट की दुनिया में नाम बनाना।

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गांव के लोग अकसर उसका मजाक उड़ाते थे। कहते थे, “लड़की होकर लड़कों के साथ खेलती है! कौन शादी करेगा इससे?“ लेकिन क्रांति को किसी की परवाह नहीं थी। जब बाकी लड़कियां रसोई के काम में लगी होती थीं, वह मैदान में लड़कों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेला करती थी। उस पर परिवार और समाज के ताने ऐसे गिरते थे जैसे सावन में बिना छतरी के खड़ा हो कोई। लेकिन कहते हैं, “आंधियों से डर कर कभी परिंदे उड़ना नहीं छोड़ते।” क्रांति ने भी नहीं छोड़ा।

क्रांति गौंड के कोच राजीव विल्थारे ने एक अखबार को एक इंटरव्यू देते हुए बताया था कि ‘वह फटे-पुराने कपड़े और साधारण जूते पहनकर आई थी। मैंने उसे स्पाइक्स खरीदने के लिए 1600 रूपए दिए थे।’ये वो पहला मोड़ था जिसने क्रांति की कहानी को दिशा दी। वर्ष 2024 में मुंबई इंडियंस में नेट बॉलर रही उसके बाद यूपी वॉरियर्स ने आईपीएल 2025 में खरीदा।

उसके बाद मेहनत, पसीना और संघर्ष का ऐसा दौर शुरू हुआ कि दिन-रात की पहचान मिट गई। कहते हैं कि “लोहा जितना तपता है, उतना ही निखरता है।” क्रांति भी तपती रही, निखरती रही। खेल के मैदान पर उसकी गेंदें अब बल्लेबाजों को हिला देती थीं। कोच और साथी खिलाड़ी उसकी रफ्तार और सटीकता को देख दंग रह जाते थे।

उसकी दोस्त विकासा बुन्देला बताती है, “ क्रांति में हमेशा बहुत जज्बा रहा है। वे किसी से भी डरती नहीं थी। हम लोग तो लड़कों के साथ नहीं खेलते लेकिन क्रांति लड़कों के साथ टेनिस बाल से मैच खेलती थी। जिससे उसके परिवार और पड़ोस के लोग नाराज होते थे। लेकिन वो किसी की नहीं सुनती थी। ऐसा लगता था जैसे उसने ठान लिया हो कि मुझे क्रिकेटर ही बनना है। आज उसे भारत के लिए खेलते हुए देखते बहुत गर्व महसूस होता, आज वो हम सबके लिए प्रेरणा है।”

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2025 का साल उसकी मेहनत का इनाम लेकर आया। 11 मई को उसने श्रीलंका के खिलाफ पहला वनडे खेला। फिर 13 जुलाई को इंग्लैंड के खिलाफ पहला टी 20 और फिर आया वो ऐतिहासिक दिन, जब महिला वर्ल्ड कप 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ उसके 10 ओवर में 20 रन देकर 3 महत्वपूर्ण विकट लिए। इस प्रदर्शन ने सबको चौंका दिया। उसने सिर्फ विकेट ही नहीं लिए, बल्कि टीम को जीत दिलाई और प्लेयर ऑफ द मैच बनी।

एक कहावत फिर से सच हो गई “जो खुद पर भरोसा करते हैं, वो किसी भी मुकाम तक पहुंच सकते हैं।” क्रांति ने कहा कि “आज हमारे गांव के लोगों ने मैच देखने के लिए बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई। सब गौरव कर रहे होंगे। अब वक्त है कुछ लौटाने का, मैं चाहती हूं कि लड़कियां बिना पैसा की चिंता किए खेल सकें|’’ आगे कहा कि, “सच कहूं तो मैं इंडिया-पाकिस्तान की बातों पर ध्यान नहीं देती..मैं बस अपने काम पर ध्यान देती हूं, मेरी डयूटी गेंदबाजी करना है, और मैं वहीं करती हूं।”

अब तक वह 9 वनडे मैचों में 5.14 की इकॉनमी से 18 विकेट और 12 टी20 मुकाबलों में 8.55 की इकॉनमी से 6 विकेट ले चुकी है। यह तो महज शुरुआत है। उसकी गेंदबाजी में जितनी धार है, उतनी ही उसकी कहानी में प्रेरणा। वह अब सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं रही, बल्कि बुन्देलखंड की बेटियों की उम्मीद बन गई है। गांव-गांव में अब मां-बाप अपनी बेटियों को कहते हैं“देखो, क्रांति जैसा बनो।“

क्रांति की कहानी हमें ये सिखाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर दिल में आग हो, तो कोई तूफान तुम्हें रोक नहीं सकता। उसकी ज़िंदगी एक जीती-जागती मिसाल है उस कहावत की “कठिनाइयों की धूप में जो पसीना बहाते हैं, वही सफलता की छांव पाते हैं।”

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आज जब वो तिरंगे के नीचे खड़ी होती है, तो उसका गांव, उसका परिवार और उसकी मिट्टी गर्व से सिर उठाकर कहती है “ये हमारी बेटी है।“ मुझे निजी तौर पर बहुत गौरव है कि  क्रांति गांव मेरी जन्मभूमि रजौला, सागर मध्यप्रदेश से महज 50 किलोमीटर दूर है।

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