इंदौर में सेवा सुरभि द्वारा आयोजित गांधी जयंती व्याख्यान में राहुल देव का उद्बोधन
इंदौर, 28 सितम्बर। “आज के हर मोहल्ले और हर शहर में दस-दस, पचास-पचास गांधी चाहिए। जब तक गांधी की राह पर चलने वाले लोग सामने नहीं आएंगे, कटुताओं और विभाजनों का अंधेरा गहराता जाएगा। इंदौर जैसे बड़े दिल वाले शहर में कम से कम दस–पंद्रह लोग तो ऐसे होने चाहिए, जो आगे बढ़कर कटुताओं को चुनौती दें, संवाद करें और भाईचारे की राह दिखाएं। अगर हम यह शुरुआत करेंगे तो यहीं से सद्भाव की लहर उठ सकती है।

ये बातें वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक राहुल देव ने कहीं। वे आज सेवा सुरभि संस्था द्वारा गांधी जयंती के निमित्त “वैश्विक–राष्ट्रीय धार्मिक कटुताएं और गांधी दर्शन” विषय पर आयोजित व्याख्यान में बोल रहे थे।
वक्ता राहुल देव ने कहा कि आज का देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। धर्म, जाति और राजनीति के नाम पर फैलती नफरत अब केवल सार्वजनिक जीवन को नहीं, बल्कि घरों और मित्रताओं तक को तोड़ रही है। उन्होंने इंदौर की हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि जब शहर के बीचों-बीच “जेहादी मानसिकता वालों का प्रवेश निषेध” जैसे पोस्टर खुलेआम लगे मिलते हैं, तो यह केवल शासन-प्रशासन की नाकामी ही नहीं बल्कि समाज की संवेदनहीनता और नेतृत्व की विफलता है।
राहुल देव ने कहा कि गांधी हमेशा एक शाश्वत चुनौती की तरह हमारे सामने खड़े रहते हैं। उन्हें याद करने का अर्थ केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकना भी है। गांधी पर बात केवल बुद्धि से नहीं, नम और विनम्र हृदय से ही की जा सकती है।
आज के भारत में गांधी की जरूरत
आज की परिस्थितियों पर लौटते हुए राहुल देव ने कहा कि देश का सामाजिक ताना-बाना दरारों से भरता जा रहा है। नफरत ने हमारे रिश्तों को, हमारी मित्रताओं और यहां तक कि परिवारों को भी तोड़ दिया है। “ऐसे समय में केवल विरोध या प्रदर्शन से कुछ हासिल नहीं होगा। हमें गांधी की तरह निर्भय और निर्वैर होना पड़ेगा। अहिंसा और प्रेम से ही नफरत की दीवारें गिराई जा सकती हैं।”
उन्होंने कहा कि “गांधी कोई दर्शन नहीं, कोई वाद नहीं। वे एक रास्ता हैं—सत्य, अहिंसा और प्रेम का। इस रास्ते पर जितना चलेंगे, उतना ही रास्ता खुलता जाएगा। गांधी बनने की कोशिश शायद असंभव हो, लेकिन थोड़ा-थोड़ा गांधी बनने की कोशिश हर किसी को करनी चाहिए।”
नई पीढ़ी के लिए गांधी का महत्व
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज की नई पीढ़ी गांधी से दूर होती जा रही है। कई युवाओं के लिए गांधी का नाम ‘बेकार’ या ‘अप्रासंगिक’ होता जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी—“अगर यही हाल रहा तो कुछ वर्षों में पाठ्यक्रमों से गांधी का नाम हटा दिया जाएगा और नोटों से उनकी तस्वीरें भी गायब कर दी जाएंगी। यह केवल अतीत को मिटाना नहीं होगा, बल्कि हमारे भविष्य को भी अंधकारमय बना देगा।”
कटुताओं के बीच संवाद की जरूरत
पत्रकार राहुल देव ने कहा कि धार्मिक और जातीय कटुताओं के इस माहौल में गांधी की सीख और भी जरूरी हो जाती है। गांधी ने बार-बार सिखाया कि संवाद ही समाधान है। लेकिन संवाद तभी सफल होता है जब उसमें अहंकार, पूर्वाग्रह और कटुता न हो। संवाद का पहला नियम है—दूसरे को उतना ही सम्मान दो, जितना अपने लिए चाहते हो।
उन्होंने उदाहरण दिया कि आज परिवारों में भी संवाद खत्म हो रहा है—पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, भाई-बहनों के बीच। यही स्थिति धर्मों, जातियों और देशों के स्तर पर भी है। उन्होंने कहा, “जहां संवाद ही नहीं है, वहां गलतफहमियां और कटुताएं पनपेंगी ही। गांधी का रास्ता सिखाता है कि कटुता मिटाने का उपाय केवल खुले मन और साफ हृदय से संवाद है।”
दक्षिण अफ्रीका से भारत तक गांधी का सफर
वक्ता राहुल देव ने गांधी के जीवन से कई महत्वपूर्ण उदाहरणों को भी प्रस्तुत किये। उन्होंने कहा कि गांधी का असली निर्माण भारत में नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका में हुआ। वहीं उन्होंने नस्ली भेदभाव, अन्याय और अपमान का सामना किया और वहीं सत्याग्रह और अहिंसा का प्रयोग प्रारंभ किया। “भारतीयों ने दक्षिण अफ्रीका को एक वकील भेजा था, लेकिन दक्षिण अफ्रीका ने भारत को एक महात्मा लौटाया,” उन्होंने कहा।
उन्होंने याद दिलाया कि गांधी पर दुनिया की पहली किताब भारत में लौटने से पहले ही दक्षिण अफ्रीका में लिखी गई थी। रोमां रोलां और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे विचारकों ने गांधी को विश्व स्तर पर ‘नए मसीहा’ की संज्ञा दी। यह दिखाता है कि गांधी केवल भारत के नहीं, बल्कि पूरी मानवता के नेता थे।
विभाजन और गांधी की असफलता–सफलता
गहन अध्येता राहुल देव ने स्वीकार किया कि गांधी हमेशा सफल नहीं रहे। जिन्ना के साथ लंबे संवादों के बावजूद वे विभाजन रोक नहीं पाए। “यह गांधी की हार ही नहीं, पूरे देश की हार थी। लेकिन गांधी की महानता यह थी कि उन्होंने कभी व्यक्ति को शत्रु नहीं माना। वे विचारों और प्रवृत्तियों से लड़े, व्यक्तियों से नहीं।”
उन्होंने पूना पैक्ट और डॉ. आंबेडकर के साथ संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि अगर गांधी ने हस्तक्षेप न किया होता तो दलित समाज स्थायी रूप से हिंदू समाज से अलग हो जाता। उन्होंने कहा कि गांधी ने अपने नैतिक दबाव से असंभव को संभव किया और हिंदू समाज की एकता को बचाया।
अपने जीवन का जिक्र करते हुए राहुल देव ने कहा कि वे तरूण अवस्था में स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रह चुके हैं, लेकिन गांधी और उनकी धर्मजिज्ञासा ने उन्हें नई दृष्टि दी। उन्होंने कहा कि मैंने उस वैचारिकी को जिया है, इसलिए उसकी खतरनाक सीमाओं को जानता हूं। उससे निकलने का रास्ता केवल गांधी ही दिखाते हैं।
राहुल देव ने व्याख्यान के अंत में कहा कि गांधी की प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक है। कटुताओं और विभाजनों से भरे इस समय में गांधी ही एकमात्र रास्ता हैं। अगर हमें भारत को सचमुच मजबूत और विश्वगुरु बनाना है तो हर मोहल्ले में, हर शहर में गांधी चाहिए। अहिंसा, सत्य और प्रेम ही हमारी असली ताकत हैं।
इसके पूर्व गांधी भजन की सुंदर प्रस्तुति यश शर्मा एवं साथियों ने दी। उन्होंने चार पांच गांधी भजनों की प्रस्तुति देकर माहौल को गांधीमय बनाया। यश शर्मा और साथियों का स्वागत शंकरलाल गर्ग ने किया।

इस मौके पर पिछले दिनों कालानी नगर चौराहे पर भीषण ट्रक हादसे के दौरान अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों की जान बचाने वाले कालू ठाकुर, आरक्षक पंकज यादव एवं पुष्पेंद्र चौहान का इस मौके पर शाल एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मान-अभिनंदन किया गया।
व्याख्यान का शुभांरभ अतिथि वक्ता राहुल देव, इंदौर के नवागत संभागायुक्त सुदामा खाडे, इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अरविंद तिवारी, गांधी विचारक अनिल त्रिवेदी एवं ओमप्रकाश नरेडा ने दीप प्रज्जवलित कर किया। अतिथियों को अभिनंदन स्वरूप दुपट्टा एवं प्रतीक चिन्ह भेंट अनिल गोयल, अतुल शेठ, ओमप्रकाश नरेडा ने किया। वक्ता का परिचय वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी ने दिया। स्वागत उदृबोधन कुमार सिद्धार्थ ने दिया और कार्यक्रम का प्रभावी संचालन संजय पटेल ने किया।


