भारत की भाषाई विविधता विश्व में अद्वितीय, आज भी 1,150 से अधिक भाषाएँ जीवित : डॉ. गणेश देवी

भाषाओं को धर्म से जोड़ना सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल, भारतीय भाषाओं का दस्तावेजीकरण अंतिम चरण में

रिपोर्ट : कुमार सिद्धार्थ

भोपाल, 30 जून। प्रख्यात भाषाविद् एवं साहित्यकार डॉ. गणेश देवी ने कहा कि भारत आज भी दुनिया के सबसे समृद्ध भाषाई देशों में से एक है। देश में आज भी 1,150 से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ जीवित हैं, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता, ज्ञान परंपरा और सामाजिक इतिहास की जीवंत पहचान हैं।

उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, दर्शन, लोकज्ञान, जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक अनुभवों की संवाहक भी होती है। इसलिए भाषाओं का संरक्षण केवल साहित्यिक दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय जिम्मेदारी भी है।

वे मंगलवार को हम सब और गांधी भवन की संयुक्त पहल पर गांधी भवन, भोपाल में भारत : भाषाओं की भूमिका विषय पर व्‍याख्‍यान में बोल रहे थे।

भारत को कभी एक भाषा ने परिभाषित नहीं किया

डॉ. गणेश देवी ने कहा कि भारत की पहचान कभी भी एक भाषा पर आधारित नहीं रही है। देश की ताकत उसकी बहुभाषिकता और भाषाई विविधता में है। इसलिए किसी एक भाषा को पूरे भारत की एकमात्र भाषा के रूप में स्थापित करने का विचार भारतीय समाज की वास्तविकता से मेल नहीं खाता।

उन्होंने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट सांस्कृतिक अनुभव, इतिहास और ज्ञान परंपरा लेकर चलती है। इसलिए सभी भाषाओं को समान सम्मान और संरक्षण मिलना चाहिए। उनके अनुसार भारत की भाषाई बहुलता ही उसकी लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक शक्ति का सबसे बड़ा आधार है।

भारतीय भाषाओं का विकास अनेक ऐतिहासिक चरणों से हुआ

उन्होंने भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक विकास पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत के भाषाई इतिहास को विभिन्न कालखंडों में समझा जा सकता है। उन्होंने संस्कृत के प्रभाव वाले काल, उसके बाद फ़ारसी के प्रभाव वाले दौर तथा आधुनिक समय में अंग्रेज़ी के प्रभाव वाले काल की व्याख्या करते हुए बताया कि इन सभी चरणों ने भारतीय भाषाओं के स्वरूप, शब्दावली और अभिव्यक्ति को प्रभावित किया है। इसके बावजूद भारतीय भाषाओं ने अपनी मौलिकता, जीवंतता और सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखा है।

शिक्षा, न्याय और विज्ञान में भारतीय भाषाओं को मिले उचित स्थान

डॉ. देवी ने कहा कि भारतीय भाषाओं का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है, जब शिक्षा, प्रशासन, न्याय, विज्ञान और तकनीकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मातृभाषाओं तथा भारतीय भाषाओं को सम्मानजनक स्थान दिया जाए। उन्होंने कहा कि भाषाई विविधता लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है और किसी भाषा का लुप्त होना केवल शब्दों का खो जाना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक संसार का समाप्त हो जाना है।

उन्होंने युवाओं से भारतीय भाषाओं एवं लोकभाषाओं के अध्ययन, दस्तावेजीकरण और संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूंजी है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हम सभी का सामूहिक दायित्व है।

भाषाओं को धर्म से जोड़ना सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल

डॉ. गणेश देवी ने कहा कि किसी भाषा को किसी एक धर्म या समुदाय से जोड़कर देखना भारतीय भाषाई परंपरा के साथ अन्याय है। विशेष रूप से उर्दू के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उसे मुसलमानों की भाषा मानने की धारणा ऐतिहासिक रूप से गलत और सांस्कृतिक रूप से नुकसानदेह है। उर्दू भारतीय समाज की साझा विरासत है, जिसका विकास अनेक भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं के मेल से हुआ है।

उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में विकसित दक्खिनी उर्दू इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। दक्खिनी साहित्य और भाषा का इतिहास बताता है कि उर्दू किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि विविध सांस्कृतिक संपर्कों से विकसित हुई भाषा है। जिस तरह संस्कृत को केवल हिंदुओं, अरबी को केवल मुसलमानों या अंग्रेजी को केवल ईसाइयों की भाषा नहीं कहा जा सकता, उसी तरह उर्दू को भी किसी धर्म की भाषा कहना उचित नहीं है।

समाज भाषाएँ बनाता है, सत्ता उन्हें बाँधने का प्रयास करती है

डॉ. देवी ने कहा कि भारत की भाषाई विविधता समाज की सबसे बड़ी शक्ति है। भाषाएँ लोगों के आपसी संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साझा इतिहास से विकसित होती हैं, जबकि सत्ता और प्रशासन प्रायः उन्हें सीमाओं और वर्गीकरण में बाँधने का प्रयास करते हैं। समाज का स्वभाव इन सीमाओं को तोड़कर नए संवाद और नई सांस्कृतिक संभावनाएँ विकसित करना है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में भाषाओं के संरक्षण की चुनौती

अपने व्याख्यान में उन्होंने डिजिटल युग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तकनीक मानव जीवन, स्मृति और भाषा के स्वरूप को तेजी से बदल रही है। ऐसे समय में भारतीय भाषाओं की जीवंतता, विविधता और मानवीय अनुभवों को सुरक्षित रखना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने आगाह किया कि केवल तकनीकी विकास पर्याप्त नहीं है, बल्कि भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाज की मजबूती उसकी भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता के सम्मान में निहित है। भारत की सभी भाषाओं को समान गरिमा और अवसर मिलना चाहिए, क्योंकि यही देश की सांस्कृतिक एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार है।

राष्ट्रीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण का विशाल कार्य अंतिम चरण में

डॉ. गणेश देवी ने कहा कि भारत की राष्ट्रीय स्तर पर बोली जाने वाली भाषाओं के व्यापक दस्तावेजीकरण का उनका दीर्घकालिक कार्य अब अंतिम चरण में है। उन्होंने बताया कि देश की 94 राष्ट्रीय भाषाओं पर आधारित प्रकाशन श्रृंखला में अब तक 86 खंड प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि आठ खंडों पर काम जारी है।

उन्होंने कहा कि इस परियोजना का प्रकाशन वर्ष 2013 के आसपास शुरू हुआ था और तब से वे प्रतिदिन छह से आठ घंटे इस कार्य में दे रहे हैं। उनके अनुसार यह केवल पुस्तकों का प्रकाशन नहीं, बल्कि भारत की भाषाई विरासत को भविष्य के लिए संरक्षित करने का प्रयास है।

ग्रियर्सन के सर्वे की तरह पीढ़ियों तक चलने वाला कार्य

डॉ. देवी ने कहा कि इस तरह के कार्य में दशकों लग जाते हैं। उन्होंने भाषाविद् जॉर्ज ग्रियर्सन के लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया का उदाहरण देते हुए कहा कि ग्रियर्सन ने 1898 में सर्वेक्षण का कार्य शुरू किया था, जो 1928 में जाकर पूरा हुआ। उसी तरह उन्होंने स्वयं 1998 में इस परियोजना की शुरुआत की थी और उम्मीद है कि यह 2028 तक पूरी हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े ज्ञान-प्रयास की तरह यह कार्य भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाएगा। यदि भविष्य में इसकी आवश्यकता होगी तो अन्य विद्वान इसे आगे बढ़ाएँगे और भारतीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण का कार्य निरंतर जारी रहेगा।

संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों, शोधार्थियों, साहित्यकारों एवं विद्यार्थियों ने भी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा भाषा-आधारित शोध को समय की आवश्यकता बताया। कार्यक्रम में भाषाई विरासत, लोकभाषाओं के संरक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे विषयों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

कार्यक्रम का संचालन राकेश दीवान ने किया। गांधी भवन के सचिव अंकित मिश्रा ने अतिथियों का सूत की माला पहनाकर स्वागत किया। रघुराज सिंह ने डॉ. गणेश देवी का परिचय प्रस्तुत किया, जबकि अंत में पीयूष बबेले ने आभार व्यक्त किया।

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