बालिकाएं : आशा, आत्मबल और आत्मनिर्भरता

राष्‍ट्रीय बालिका दिवस : 24 जनवरी पर विशेष

संध्‍या राजपुरोहित

प्रतिवर्ष 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाते हैं। इस दिन को मनाने की शुरुआत साल 2008 से हुई। पहली बार महिला बाल विकास मंत्रालय ने 24 जनवरी 2008 में राष्ट्रीय बालिका दिवस National Girl Child Day मनाया था। राष्ट्रीय बालिका दिवस का उद्देश्य भी यही है कि समाज में बेटियों के अधिकारों और उनकी क्षमताओं को पहचानने का अवसर प्रदान किया जाए।

संध्‍या राजपुरोहित

कहा जाता है कि बेटा भाग्य से होता है और बेटियाँ सौभाग्य से। अर्थात जब सौ सौभाग्य मिलते हैं, तब कहीं जाकर एक बेटी जन्म लेती है। किन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस सच को समाज में समझने वाले लोग विरले ही हैं। आज हम विकासशील से विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने का दावा तो करते हैं, परंतु बेटियों के अधिकारों और अस्तित्व को बराबरी और समानता के नाम पर उपेक्षा कर रहे हैं। हम समाज में गांधारी की भाँति आँख मूंदकर उस अंधी दौड़ में शामिल हो रहे हैं, जहाँ बेटियों के अधिकारों और हक की बात करने वाला कोई नहीं दिखाई देता।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत में 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या में 15% की वृद्धि दर्ज की गई। इनमें घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और बालिका शिक्षा में बाधाएं प्रमुख रूप से सामने आई हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के बावजूद, कई ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं की स्कूल ड्रॉपआउट दर अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। बाल विवाह की घटनाएँ भी इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं, जहाँ बालिकाओं को उनके सपनों से वंचित कर दिया जाता है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 18 वर्ष से कम उम्र की 23% लड़कियों की शादी कर दी जाती है। 2021 में भारत में 75 लाख से अधिक लड़कियाँ कुपोषण से प्रभावित थीं, और 50% से अधिक लड़कियाँ एनीमिया की शिकार थीं। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में माध्यमिक शिक्षा स्तर पर लड़कियों की ड्रॉपआउट दर 16.6% रही, जो कि चिंता का विषय है।

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संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में विश्वभर में 13 करोड़ से अधिक बालिकाएँ शिक्षा से वंचित रह गईं। इनमें से अधिकांश विकासशील देशों से थीं, जहाँ सामाजिक बंधन और संसाधनों की कमी उनके शिक्षा के अधिकार को बाधित करती है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की 2023 जेंडर गैप रिपोर्ट के अनुसार, लिंग समानता के मामले में भारत 146 देशों में से 127वें स्थान पर है। औसतन, भारतीय महिलाएं समान व्यवसाय और योग्यता स्तर के लिए अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में 64 फीसदी ही कमाती हैं। भारत में 1.15 करोड़ बच्चों का विवाह होता है और उनमें से 89 लाख लड़कियां हैं। सभी तस्करी पीड़ितों में से 51 फीसदी बच्चे हैं और उनमें से 80 फीसदी से अधिक लड़कियां हैं। उपेक्षा के कारण प्रतिदिन 1,000 लड़कियां पांच वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले ही मर जाती हैं।

बेटियों के सशक्तिकरण हेतु अनेक सरकारी योजनाएँ हैं, जैसे कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’, ‘कन्या सुमंगला योजना’, ‘मुख्यमंत्री लाड़ली लक्ष्मी योजना’ और ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’। किंतु यह विचारणीय प्रश्न है कि ये योजनाएँ कितनी प्रभावी और व्यावहारिक सिद्ध होती हैं। समाज में आज भी ऐसे असंख्य परिवार हैं, जहाँ बेटा-बेटी के मध्य भेदभाव किया जाता है—चाहे वह खान-पान हो, रहन-सहन हो, पारिवारिक निर्णयों में भागीदारी हो, शिक्षा का अधिकार हो, अथवा जीवन जीने की स्वतंत्रता। बेटी को समझौतों की वेदी पर चढ़ना पड़ता है, और समाज उसे ‘समझदार’ होने का मिथ्या खिताब देकर संतोष कर लेता है।

विडंबना यह है कि एक स्त्री, जो पूरे वर्ष के तीज-त्योहारों की परंपराओं को निभाने में दक्ष होती है, उसे यह तक ज्ञात नहीं होता कि संविधान ने उसे कितने अधिकार प्रदान किए हैं। जिन अधिकारों की चर्चा समाज में बारंबार होती है, वे ही बेटियों की पहुँच से दूर रहते हैं।

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पुरुष प्रधान समाज को पिता का दर्जा देने वाली बेटियों से पिता कहलाने का हक़ भी कई बार छीन लिया जाता है, जब चूम लिया जाना चाहिए उसका माथा, जब सहलाया जाना चाहिए उसका सिर, जब समेट लिया जाना चाहिए उसे बाँहों में, जब जताया जाना चाहिए उस पर बेशुमार प्यार।

वर्ष 2019 में कोटा (राजस्थान) में आत्महत्या करने वाली छात्रा कृति का मामला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि माता-पिता की इच्छाओं के दबाव में उसे विज्ञान पढ़ना पड़ा, जबकि उसकी रुचि साहित्य में थी। इसी प्रकार, बिहार में 2021 में एक और छात्रा ने माता-पिता की अपेक्षाओं के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली। ऐसी घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि बेटियों की रुचियों को महत्व न देना समाज में गहरे मानसिक तनाव को जन्म देता है।

प्रतिवर्ष 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस National Girl Child Day मनाते हैं। इस दिन को मनाने की शुरुआत साल 2008 से हुई। पहली बार महिला बाल विकास मंत्रालय ने 24 जनवरी 2008 में राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया था। राष्ट्रीय बालिका दिवस का उद्देश्य भी यही है कि समाज में बेटियों के अधिकारों और उनकी क्षमताओं को पहचानने का अवसर प्रदान किया जाए। देश की बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करके उन्हें समाज में विकास के लिए समान अवसर और सम्मान दिलाने के लिए यह दिन मनाते हैं। इसके अलावा बालिकाओं के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में सभी लोगों को जागरूक करना भी उद्देश्य है।

इस दिवस के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि बेटियाँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं, बस उन्हें समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में बेटियों को सशक्त करना आवश्यक है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि समाज में व्याप्त रूढ़ियों को तोड़कर, बेटियों को उनके सपनों की उड़ान भरने का अधिकार देना होगा।

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बेटियों को उनके संवैधानिक अधिकारों और विधिक उपायों की पूर्ण जानकारी दी जानी चाहिए, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर बेटियों के साथ समता और न्याय का व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्हें उनकी रुचि एवं योग्यता के अनुसार अपने कैरियर का चुनाव करने की पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए माता-पिता, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को मिलकर कार्य करना होगा। बेटियों को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि आत्मरक्षा, नेतृत्व और तकनीकी कौशल में भी पारंगत बनाना होगा। बालिकाओं को सशक्त बनाने के लिए उन्हें स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बेटियों के प्रति अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाएँ और उन्हें समान अवसर प्रदान करें। पारिवारिक निर्णयों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करें। समाज में यदि हम बदलाव चाहते हैं तो इसकी पहल हमें अपने घर से करनी होगी। नारे लगाने और कानून बनाने से बदलाव नहीं होगा। यह बदलाव तभी संभव है जब बेटियों को समान अवसर, गरिमा और सम्मान मिले। बेटियाँ केवल परिवार की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की नींव हैं, जिनके सशक्तिकरण से ही एक समतामूलक और समृद्ध भविष्य का निर्माण संभव है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस बालिकाओं के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव को दूर करने का एक अच्छा अवसर साबित हो सकता है । सरकार और समाज दोनों को अपने स्तर पर प्रयास करना चाहिए, जिससे बालिकाओं को अपनी ऊर्जा अपने अधिकारों के लिए लड़ने के बजाय अपने व्यक्तित्व के विकास में खर्च करने के लिए मिले। हम सभी की सहभागिता से ही यह संभव है,इसलिए बालिकाओं के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव को कम करके सही मायने में सभ्य समाज का निर्माण संभव हो सकेगा।

संध्‍या राजपुरोहित 20 वर्षो से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। अखबारों व पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर लिखती रहती है।

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