हमारे देश में अलग-अलग पर्वों पर पीपल, बरगद, आंवला, शमी, इमली आदि वृक्षों की पूजा की जाती है, परन्तु राजस्थान के अजमेर के पास गांव मांगलियावास में सावन की हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्षों के जोड़े की पूजा की जाती है। राजस्थान के शुष्क भूभाग में हरियाली अमावस्या के दिन जीवन से भरे कल्पवृक्षों के नीचे उमड़ता है आस्था का सैलाब। सैकड़ों वर्षों से इन्हें राजा, रानी और राजकुमार के रूप में पूजते आए हैं — यह परंपरा लोकविश्वास और प्रकृति भक्ति का अद्भुत संगम है।
हरियाली अमावस्या : 24 जुलाई
हमारे देश में अलग-अलग पर्वों पर पीपल, बरगद, आंवला, शमी, इमली आदि वृक्षों की पूजा की जाती है, परन्तु राजस्थान के गांव मांगलियावास में सावन की हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्षों के जोड़े की पूजा की जाती है। पूजा के साथ ही यहां एक दिवसीय मेला भी लगता है। अजमेर-उदयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर अजमेर से 27 किलोमीटर की दूरी पर मांगलियावास गांव है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से जो 14 रत्न प्राप्त हुए थे उनमें एक कल्पवृक्ष भी था। किसी एक दंतकथा के अनुसार लगभग 800 वर्ष पूर्व कोई तपस्वी अपनी तांत्रिक विद्या के प्रभाव से एक शिवलिंग एवं दो कल्पवृक्षों को आकाश मार्ग से लेकर कहीं जा रहा था। इसी समय इस गांव (तब नामकरण नहीं हुआ था) के दो सूफी संत मंगलसिंह और उनके शिष्य फतेहसिंह ने अपनी वैदिक शक्तियों से शिवलिंग एवं कल्पवृक्षों को जमीन पर उतार लिया। कालांतर में सूफी संत मंगलसिंह के नाम पर यह गांव मांगलियावास कहा जाने लगा। कुछ लोगों का यह भी मत है कि कल्पवृक्षों की पूजा एवं मांगी गयी मनोकामना पूर्ण होने से गांव का नाम मांगलियावास पड़ा।
शुष्क प्रदेश राजस्थान में स्थित इस गांव में वर्षाकाल के समय सावन मास में काफी हरियाली फैल जाती है। यहां के जलाशय पर खडे विशाल कल्पवृक्ष देवता के रुप में प्रसिद्ध हैं एवं पूजे जाते हैं। यहां लगे तीन कल्पवृक्षों को राजा, रानी एवं राजकुमार के नामों से जाना जाता है। ये वृक्ष संरक्षित है एवं ‘वन अनुसंधान संस्था, देहरादून’ के रिकार्ड में इनकी जानकारी है। राजा, रानी पेड़ करीब 30 मीटर की दूरी पर हैं। वृक्षों के पास स्थित दो पहाड़ियों पर दोनों सूफी संतों की मजारें भी हैं। सावन मास की हरियाली अमावस पर पिछले 300 वर्षों से यहां मेला लगता आया है। मेले में आसपास के ब्यावर, अजमेर एवं पुष्कर के अलावा अन्य राज्यों से भी लोग आते हैं। मेले में आये भक्त दोनों वृक्षों का पूजन करते हैं एवं मनौती मांगते हैं। मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु वापस आकर पूजा करते हैं एवं प्रसाद चढ़ाते हैं जिनमें चूरमा व लापसी प्रमुख है।
विवाहित युगल नवजात शिशु को ढोक दिलाने इन पेड़ों की छाया में वर्ष भर आते रहते हैं। वैसे तो दोनों पेड़ों की पूजा सभी करते हैं, परन्तु रानी पेड़ की पूजा महिलाएं एवं कुंवारी लड़कियां ज्यादा करती हैं। चुन्नी, काजल, सिंदूर एवं फूल आदि अर्पित कर 108 परिक्रमा की जाती है। राजा पेड़ के तने पर पगड़ी या साफे के रूप में कलावा लपेटा जाता है। कुछ वर्ष पूर्व राजा वृक्ष की शाखा तेज हवा से गिर गयी थी एवं बाद में किसी संक्रमण से प्रभावित होकर खोखला पेड गिर गया था। बाद में इसी स्थान पर दूसरा पौधा रोपा गया। राजा वृक्ष के समान ही राजकुमार पेड़ की भी पूजा की जाती है। यहां यह भ्रांति लम्बे समय तक रही कि राजा व रानी वृक्ष नर व मादा के अलग-अलग पेड़ हैं इसलिए इन्हें जोड़े में ही रोपित करना चाहिये। वनस्पति विज्ञान के अनुसार इन वृक्षों में लगे पुष्पों में नर एवं मादा दोनों जननांग रहते हैं।
मांगलियावास में जिन कल्पवृक्षों की पूजा की जाती है वे अफ्रीका मूल के हैं जो विशाल तथा दीर्घजीवी होते हैं। हमारे देश में ये अरब व्यापारियों द्वारा लाये गये थे। अंग्रेजी में इन्हें ‘बाओबाब’ तथा ‘मंकी-ब्रेड’ और हिन्दी में ‘खुरसाणी-इमली’ तथा ‘मांडव की इमली,’ ‘गौरख इमली’ तथा ‘हाथी पांव’ कहते हैं। फ्रांस के एक प्रकृति प्रेमी माइकल अडनसन ने अफ्रीका के सेनेगल में सर्वप्रथम 1754 में इन्हें देखा था। उन्हीं के सम्मान में इसका वानस्पतिक नाम ‘अडनसानियो-डिजीटेटा’ दिया गया। ग्रामीण जीवन में पेड़ का हर एक भाग उपयोगी होने से इसे कल्पवृक्ष तुल्य माना गया।
वर्ष 2022 के गर्मी के मौसम में मध्यप्रदेश में धार के आसपास इसके ग्यारह पेड़ उखाड़कर ट्रालों में रखकर हैदराबाद ले जाए गये जहां इन्हें एक वानस्पतिक उद्यान में प्रत्यारोपित किया जाना था। इस कार्य की अनुमति पर काफी विवाद हुआ एवं लोगों ने भी जमकर विरोध किया। इससे वन विभाग ने इस पर रोक लगा दी। जबलपुर उच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लेकर एक अंतरिम आदेश के तहत इस कार्य पर प्रतिबंध लगाया। मांगलियावास में कल्पवृक्षों की पूजन दर्शाती है कि हमारे देश के लोगों की आस्था पेड़ों के प्रति काफी गहरी है चाहे वे देशी हों या विदेशी। (सप्रेस)


