कितने समावेशी, सुगम, सांस लेने लायक और लोकतांत्रिक बचे हैं, ‘स्मार्ट सिटीज़’

टिकेन्दर सिंह पंवार

हमारे समय की विकास योजनाओं की त्रासदी है कि वे आस-पड़ौस के संसाधनों और समाज को तरजीह दिए बिना खड़ी की जाती हैं। ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ भी इससे हटकर नहीं है। करीब दस साल पहले बड़े धूम-धडाकों के साथ उतारी गई यह योजना आज अपनी बदहाली की कहानी खुद कह रही है और इसके कथित लाभार्थी आम लोग अरबों-खरबों के टैक्स और कर्जों की मार झेल रहे हैं।

टिकेन्दर सिंह पंवार

जब 2015 में ‘स्मार्ट सिटीज़ मिशन’ शुरू हुआ, तो इसका वादा था कि शहरी भारत को उच्च तकनीक और नागरिक-हितैषी स्थानों के नेटवर्क में बदल देगा। यह नवाचार, सतत विकास और आधुनिक प्रशासन की भाषा के साथ आया, जिसमें ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ और क्षेत्र-आधारित विकास को प्रमुख बनाया गया। कागज़ पर यह भविष्य की ओर एक दूरदर्शी छलांग लगती थी, लेकिन एक दशक बाद, उसकी चमक फीकी पड़ गई है। ‘कमांड सेंटर्स,’ ‘डिजिटल कियोस्क’ और ‘सेंसर’ से भरे खंभों के नीचे विस्थापन, पर्यावरणीय क्षरण और साझा शहरी संसाधनों की बर्बादी की एक गहरी कहानी छुपी है।

समावेश नहीं, ढांचे की होड़

‘स्मार्ट सिटी’ का विचार समावेशी योजना से नहीं, बल्कि पूंजी-प्रधान बुनियादी ढांचे के जुनून से जुड़ गया—ऐसा ढांचा जिसे अक्सर लोगों के जीवन अनुभवों की अनदेखी कर तैयार किया गया। इसका आधार न तो पारिस्थितिक समझ थी और न ही समुदाय की भागीदारी, बल्कि एक सीमित तकनीकी सोच थी। शहर-दर-शहर फुटपाथ, पार्क, झीलें और खेल-मैदान—वे स्थान जो कभी शहरी जीवन में रोजमर्रा के हिस्से थे—स्मार्ट पुनर्विकास के नाम पर या तो हड़प लिए गए, उपेक्षित किए गए या नष्ट कर दिए गए।

गायब होते फुटपाथों का मामला

‘स्मार्ट सिटीज़ मिशन’ के प्रमुख शहरों में से एक बेंगलुरु को ही लें। इस योजना के तहत यहां तेजी से फ्लाईओवर और सिग्नल-फ्री कॉरिडोर बनाए गए। इन परियोजनाओं ने वाहनों की आवाजाही आसान करने का दावा तो किया, लेकिन चुपचाप फुटपाथों को निगल लिया। ‘मिलर्स रोड’ जैसे इलाकों में, नए बनाए गए पैदल रास्ते जल्दी ही निर्माण के मलबे से ढक गए। यहां तक कि शहर के ऐतिहासिक हरित क्षेत्र ‘क्यूब्बन पार्क’ तक को नहीं बख्शा गया। पार्क के भीतर एक ‘सेंसरी पार्क’ बनाने का प्रस्ताव संवेदनशील क्षेत्रों के लिए खतरा बन गया।  

यह कोई अकेला मामला नहीं था। भोपाल, जो एक और स्मार्ट सिटी है, में पैदल-पथ टूटे, अस्थायी दुकानों से घिरे या फिर पूरी तरह गायब थे। यही कहानी रांची में भी दिखी, जहां फुटपाथों पर रोजाना मोटरसाइकिलें और कारें खड़ी कर दी जाती थीं, जिससे पैदल चलने वालों को मजबूरी में व्यस्त सड़कों पर उतरना पड़ता था। ‘वॉकिंग फ्रेंडली’ शहरों के वादों के बावजूद, जमीनी हकीकत पैदल यात्रियों के लिए लगातार असुरक्षित बनी रही।

सौंदर्यीकरण के नाम पर पारिस्थितिक उपेक्षा

साझा संसाधनों पर यह हमला सिर्फ फुटपाथों तक सीमित नहीं था। झीलें, आर्द्रभूमियां और शहरी पार्क—जो लंबे समय से पारिस्थितिक और सामाजिक धरोहर रहे हैं—हाई-प्रोफाइल पुनर्विकास की दौड़ में नुकसान झेलते रहे। कोयंबटूर में सात ऐतिहासिक झीलों का ‘स्मार्ट सिटी’ बजट से सौंदर्यीकरण किया गया—वहां वॉकवे, फव्वारे और ‘व्यूइंग डेक’ बनाए गए, लेकिन एक साल के भीतर ही, इनमें से कई झीलें कचरे से पटीं और मच्छरों से भरी बदहाल जगहों में बदल गईं। जो झीलें कभी सामुदायिक स्थान हुआ करती थीं, वे अब घेराबंदी वाले, अर्ध-निजीकृत इलाके बन गईं—जहां मुख्य जोर सामाजिक उपयोगिता पर नहीं, बल्कि दिखावे पर था।

कोलकाता में यह कहानी और भी खतरनाक रूप ले चुकी थी। स्मार्ट सैटेलाइट सिटी के रूप में प्रचारित ‘राजारहाट’ या ‘न्यूटाउन’ के विकास ने क्षेत्र की पारिस्थितिकी को आकार देने वाली आर्द्रभूमियों और तालाबों को योजनाबद्ध तरीके से मिटा दिया। जलाशयों को पाटा गया और उनके ऊपर लक्जरी हाउसिंग और ‘टेक-पार्क’ बना दिए गए। इसे जलवायु-संवेदन टाउनशिप के रूप में बेचा गया था, लेकिन वह पारिस्थितिक भूल का एक क्लासिक उदाहरण बनकर रह गया। इसी तरह गुवाहाटी में भी ‘सोलाबील’ जैसी छोटी आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण हुआ, जिससे सिर्फ जल-प्रणालियां ही नहीं, बल्कि उन पर आश्रित गरीब समुदायों का भी विस्थापन हुआ।

उपेक्षित स्थल और खोई संभावनाएं

इसी बीच, बुनियादी ढांचे के उपेक्षित स्थल—फ्लाईओवर और ओवरब्रिज के नीचे की जगहें—या तो नजरअंदाज होती रहीं या व्यावसायिक क्षेत्रों में बदल दी गईं। अहमदाबाद में इन स्थानों को शुरुआत में जीवंत सार्वजनिक स्थलों के रूप में विकसित करने की योजना थी, जहां पुस्तकालय, बाजार और छायादार जगहें होतीं, लेकिन क्रियान्वयन में देरी हुई और कई स्थान कचरे के ढेर या अनौपचारिक पार्किंग स्थलों में बदल गए। बेंगलुरु में भी यही प्रवृत्ति देखी गई, जब तक कि ‘द अग्ली इंडियन’ जैसे नागरिक समूह आगे नहीं आए और रंग, सफाई और सामुदायिक भागीदारी से इन मृत पड़े इलाकों को फिर से जीवंत नहीं किया।

पुनर्विकास के नाम पर विस्थापन

‘स्मार्ट सिटी’ परियोजनाओं के तहत झुग्गी पुनर्विकास भी गरीबों के विस्थापन का आसान जरिया बन गया। अहमदाबाद में ‘रमो टेकरी’ जैसी झुग्गी बस्तियों को ‘स्मार्ट सिटी’ पुनर्विकास के लिए बिना समुचित सर्वेक्षण या समुदाय की भागीदारी के चिह्नित कर दिया गया। पुणे और भुवनेश्वर जैसे शहरों में, स्मार्ट सिटी योजनाओं के तहत बनाए गए किफायती आवासों ने पुरानी बस्तियों को कठोर ऊंची इमारतों से बदल दिया, जिससे वर्षों में विकसित सामाजिक और पारिस्थितिक तंत्र टूट गया।

पारिस्थितिकी की अनदेखी, कांक्रीट का उत्सव

इन तमाम उदाहरणों में एक पैटर्न उभरता है—पारिस्थितिकी की सुनियोजित अनदेखी। ‘स्मार्ट सिटीज़ मिशन’ ने पर्यावरणीय स्थायित्व की बजाय ठोस बुनियादी ढांचे—कांक्रीट की सड़कें, ‘कमांड सेंटर्स,’ निगरानी कैमरे —को तरजीह दी। शहरी झीलों का संरक्षण नहीं, सिर्फ सौंदर्यीकरण हुआ। पार्कों में ‘वाई-फाई’ और ‘एलईडी बोर्ड’ तो लगाए गए, लेकिन छांव और सफाई की कोई व्यवस्था नहीं हुई। तकनीकी चमक ने इस खोखलेपन को ढक दिया। स्मार्ट सड़कों का निर्माण बिना जल-निकासी योजना के हुआ। फुटपाथ बिछाए गए, मगर उनके जुड़ाव या सुगमता की परवाह नहीं की गई। नदी किनारे के तटबंध बनाए गए, जबकि ऊपरी हिस्सों की आर्द्रभूमियों को पाटा गया।

नागरिकों का प्रतिरोध और आंकड़ों का संकट

हालांकि नागरिक सिर्फ मूक दर्शक नहीं बने रहे। कई शहरों में साझा संसाधनों के दुरुपयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। बेंगलुरु में निवासियों ने ‘हेब्बल झील’ के निजीकरण के खिलाफ अभियान चलाया। जयपुर में, जब स्थानीय प्रशासन ‘स्मार्ट सिटी’ की मान्यता पाने की कोशिश कर रहा था, तब सुप्रीमकोर्ट ने ‘जलमहल झील’ को प्रदूषित करने पर फटकार लगाई। नवी-मुंबई में पर्यावरण समूहों ने तब चेतावनी दी जब ‘डीपीएस झील’ को आसपास के निर्माण के चलते जल-अवरोधों का सामना करना पड़ा। भोपाल में भी आम लोगों के विरोध के चलते शहर के फेंफडे माने जाने वाले खुले इलाकों से प्रस्तावित ‘स्मार्ट सिटी’ को हटाया गया।   

संदर्भहीन तकनीक

इससे भी ज्यादा चिंताजनक था, तकनीक पर आंख मूंदकर भरोसा करना। शहरों ने करोड़ों रुपये ‘इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स,’ ‘ट्रैफिक सेंसर’ और ‘निगरानी नेटवर्क’ पर खर्च किए। इसके बावजूद साफ हवा, प्रभावी जल-निकासी और सुरक्षित पैदल यातायात जैसी बुनियादी समस्याएं जस-की-तस रहीं। एक समीक्षक ने ठीक ही कहा, ‘आपके पास यह बताने वाला ऐप तो हो सकता है कि अगली बस कब आएगी, लेकिन उसका क्या फायदा अगर बस-स्टॉप या वहां तक पहुंचने के लिए फुटपाथ ही नहीं है?’

शहर को फिर से पाने का आह्वान

‘स्मार्ट सिटी मिशन’ अपने मौजूदा स्वरूप में भारतीय शहरी विकास की एक गहरी बीमारी को उजागर करता है—बिना सामाजिक और पारिस्थितिक जटिलताओं को समझे आधुनिक दिखने की चाह। साझा संसाधन—वे अव्यवस्थित, जीवंत और साझा स्थान—जो बाजारीकरण का विरोध करते हैं, ‘स्मार्ट सिटी’ की कल्पना के लिए हमेशा असुविधाजनक रहे। उनका आसानी से व्यवसायीकरण या मानकीकरण नहीं किया जा सकता था, इसलिए उन्हें मिटा दिया गया, घेर दिया गया या इस हद तक पुनर्परिभाषित कर दिया गया कि उनका मूल स्वरूप ही खो गया। फिर भी, भविष्य मिटाने की इस प्रक्रिया का विस्तार नहीं होना चाहिए। जब शहर जलवायु परिवर्तन,  सामाजिक असमानता और सार्वजनिक विश्वास के संकट से जूझ रहे हैं, तो यह एहसास बढ़ रहा है कि स्मार्टनेस को नए सिरे से परिभाषित किया जाना चाहिए — सेंसर की संख्या या स्मार्ट सड़कों के वर्ग मीटर से नहीं, बल्कि इस बात से कि कोई शहर कितना समावेशी, सुगम, सांस लेने लायक और लोकतांत्रिक है। तब शहरी भारत स्मार्ट नहीं, बल्कि बुद्धिमान भी बन सकेगा। (सप्रेस)

टिकेन्दर सिंह पंवार एक शहरी नीति विशेषज्ञ और शिमला के पूर्व उपमहापौर हैं, जो समावेशी और सतत शहर शासन पर अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं।

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