संकटों से जूझती, उम्मीदों को गढ़ती, दुनिया को नया आकार देती बालिकाएं

संध्‍या राजपुरोहित

11 अक्टूबर, अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हर उस लड़की के साहस और संकल्प का प्रतीक है जो अपनी पहचान स्वयं गढ़ रही है। वर्ष 2025 की थीम — “मैं जो लड़की हूं, मैं जो बदलाव लाती हूं: संकट के अग्रिम मोर्चे पर लड़कियां” — इस सच्चाई को रेखांकित करती है कि अब बालिकाएँ बदलाव की प्रतीक बन चुकी हैं।

11 October International Day of the Girl Child

संध्‍या राजपुरोहित

11 अक्टूबर, अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस, केवल कैलेंडर पर दर्ज एक तिथि नहीं है, यह वह दिन है जब पूरी दुनिया उन बालिकाओं को सलाम करती है जो तमाम बाधाओं के बावजूद अपने अस्तित्व और अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह दिन हर उस लड़की के नाम है, जो अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करना चाहती है, जो किसी के कहने पर नहीं बल्कि अपने विवेक पर आगे बढ़ना जानती है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कथन है कि “हर लड़की, हर जगह, समानता, अवसर और सम्मान की हकदार है।” इस वर्ष का अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस इसी भावना को आगे बढ़ाता है। वर्ष 2025 की थीम है — “मैं जो लड़की हूं, मैं जो बदलाव लाती हूं: संकट के अग्रिम मोर्चे पर लड़कियां।” यह थीम केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि उस जीवंत हक़ीक़त का प्रतीक है, जिसमें दुनिया की लाखों लड़कियाँ अपने साहस और संकल्प से नए इतिहास लिख रही हैं। वे किसी बेहतर कल की प्रतीक्षा नहीं कर रहीं, बल्कि उसे स्वयं गढ़ रही हैं।

बीते तीन दशकों में, जबसे बीजिंग घोषणा-पत्र ने महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की बात की थी, बहुत कुछ बदला है, लेकिन बहुत कुछ अभी बाकी भी है। बीजिंग की वह पुकार आज भी गूंजती है कि समाज केवल समानता की बातें न करे, बल्कि उसे जीना सीखे। आज भी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि 133 मिलियन लड़कियाँ स्कूल से बाहर हैं। चार में से एक किशोरी ने अपने साथी द्वारा हिंसा का अनुभव किया है, और तीन में से एक किशोर यह मानता है कि कुछ परिस्थितियों में पत्नी को मारना उचित है। ये आंकड़े केवल भौगोलिक या आर्थिक अंतर नहीं दिखाते, बल्कि उस मानसिकता को उजागर करते हैं जो अब भी बराबरी के विचार से दूर है।

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भारत भी इस वैश्विक परिदृश्य का हिस्सा है। यहां ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं ने समाज में नया संवाद आरंभ किया, लेकिन नीतियाँ तभी प्रभावी होती हैं जब उनके साथ सोच में भी बदलाव आए। भारत के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में आज भी बाल विवाह, शिक्षा में असमानता और बाल श्रम जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, 15 से 19 वर्ष की 23 प्रतिशत किशोरियाँ न तो शिक्षा में हैं, न प्रशिक्षण में, न ही किसी रोजगार में। कई राज्यों में अब भी 20 प्रतिशत से अधिक बालिकाएँ वयस्क होने से पहले विवाह के बंधन में बंध जाती हैं। यह स्थिति हमें यह सोचने पर विवश करती है कि सामाजिक बराबरी केवल कानून या योजना से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के परिवर्तन से आती है।

इसके बावजूद, भारत की धरती ने हमेशा उम्मीद की नई कहानियाँ गढ़ी हैं। बिहार की सृष्टि गोयल जैसी छात्राएँ पर्यावरण संरक्षण की अग्रदूत बनी हैं। राजस्थान की किशोरियों ने बाल विवाह को रोकने के लिए अपने परिवारों तक से टकराने का साहस दिखाया। झारखंड की लड़कियाँ फुटबॉल के मैदानों में देश का नाम रोशन कर रही हैं। ये कहानियाँ इस बात का सबूत हैं कि बदलाव की नदियाँ अब रुकने वाली नहीं हैं, चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो।

यूनेस्को के अनुसार, यदि सभी लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा मिल जाए, तो बाल विवाह की दर आधी रह जाएगी और मातृ मृत्यु दर में 70 प्रतिशत तक कमी आएगी। भारत में शिक्षा की पहुँच तो बढ़ी है, पर अब भी गुणवत्ता और निरंतरता की चुनौतियाँ हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियाँ इसलिए स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि वहाँ शौचालय नहीं हैं या रास्ते असुरक्षित हैं। कहीं उन्हें घर के कामों या भाइयों की पढ़ाई के लिए अपनी शिक्षा छोड़नी पड़ती है। लेकिन यह संतोष की बात है कि अब भारत की नई पीढ़ी की लड़कियाँ चुप नहीं हैं। वे आत्मविश्वास के साथ हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं — विज्ञान, खेल, कला, तकनीक या राजनीति — हर जगह उनका योगदान दिखाई दे रहा है।

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यही वह दिशा है, जिसकी पुष्टि यूनिसेफ की ‘किशोरी बालिका कार्यक्रम रणनीति 2022–2025’ भी करती है। यह रणनीति बताती है कि यदि हमें सतत विकास के लक्ष्यों को साकार करना है, तो हमें किशोरियों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन की अग्रदूत मानना होगा। यूनिसेफ के अनुसार, हर किशोरी को स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, जीवन-कौशल, और हिंसा व भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार है और यह तभी संभव है जब उनके साथ जुड़कर, उनके अनुभवों और आकांक्षाओं को समझते हुए कार्यक्रम बनाए जाएँ।

यह रणनीति दुनिया भर में किशोरियों के नेतृत्व, आत्मनिर्भरता और भागीदारी को केंद्र में रखने का आह्वान करती है। यूनिसेफ का यह दृष्टिकोण भारत जैसे देशों के लिए भी दिशा देता है, जहाँ युवा जनसंख्या बड़ी है और परिवर्तन की ऊर्जा इन्हीं किशोरियों में सबसे अधिक निहित है। यदि हम इन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण दें, तो ये लड़कियाँ केवल अपना भविष्य नहीं, बल्कि समाज और देश का भविष्य भी गढ़ेंगी।

आज ज़रूरत है कि हम लड़कियों को केवल “सशक्त करने” की बात न करें, बल्कि उन्हें निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा बनाएं। उन्हें मंच दें, विश्वास दें, ताकि वे अपने समुदायों के निर्णयों में अपनी आवाज़ रख सकें। नीतियाँ केवल सुरक्षा या शिक्षा तक सीमित न रहें, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, कौशल विकास और नेतृत्व के अवसरों को भी प्राथमिकता दें। सक्षम जैसे महत्‍वपूर्ण कार्यक्रमों के जरिये किशोरी बालिकाओं को विभिन्‍न प्रकार के कौशलों को विकसित करने की पहल हो रही है। वहीं स्कूलों में ‘गर्ल लीडर क्लब’ या पंचायत स्तर पर ‘बालिका मंच’ जैसे प्रयोग लड़कियों को संवाद और दिशा देने के अवसर बन सकते हैं।

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जब हम एक लड़की की शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान में निवेश करते हैं, तो हम केवल उसका नहीं, पूरे समाज का भविष्य बदलते हैं। एक लड़की की सफलता उसके परिवार, समाज और देश की प्रगति का संकेत है। इसलिए, इस अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर यह याद रखना चाहिए कि लड़कियाँ बदलाव का इंतज़ार नहीं करतीं — वे खुद बदलाव हैं। उनकी हर मुस्कान, हर कोशिश और हर कदम, इस धरती को एक नई रोशनी से भर देता है।

संध्‍या राजपुरोहित 20 वर्षो से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्‍चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा के कार्य से सम्‍बद्ध है।

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