जन-श्रम और प्रकृति का मेल : बेतवा उद्गम स्थल के पुनर्जीवन की पहल

डॉ. परशुराम तिवारी

मध्यभारत की प्राचीन नदी बेतवा के उद्गम स्थल झिरी में एक प्रयोग संपन्न हुआ है। 25 से 31 मई 2025 तक आयोजित “बेतवा श्रमदान सप्ताह” में सर्वोदय विचारधारा से प्रेरित समाजसेवियों और ग्रामीणों ने मिलकर केवल श्रम और संकल्प के बल पर 55 बोल्डर चैक डैम बना डाले — वह भी बिना किसी सरकारी अनुदान या मशीनरी के। भीषण गर्मी और दुर्गम वन क्षेत्र में यह कार्य संपन्न करना जहां एक ओर चुनौती था, वहीं यह पर्यावरणीय पुनरुद्धार की संभावनाओं को भी उजागर करता है।

मध्यप्रदेश के रायसेन ज़िले के झिरी वन ग्राम से निकलकर लगभग 600 किलोमीटर का सफ़र तय कर उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के पास यमुना नदी से मिलती है। विश्व की लगभग सभी नदियों की तरह ही बेतवा भी संकटग्रस्त है। झिरी गाँव, जहाँ से बेतवा नदी की धारा निकलती है, पिछले डेढ़ वर्ष से सूखी पड़ी थी। जल स्तर गिरने के कारण पहली बार इतिहास में यहाँ से नदी की मूल धारा विलुप्त हो गई। इसके पीछे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, जल-जैविक संतुलन को नुकसान पहुँचाने वाली खेती और वर्ष में तीन-तीन बार पानी मांगने वाली फसलें उगाना जैसे कारण रहे। इन समस्याओं को समझते हुए डॉ. आर.के. पालीवाल, डॉ. सुरेश गर्ग ने 2022 में “बेतवा अध्ययन एवं जनजागरण यात्रा समूह” की नींव रखी थी । इस समूह ने व्यापक जनसंपर्क, यात्रा, वेबिनार और स्थानीय बैठकों के माध्यम से जनजागरण फैलाया और ग्रामीणों को पुनर्जीवन कार्यों से जोड़ा।

उल्‍लेखनीय है कि डॉ पालीवाल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर इनकम टैक्स के सर्वोच्च पद से सेवानिवृत्‍त होकर ग्राम सेवा समिति भोपाल के माध्यम से समग्र ग्राम विकास, जैविक खेती और प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र से जुड़े हैं, जिसके तहत बेतवा अध्ययन एवं जनजागरण यात्रा भी आती है। डॉ सुरेश गर्ग वरिष्ठ सर्जन हैं और स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद गांधी सुमिरन मंच के माध्यम से गांधी विचार के विविध रचनात्मक कार्यों से जुड़े हैं।

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श्रमदान सप्ताह का आरंभ 25 मई को हुआ था। सैंकड़ों किलोमीटर दूर से आए स्वयंसेवियों ने गाँव के बच्चों और किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया। उद्गम स्थल की सफाई, खेतों में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग हेतु गड्ढे, वृक्षारोपण की तैयारी और सबसे महत्त्वपूर्ण — स्थानीय पत्थरों से छोटे-छोटे चैक डैम का निर्माण — यह सब दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

प्रत्येक दिन दो सत्रों में श्रमदान होता रहा: प्रातः 7 से 11 और सायं 3 से 6 बजे तक। पहले दिन जहाँ गाँव के पुजारी की झोंपड़ी की मरम्मत और सफाई कार्य हुआ, वहीं धीरे-धीरे निर्माण कार्यों ने गति पकड़ी। तीसरे दिन तक 7 चैक डैम बन चुके थे। एन.जी.ओ. पाठशाला के संस्थापक डॉ. परशुराम तिवारी,  पर्यावरण प्रेमी अभ्युदय केलकर और रेहटी के युवा राज यादव भी जुड़े और आवश्‍यक सहयोग किया। और छठे दिन एक ही दिन में 30 चैक डैम बनाकर एक मिसाल कायम की गई। आखिरी दिन गाँव के सरपंच तक ने अपने हाथों से पत्थर उठाकर श्रमदान में भाग लिया।

इस अभियान में डॉक्टर, प्रोफेसर, समाजसेवी, वन अधिकारी, चित्रकार और बच्चे-बुजुर्ग सब एक साथ जुड़े। श्रमदान सप्ताह में शामिल प्रमुख कार्यकर्ताओं में शैलेन्द्र यादव (भोपाल), अनीता दीदी (विदिशा), सौरभ पांडेय (रायसेन), दयाराम विश्वकर्मा (झिरी), एवं मीना बाई (स्थानीय महिला समूह प्रमुख) का विशेष योगदान रहा। आजाद सिंह डबास, आई एफ एस, सेवानिवृत अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक मध्य प्रदेश, कौशलेंद्र सिंह आई एफ एस, सेवानिवृत प्रधान मुख्य वन संरक्षक छत्तीसगढ़ भी श्रमदानियों के उत्साह वर्धन के लिए पहुंचे थे।

बच्चों में दसवीं के छात्र राहुल, कक्षा आठवीं की छात्रा नेहा और कक्षा छठी के सूरज ने न केवल उत्साह से काम किया, बल्कि स्वयं अपने-अपने दोस्तों के समूह बनाकर दिनभर पत्थर ढोए और पानी के गड्ढे बनाए। इनके साथ ही स्वराज विद्यालय से आए छात्र-छात्राओं ने भी सुबह-शाम श्रमदान में भाग लिया।

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भोपाल से आए युवा दस्ते ने भोजन व्यवस्था और संवाद रिकॉर्डिंग में सहयोग दिया। साथ ही, तरुण भारत संघ के जल विशेषज्ञ विजय सिसौदिया एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर महावर ने तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया।

मुंबई के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आबिद सुरती ने पोस्टर डिज़ाइन कर जनजागरूकता बढ़ाई। बेतवा उदगम स्थल पर लगाए गए इन पोस्टर से यहां आने वाले बेतवा भक्त और पर्यटक बेतवा की बदहाली से परिचित होते गए और श्रमदान अभियान से जुड़ते गए। समापन सत्र में विदिशा से डॉ सुरेश गर्ग और डॉ कुसुम गर्ग, सुनील जैन, रघुवीर सिंह और सुमित दांगी भी आए। समीक्षा बैठक के बाद डॉ सुरेश गर्ग ने कुशल नेतृत्व के लिए डॉ. आर के पालीवाल को बधाई दी और प्रो अरविंद द्विवेदी, विनोद पटेरिया, अभ्युदय केलकर, युवा फाउंडेशन भोपाल के संस्थापक परीक्षित सिंह, भोपाल के पर्यावरण प्रेमी शरद कुमरे, डॉ परशुराम तिवारी, सरपंच कमल सिंह गुर्जर आदि निरंतर सक्रिय साथियों का आभार व्यक्त किया। एक सप्ताह के इस श्रमदान अभियान से यह उम्मीद बंधी है कि वर्षा ऋतु में इन चैक डैम के कारण जल संचय होगा, भूजल स्तर उठेगा और बेतवा की सूखी धारा फिर से जीवित होगी। साथ ही, यह मॉडल देश के अन्य संकटग्रस्त जल स्रोतों के पुनर्जीवन के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।

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