स्वच्छता का सिरमौर कहलाने वाला, विकास और समृद्धि की चमक में डूबा इंदौर आज एक भयावह विडंबना से गुजर रहा है। जहाँ मेट्रो, फ़्लाईओवर और करोड़ों के समारोह हैं, वहीं लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। भागीरथपुरा की त्रासदी ने साबित कर दिया है कि चमकते विकास के नीचे बुनियादी ज़रूरतों की घोर उपेक्षा छिपी हुई है।
कविता त्रिवेदी
स्वच्छता का सिरमौर, मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी और मालवी मिठास से तरोताज़ा इंदौर—क्या सचमुच बेचैनी में जी रहा है?
नहीं, क्यों जियेगा! मेट्रो है, बड़े-बड़े फ़्लाईओवर बन रहे हैं, बढ़ती अमीरी है और चारों दिशाओं में फैलता शहर, जिसे गर्व है कि वह स्वच्छता में नंबर वन है। राष्ट्रीय स्तर के IIM और IIT होने का गौरव भी इसी शहर को प्राप्त है। अकूत धन संपदा वाले लोग भी इसी शहर के निवासी हैं। लोकसभा अध्यक्ष का गौरव भी इसी शहर की महिला सांसद को मिला है। महिला विश्व कप के तीन-तीन मुक़ाबले यहाँ हुए हैं।
विवाह समारोहों में जहाँ आतिशबाज़ी पर लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं और जिसकी चकाचौंध से शहर की आँखें चौंधिया जाती हैं— क्या वही शहर, जहाँ शहरीकरण की दौड़ में धूल-गुबार से भरे वातावरण में साँस लेना मुश्किल हो रहा हो, बेचैन नहीं होगा?
इंदौर की यह तिलस्मी चकाचौंध अचानक तब बेचैन हो गई, जब 26 दिसंबर 2025 की रात भागीरथपुरा क़स्बे में एक महिला गोमती रावत की दूषित व मिश्रित जल पीने से मौत हो गई। यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है। क़रीब 21 मौतें और हज़ारों लोग दूषित पानी से बीमार हो चुके हैं।
यह कोई नया मामला नहीं है। दो वर्ष पहले भी भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से एक युवती की मौत हुई थी। उस समय, 2024 में क्षेत्रीय पार्षद ने महापौर पुष्यमित्र भार्गव को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि दूषित पेयजल के कारण क्षेत्रवासी विभिन्न बीमारियों से त्रस्त हैं। लेकिन व्यवस्था की अनदेखी और लापरवाही का नतीजा आज हमारे सामने है, जब पूरे क्षेत्र को एपिडेमिक ज़ोन घोषित करना पड़ा।
यह समस्या आज की नहीं है। 2022 से इंदौर का हर कोना पानी की समस्या से जूझ रहा है। शहर भूजल और नर्मदा जल पर निर्भर है। लगभग 70–80 प्रतिशत पानी नर्मदा से और 20 प्रतिशत भूजल दोहन से मिलता है।
नगर निगम का सालाना बजट लगभग 7,000 करोड़ रुपये है, जिसमें से 300–400 करोड़ रुपये केवल स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने पर खर्च किए जाते हैं। महापौर स्वयं कह चुके हैं कि “हम घी से भी महंगे दामों पर पानी ला रहे हैं”, फिर भी नगर निगम और प्रशासन आम जनता को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हुए हैं। स्थिति यह है कि आज शहर का नागरिक पानी पीने से डर रहा है।
शहर के किसी भी हिस्से में चले जाइए — हर व्यक्ति बोरिंग, टैंकर या नर्मदा के पानी पर निर्भर है। अमीरी-गरीबी को एक धरातल पर देखें तो इंदौर में यदि कहीं समानता दिखाई देती है, तो वह पानी की असुरक्षा में है।
हाल ही में इस त्रासदी के बाद एक संगोष्ठी में मैंने उन लोगों से प्रश्न किया, जिन्होंने इस शहर को बढ़ते हुए देखा है और विकास में योगदान दिया है। सभी ने एक स्वर में स्वीकार किया कि इंदौर का कोई ठोस मास्टर प्लान कभी बना ही नहीं। यह जनता का शहर है — जिसे जैसा समझ आया, उसने वैसा विकास कर लिया।
पानी की समस्या का सबसे बड़ा कारण शहर की तेज़ी से बढ़ती आबादी रही है। ऐतिहासिक रूप से शहर कुओं, बावड़ियों, तालाबों तथा खान, शिप्रा और गंभीर जैसी छोटी नदियों पर निर्भर रहा। 1939 में बना यशवंत सागर आज के अत्यधिक शहरीकरण और व्यावसायिक विस्तार में शहर की प्यास बुझाने में सक्षम नहीं हो सकता।
माँ नर्मदा का आभार है, जिसने इंदौर को संजीवनी दी, अन्यथा यह शहर आज आधा-अधूरा होता।
1990 में नर्मदा जल योजना का पहला चरण आया। लगा कि भागीरथी माँ सबके दुःख हर लेगी, लेकिन 35 वर्ष बाद भी, जब नर्मदा के चौथे चरण की बात हो रही है, जिस पर 1,400 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है तब भी जनता दूषित पानी पीने को मजबूर क्यों है?
यह व्यवस्था की नाकामी और लापरवाही है। 35 वर्षों से सत्ता में बैठी सरकार ने जनता को गुमराह किया। सांसद, विधायक और नगर निगम सब पर भरोसा करने के बावजूद जनता को दूषित पानी पीने को मजबूर किया गया, जो अक्षम्य अपराध है।
इंदौर की इस त्रासदी ने कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है? क्या प्रभुता में मदमस्त सत्ता और हाशिए पर पड़ा विपक्ष या सत्ता के भीतर ही नूरा-कुश्ती का खेल चल रहा है?
1983 के बाद से अधिकांश समय इंदौर नगर निगम पर भाजपा का शासन रहा है। स्वर्गीय सुरेश सेठ का कार्यकाल आज भी याद किया जाता है। कैलाश विजयवर्गीय को गलियों को सड़कों में बदलने का श्रेय जनता देती है। मालिनी गौड़ का कार्यकाल इंदौर का स्वर्णिम समय माना जाता है।
लेकिन तुलसीदास जी कहते हैं “अस कोई जन्मा जग नाहीं। प्रभुता पाही जात मद नाही॥”
भाजपा में प्रभुता मिलने के बाद आया अहंकार जगज़ाहिर है। नगर निगम पर हज़ारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप हैं। पीली गैंग के आतंक से आमजन से लेकर हाउसिंग सोसायटी तक त्रस्त हैं।
महापौर स्वयं कहते हैं “कोई सुनता ही नहीं।” सुनेगा भी क्यों? बजट बड़ा है, घोषणाएँ वीर हैं, पर पैसा नहीं। न गुणवत्ता है, न प्राथमिकता। करोड़ों रुपये सौंदर्यीकरण पर खर्च हो रहे हैं, जबकि स्वच्छ पेयजल और ड्रेनेज सिस्टम इंदौर की पहली आवश्यकता है।
यशवंत सागर के बाद एक भी नया रिज़र्व वॉटर बॉडी नहीं बनी। सैकड़ों कुएँ, बावड़ियाँ और तालाब या तो मलबे में दब गए या रिहायशी इलाक़ों की भेंट चढ़ गए। नगर निगम में अनुभवी अधिकारियों का अभाव है, जिन्हें शहर की नब्ज़ की समझ हो।
स्वच्छता का लबादा ओढ़े इंदौर राख के ढेर पर बैठा है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में इंदौर नगर निगम का बजट 8,237 करोड़ रुपये है, जिसमें 2,500 करोड़ रुपये केवल पेयजल आपूर्ति, नर्मदा योजना, पाइपलाइन नेटवर्क, जलशोधन संयंत्र, पंपिंग और मेंटेनेंस पर हैं। क्या कहीं पारदर्शिता दिखाई देती है?
जल बोर्ड पहले ही पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठा चुका है, लेकिन शासन तंत्र अब भी नींद में है। हादसे के बाद जनप्रतिनिधियों ने अधिकारियों को निलंबित कर मात्र औपचारिकता निभाई।
शहर की प्राथमिकताओं में शौर्य स्मारक, मेट्रो, ISBT, फ़्लाईओवर हैं जबकि अटल खेल परिसर, लता मंगेशकर ऑडिटोरियम और रीजनल पार्क की दुर्दशा जनता देख चुकी है।
NCRB 2023 के अनुसार, इंदौर में अपराध बढ़े हैं महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और आर्थिक अपराधों में शहर शीर्ष रैंक में है। हर गली-मोहल्ले में शराब की दुकानें अपराध को बढ़ावा दे रही हैं।
35 लाख की आबादी वाले शहर में 32 लाख पंजीकृत वाहन हैं जाम और बेचैनी स्वाभाविक है।
हाँ, इंदौर विकास कर रहा है। GDP 1.20 लाख करोड़, निर्यात 8,000 करोड़,1,100 कंपनियाँ और 750 स्टार्ट-अप हैं। आने वाले समय में यह युवाओं का शहर होगा।
लेकिन अहिल्याबाई होलकर की विरासत पर ऐसा विकास नहीं चाहिए। स्वच्छ पानी, स्वच्छ पर्यावरण और उत्तम स्वास्थ्य हर इंदौरवासी का अधिकार है भ्रष्टाचार की क़ीमत पर नहीं।
शहाब जाफ़री की पंक्तियाँ इस त्रासदी पर सटीक बैठती हैं— “तू इधर-उधर की न बात कर,/
ये बता कि क़ाफ़िला क्यों लूटा,/ मुझे राहज़नों से गिला नहीं, / तेरी रहबरी का सवाल है।”
कविता त्रिवेदी सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतक है।


