ओडिशा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके और रिटायरमेंट के बाद बतौर वकील सक्रिय न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने 7 सितंबर को दिल्ली के ‘इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर’ में एक महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। यहां इसके संपादित अंश दिए गए हैं।)
अमन नम्र
भारत का संविधान किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं – यह एक जीवित दस्तावेज़ है, जो हमारे रोज़मर्रा के लोकतांत्रिक जीवन को दिशा देता है। जस्टिस एस. मुरलीधर के हाल के विस्तृत व्याख्यान का मूल आग्रह यही था कि धर्मनिरपेक्षता, समानता और ‘विधि-के-राज’ को केवल जुमलों में नहीं, संस्थागत आचरण में उतारा जाए – न्यायपालिका, वकालत, प्रशासन, सेना, विद्यालय – सबमें।
भारत कभी भी ‘एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति’ का देश नहीं रहा और न कभी हो सकता है। यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अनेक आदिवासी परंपराएँ समान रूप से फलती-फूलती आई हैं। यही बहुलता भारत की पहचान है और यही गर्व का कारण भी है।
भारत का धर्मनिरपेक्ष मॉडल पश्चिम से अलग है। अमेरिका की तरह यहाँ ‘चर्च और स्टेट के बीच सख़्त दीवार’ नहीं है। फ्रांस की तरह राज्य को धर्म में दखल देने की पूरी छूट भी नहीं है। भारतीय संविधान ने एक अनोखा रास्ता चुना – ‘सभी धर्मों को समान आदर और दूरी’ का रास्ता।
अनुच्छेद 14 और 15 समानता और भेदभाव-निषेध की गारंटी देते हैं। अनुच्छेद 25 से 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित करते हैं। अनुच्छेद 51(A)(e) हर नागरिक का यह कर्तव्य बताता है कि वह धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग से ऊपर उठकर भाईचारा और सौहार्द बढ़ाए।
जस्टिस मुरलीधर ने कहा- ‘सेक्युलर शब्द संविधान में 42वें संशोधन (1976) से आया, लेकिन इसकी आत्मा ‘संविधान सभा’ की बहसों और मूल अधिकारों में पहले से मौजूद थी।’ जस्टिस मुरलीधर ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ को प्रशासनिक आचरण की आत्मा बताया यानि शासन और न्याय में सिर्फ़ निष्पक्ष होना काफ़ी नहीं, निष्पक्ष दिखना भी उतना ही आवश्यक है।
मसलन – शपथ के तुरंत बाद न्यायाधीशों का किसी विशेष धर्मस्थल पर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रदर्शन। निजी आस्था पर आपत्ति नहीं, पर सार्वजनिक प्रदर्शन से न्याय पर जनता का भरोसा प्रभावित होता है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में हवन और मंत्रोच्चार जैसी रस्में, जिन पर जजों ने ही आपत्ति उठाई कि न्यायालय एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है; ऐसे आयोजनों की सार्वजनिकता संवेदनशीलता माँगती है।
जस्टिस मुरलीधर के व्याख्यान ने अयोध्या मामले को ‘कानून बनाम लोकप्रिय आग्रह’ के रूप में परखा। लंबित मामलों की बाढ़ और ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ के निर्णय के बाद भी देशभर में ग़्यानवापी, मथुरा इत्यादि से जुड़े कई नए वाद (17 मुक़दमे) दायर हुए। सुप्रीमकोर्ट ने फिलहाल इन पर रोक-टोक जैसे निर्देश दिए, पर मूल प्रश्न है : इस अधिनियम की वैधता पर शीघ्र निर्णय क्यों न हो, ताकि निचली अदालतें बंटी न रहें?
बेंच ने मध्यस्थता की सम्भावनाएँ औपचारिक रूप से आज़माईं, पर उसे पर्याप्त समय और अवसर नहीं मिला। पाँच जजों की पूर्व राय और उस दौर की राजनीतिक-सामाजिक संवेदनशीलता देखते हुए, बातचीत से रास्ता और पुख़्ता बन सकता था। सुनवाई सितम्बर 2019 में समाप्त हुई और 9 नवम्बर 2019 को फैसला आया। बड़ी, बहु-खंडित फ़ाइलों वाले प्रकरण में यह असामान्य तेजी बताई गई। प्रश्न उठा कि क्या सभी जजों को हज़ारों पन्ने नाप-तौलकर पढ़ने-समझने का पर्याप्त अवसर मिला?
सन् 1992 की विध्वंस-घटना को सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं ‘क़ानून के राज का घोर उल्लंघन’ कहा, फिर भी उस समय के शीर्ष ज़िम्मेदारों पर अवमानना की कार्यवाही आगे न बढ़ना एक तरह की ‘संस्थागत विस्मृति’ है। निर्णय के साथ संलग्न एक ‘एजेंडा/नोट’ का हवाला दिया गया – जो कथित रूप से किसी गुमनाम न्यायाधीश के नाम से था और मुख्य मत से अलग निष्कर्ष पेश करता था। सवाल यह है कि क्या इसे साधारण ‘समर्थक मत’ की तरह पढ़ना चाहिए था, जबकि निष्कर्ष टकराते दिखते हैं?
चर्चा में यह भी मत आया कि सुप्रीमकोर्ट ने अयोध्या नगर की सीमा में वैकल्पिक ज़मीन का निर्देश दिया, जबकि व्यवहार में स्वीकार्य ज़मीन क़रीब 25 किमी दूर मिली। जब समुदाय के भीतर ही सहमति न बने, तो बाहरी समन्वय और कठिन हो जाता है। इससे सीख मिलती है कि अंतर-समुदाय संवाद जितना ज़रूरी है, अंतर-समुदाय सहमति भी उतनी ही अनिवार्य है।
कर्नाटक के हिजाब विवाद में सुप्रीमकोर्ट की दो-न्यायाधीशों वाली पीठ के विपरीत दृष्टिकोण सामने आए-यही बताता है कि ‘धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के टकराव में न्याय-तर्क कैसे बंट सकता है। स्कूल/कॉलेज को ‘समानता के द्वीप’ की तरह देखा गया – छात्र ‘एक जैसे दिखें, महसूस करें, सोचें,’ ताकि अनुशासन बना रहे। धार्मिक प्रतीकों को कक्षा-परिसर में सीमित/वर्जित मानने का आग्रह। संविधान के अनुच्छेद 19(1) (a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (गरिमा व निजता) के आधार पर कहा गया कि गेट पर हिजाब उतरवाना छात्रा की गरिमा का अतिक्रमण है। अनुशासन ज़रूरी है, पर स्वतंत्रता और गरिमा की क़ुर्बानी दे कर नहीं।
अदालतें अक्सर ‘अनिवार्य धार्मिक मान्यताओं’ पर टिकती हैं – पर यह टेस्ट कभी-कभी न्याय को धर्मशास्त्र की बहस में धकेल देता है। समाधान यह नहीं कि इन मान्यताओं को पूरी तरह ख़त्म कर दें; बल्कि विशेषज्ञ-साक्ष्य और सावधानीपूर्ण सीमांकन ज़रूरी है, वरना हर छोटी प्रथा भी ‘अनिवार्य’ का दर्जा माँगने लगेगी।
एक रोचक, पर शिक्षाप्रद प्रसंग-ओडिशा के हीराकुंड बाँध के उद्घाटन में स्थानीय अधिकारी ने ‘राहुकाल’ के कारण रिबन-कटिंग का मुहूर्त बाद का सुझाया। जवाहरलाल नेहरू ने स्थल पर पहुँचते ही तुरंत फीता काट दिया। संकेत साफ़ था – लोक-कार्यों में धार्मिक/ज्योतिषीय प्रतिबंध निर्णायक नहीं हो सकते। यानि सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति अपनी निजी आस्था रखता है, पर सार्वजनिक निर्णय वैज्ञानिकता, नागरिक हित और संवैधानिकता से निर्देशित होने चाहिए।
सबरीमला निर्णय (4–1) के दो महीने बाद ही रिव्यू में नई संरचना के साथ बहुमत बदल गया; फिर मामला सात-न्यायाधीशों की पीठ को व्यापक प्रश्नों के लिए सौंपकर ‘कोल्ड स्टोरेज’ में चला गया। संविधान-पीठ के फ़ैसले भी अगर महीनों में अनिश्चित हो जाएँ, तो कानून की ‘अंतिमता’ (finality) पर समाज का भरोसा डगमगाता है।
न्यायपालिका की तरह बार भी ध्रुवीकृत हुआ है। ज़रूरत ऐसे वकीलों की है जो अदालत के सामने निडर होकर कहें – ‘यह संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।’ संविधान से ‘सेक्युलरिज़्म’ हटाओ, ‘रीनेमिंग कमीशन’ बनाओ आदि की याचिकाएं बार-बार आती हैं और खारिज भी होती हैं; पर ये न्यायिक समय की बर्बादी है और सार्वजनिक विमर्श को हल्का करती हैं। युवा वकीलों का निचली अदालतों में जाकर कठिन मामलों को उठाना – यही लोकतांत्रिक न्यायशास्त्र को मज़बूत करेगा।
एक फ़ौजी अफ़सर द्वारा ‘ग़ैर-धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं’ पर आपत्ति उठाने के बाद बर्ख़ास्तगी – फिर अपील खारिज – जैसे प्रसंग सामने आए। यह प्रवृत्ति ख़तरनाक है। धर्मनिरपेक्षता केवल न्यायालय का मूल्य नहीं, सेना से लेकर स्कूल तक हर संस्थान की कार्य-संस्कृति का आधार होना चाहिए।
कुछ पूर्व-न्यायाधीशों का राजनीति में जाना नया नहीं है, पर आवृत्ति बढ़ी-सी लगती है। कुछ न्यायाधीशों के सार्वजनिक वक्तव्यों में ‘दैवी-प्रेरणा से निर्णय लिखा’ जैसी बातें भी आईं। प्रश्न यह नहीं कि व्यक्ति क्या मानता है; प्रश्न है-निर्णय का तर्क किस पर टिका है? संविधान पर या निजी-आस्था पर?
धर्मनिरपेक्षता का बीजारोपण स्कूलों में हो। सुबह की प्रार्थना, पर्व-उत्सव, कक्षा के आख्यान-सबमें समावेशिता। ‘भारत-पाक मैच’ या किसी घटना के बाद मुस्लिम बच्चों को ‘पाकिस्तानी’ कहकर चिढ़ाना-यह दीर्घकालिक आघात छोड़ता है। अनुशासन और समरूपता के नाम पर गरिमा-स्वतंत्रता-विविधता की बलि न चढ़े।
जस्टिस मुरलीधर के व्याख्यान में एक अहम बात थी – अंतर-समुदाय (हिन्दू-मुस्लिम) संवाद जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी इंट्रा-समुदाय (समुदाय के भीतर) सहमति बनाना भी है। अयोध्या में मस्जिद के लिए वैकल्पिक ज़मीन को लेकर वक़्फ़ बोर्ड/स्थानीय पक्षों के बीच अलग-अलग रुख़-इसी ने अंतिम चयन को जटिल बनाया। पहले घर के भीतर बातचीत की संस्कृति मजबूत करें-तभी बाहर से भी सकारात्मक संवाद सम्भव होगा।
जस्टिस मुरलीधर का आग्रह स्पष्ट है-न्यायपालिका हो या वकालत, सेना हो या विद्यालय-संवैधानिक नैतिकता को सार्वजनिक आचरण में जड़ देना होगा। अदालतें काउंटर-मेज़ॉरिटेरियन संस्थाएँ हैं-उन्हें लोकप्रिय दबाव नहीं, कानून और अधिकारों से संचालित होना चाहिए। वकीलों को ध्रुवीकरण छोड़कर साहसी संवैधानिक पैरवी करनी होगी। संस्थाओं के भीतर धर्मनिरपेक्ष चरित्र की रक्षा पर सजग रहना होगा।
समाज में, विशेषकर स्कूलों में, विविधता का उत्सव मनाना होगा, तभी अगली पीढ़ी ‘सेक्युलर इंडिया’ को निजी अनुभव के रूप में जी पाएगी, न कि सिर्फ़ किताबों में पढ़ेगी। अंत में, नेहरू-हीराकुंड का पाठ याद रखिए। सार्वजनिक निर्णय मुहूर्त नहीं देखते-नागरिक हित देखते हैं। यही लोकतंत्र की रीढ़ है और यही संविधान का मर्म। (सप्रेस)


