राजनीति : हम बदलेंगे, तभी हमारी राजनीति भी बदलेगी

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

पिछले कुछ समय से एक नया विमर्श और सामने आया है कि जनता को मुफ्तखोर नहीं बनाया जाना चाहिए। इस विमर्श के पैरोकार, जहां भी उन्हें मौका मिलता है, पिछली सरकारों द्वारा हम सब में पनपाई गई इस तथाकथित मुफ्तखोरी की आदत को गरियाते नहीं थकते। उनका सोच है कि जनता को कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलना चाहिए। क्या वाकई इस नए विमर्श के पैरोकार इतने भोले हैं कि उन्हें सरकार द्वारा जनता के हित में किये गए काम मुफ्त के और दान के काम लगते हैं? क्या वे वाकई नहीं जानते कि इन कामों के लिए वित्त पोषण कहां से होता है?

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद बयानों और नेताओं के ‘आवागमन’ (इसे दलबदल पढ़ा जाए!) की जैसे बाढ़ ही आ गई है। हर छोटा-बड़ा नेता बढ़-चढ़कर बयान-पर-बयान दिये जा रहा है और हमारे संचार माध्यम उस नेता विशेष के दल की हैसियत या फिर उस नेता विशेष की हैसियत के अनुरूप उस बयान को प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं। यह हमारे नेताओं का ही दमखम है कि वे हर मुद्दे पर पूरे आत्मविश्वास से अनर्गल प्रलाप कर सकते हैं। अगर आप शांत चित्त हो उनके बयान को सुनें और फिर यह जानने का प्रयास करें कि उन्होंने जो कहा उसमें कितना ‘अन्न’ है और कितना ‘भूसा,’ तो आप अन्न को ढूंढते ही रह जाएंगे। हर नेता दूसरे दल के नेताओं को हमारी नज़रों में गिराने का हर सम्भव प्रयास करने  में लगा है। अगर आप दर्शक दीर्घा में खड़े होकर देखें तो पाएंगे कि इसको उसने खलनायक बना रखा है और उसको इसने। कुल मिलाकर दोनों ही एक जैसे नज़र आएंगे।

इसी के साथ यह भी हो रहा है कि हमारे नेताओं की ‘गतिशीलता’ बढ़ गई है। गतिशीलता अर्थात एक दल से दूसरे दल में जाने की रफ्तार। किसी दल को छोड़कर जाने वालों को यकायक यह इलहाम होता है कि जिस दल में वे अब तक थे वह तो एकदम जन विरोधी और निकम्मा है और जिस दल में वे शामिल होने वाले होते हैं उस दल को रातों-रात उस महान व्यक्तित्व के गुणों का पता चल जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर दल के पास उच्च कोटि के डिटर्जेण्ट से भरा एक बड़ा हौद है और जैसे ही कोई नेता उनके दल में प्रवेश करने को होता है वे उसे उस हौद में डुबोते हैं और उसकी छवि एकदम शुभ्र निर्मल हो जाती है!

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यह हाल किसी एक दल का नहीं, सारे दलों का है। क्या वाकई ऐसा होता है कि ठीक चुनाव से पहले किसी नेता के ‘ज्ञान-चक्षु’ खुलते हैं कि अरे, मैं जिस दल में था वह तो एकदम गया गुज़रा है! और जिस क्षण उसके ज्ञान चक्षु खुलते हैं, ठीक उसी क्षण उस दल के, जिसे वह छोड़कर जा रहा होता है, भी बड़े नेताओं को यह ज्ञान प्राप्त होता है कि वह नेता एकदम निकम्मा था और उसका उस दल की रीति-नीतियों में कोई विश्वास कभी था ही नहीं। छुटभैये दोनों तरफ कीचड़ की बाल्टियां लिये खड़े रहते हैं. उन बेचारों की भूमिका बस इतनी ही होती है।  

इन दिनों समाचार माध्यमों के जरिए जो पहुंच रहा है उसे देखते-सुनते मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर इन चुनावों में, जो जनता के नाम पर, जनता के लिए लड़े जाते हैं, आखिर जनता कहां होती है? क्या किसी को जनता के मुद्दों की, उसकी समस्याओं की, उनके समाधानों की कोई फिक्र होती है? या केवल ज़बानी जमा-खर्च ही होता है? अगर थोड़ा पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि शनै:-शनै: जनता की फिक्र करने का दिखावा तक लुप्त होता गया है। कभी ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा तो दिया गया था। इस बात को छोड़िये कि उस नारे से गरीबी कितनी हटी, कम-से-कम वहां ग़रीबों की फिक्र तो थी। आज के नेताओं और दलों की बयानबाज़ी देखिये तो पाएंगे कि अब उस तरह की फिक्र करने की भी कोई ज़रूरत महसूस नहीं की जाती।

जब भी चुनाव आता है, तथाकथित रूप से यह और वह मुफ्त में देने की घोषणाओं का अम्बार लगने लगता है। सारे राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर घोषणाएं करने लगते हैं कि अगर हम सत्ता में आ गए तो यह मुफ्त दे देंगे, वह मुफ्त दे देंगे। न तो वे बताते हैं और न जनता पूछती है कि यह मुफ्त में दिया किस खज़ाने से जाएगा? ज़ाहिर है कि जिसे मुफ्त कहकर प्रचारित किया जाता है वह सब हमारी जेब से निकालकर हमें ही समारोह पूर्वक दिया जाएगा। हां, देते वक़्त नेताजी उस तथाकथित दान के थैले पर अपनी बड़ी सी तस्वीर चिपकाना नहीं भूलेंगे।

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इस तथाकथित मुफ्त के संदर्भ में पिछले कुछ समय से एक नया विमर्श और सामने आया, बल्कि लाया गया है। यह विमर्श है कि जनता को मुफ्तखोर नहीं बनाया जाना चाहिए। इस विमर्श के पैरोकार, जहां भी उन्हें मौका मिलता है, पिछली सरकारों द्वारा हम सब में पनपाई गई इस तथाकथित मुफ्तखोरी की आदत को गरियाते नहीं थकते। उनका सोच है कि जनता को कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलना चाहिए। क्या वाकई इस नए विमर्श के पैरोकार इतने भोले हैं कि उन्हें सरकार द्वारा जनता के हित में किये गए काम मुफ्त के और दान के काम लगते हैं? क्या वे वाकई नहीं जानते कि इन कामों के लिए वित्त पोषण कहां से होता है? मुफ्तखोरी को गरियाने वाले कभी इस मुफ्तखोरी का प्रबंध करने वाले अपने नेताओं की शाही जीवन शैली पर, उन्हें मिलने वाली अनगिनत सुविधाओं पर भी कोई टिप्पणी करते हैं? एक ग़रीब देश की जनता के पैसों पर पलने वाले शाह खर्च नेताओं की विलासिता उनकी आंखों में क्यों नहीं खटकती है? 

बहुत कष्ट की बात है कि इस बात को एकदम ही भुला दिया गया है कि चुनाव इसलिए होते हैं कि हम अपना नेतृत्व चुनें और वह चुना हुआ नेतृत्व हमारे हित में काम करे। धीरे-धीरे हालात ये हो गए हैं कि चुनने वालों के रूप में हमारा नाम मात्र रह गया है, अन्यथा हमारे पास चुनने को कुछ है ही नहीं। बहुत बार हम मतदान इसलिए करते हैं कि हम चाहते हैं कि जो अब तक सत्ता में था, वह वापस न आए। हम इसलिए मतदान नहीं करते कि किसी की रीति-नीति अच्छी लग रही है। राजनीतिक विश्लेषक इसी को ‘नेगेटिव वोटिंग’ कहते हैं। यह कोई सुखद स्थिति नहीं है। हमें नागनाथ और सांपनाथ में से किसी को चुनना है और क्योंकि पिछली बार हमने नागनाथ को चुना था, इसलिए इस बार सांपनाथ को चुन लेंगे। इन नागनाथों  और सांपनाथों को भी हमारी कोई परवाह नहीं है। उन्होंने अपना जीत-हार का तंत्र बना लिया है, भीतर-ही-भीतर साठ-गांठ कर ली है। जीत-हार से उनकी सेहत पर कोई ख़ास असर भी नहीं पड़ता। अगर पड़ता होता, तो वे कुछ बदलते भी।  

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सोचने की बात यह है कि क्या यह सब यों ही चलता रहेगा? मैं बार-बार कहता हूं कि राजनीति बुरी नहीं है। उससे गुरेज़ की बात मैं कभी नहीं कहूंगा। असल बात यह है कि हम सब अत्यंत निष्क्रिय लोग हैं। हमने सब उनके भरोसे छोड़ दिया है। हम कभी उनसे सवाल नहीं करते हैं, हम कभी उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करते हैं। हम अपनी तुच्छताओं में विभाजित हैं। कभी हमें जाति प्रभावित करती है तो कभी धर्म, कभी मंदिर तो कभी मस्जिद। हम उनके हवा में मारे गए मुक्कों को उनकी बहादुरी समझकर उन पर लहालोट होते हैं। हम उनके आने पर उनकी दी हुई फूल मालाएं उन्हें पहना कर, उनका स्वागत कर, उनके साथ फोटो खिंचवाकर धन्य हो लेते हैं और जब वे जीतते हैं तो उन्मादित होकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाच-कूदकर यह ग़लतफहमी पालकर खुश हो लेते हैं कि अब हमारे दिन बहुरने ही वाले हैं। कभी किसी समझदार ने कहा था कि जनता को वैसी ही सरकार मिलती है जैसी सरकार की वह पात्र होती है। हम बदलेंगे, तभी हमारी सरकारें भी बदलेंगी।(सप्रेस)

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