गांधीजी की दृष्टि और पश्चिम एशिया का संकट

अरुण कुमार डनायक

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब अमीर ‘मित्र-राष्ट्र’ दुनिया का हिस्सा-बांटा कर रहे थे, भारत में महात्मा गांधी शांतिपूर्ण, अहिंसक और दोस्ताना दुनिया के भविष्य की जुगत बिठा रहे थे। क्या 80-85 साल पहले दुनिया के सत्ताधारियों, खासकर पश्चिम एशिया के ‘मालिकों’ को दी गई गांधी की सलाहों का आज कोई मतलब है? यदि गांधी को आंशिक रूप से भी मान लिया जाता तो क्या पश्चिम एशिया अपने जीने-मरने का मौजूदा संकट भुगत रहा होता?

फिलिस्तीन का मुद्दा धर्म, भूमि और पहचान से जुड़ा सौ साल पुराना मुद्दा है। इज़राइल-ईरान तनाव के साथ यह वैश्विक चिंता का विषय बन गया है, जिसके अमेरिका, रूस और चीन जैसी शक्तियों की भागीदारी से महायुद्ध में बदलने की आशंका है। यह संकट वैश्विक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को चुनौती देता है। इसका समाधान युद्ध नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और गांधीवादी अहिंसा में निहित है।

दक्षिण अफ़्रीका में रहते हुए गांधीजी के हर्मन कैलनबैक, हेनरी पोलक और जोसेफ रॉयड्स जैसे अनेक यहूदियों से मैत्रीपूर्ण संबंध बने थे। गांधीजी ने ‘हरिजन’ में 26 नवंबर 1938 को यहूदियों की समस्या पर लिखते हुए स्पष्ट किया था कि वे यहूदियों के साथ हो रहे अन्याय को गहराई से समझते हैं। उन्होंने कहा था, “यहूदियों को अपने अधिकार के लिए हिटलर के खिलाफ संघर्ष अवश्य करना चाहिए, लेकिन अहिंसा के रास्ते पर चलकर।”

गांधीजी चाहते थे कि यहूदियों के साथ उसी भूमि पर न्यायसंगत व्यवहार हो, जहाँ वे जन्मे, पले और विकसित हुए हैं। गांधीजी मानते थे कि यहूदियों का फिलिस्तीन पर दावा नैतिक रूप से उचित नहीं, क्योंकि वह भूमि अरबों की है। यहूदियों की वापसी ऐतिहासिक गलतियों के आधार पर न्यायसंगत नहीं कही जा सकती। उन्होंने यह भी जोड़ा कि बाइबल या धर्मशास्त्रों के आधार पर किसी भूमि पर दावा करना आधुनिक राजनीति में उचित नहीं है।

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यह वक्तव्य गांधीजी की उस मूल सोच को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें वे धर्म या इतिहास के आधार पर भूमि के स्वामित्व को अस्वीकार करते हैं। उन्होंने अरबों के अधिकार को प्राथमिकता दी और यहूदियों से आग्रह किया कि वे अरबों के साथ अहिंसा और सहयोग के आधार पर सह-अस्तित्व का मार्ग अपनाएं।

गांधीजी ने इज़राइल के गठन से पहले फिलिस्तीन में चल रहे यहूदी आतंकवाद की निंदा की थी, इसे नैतिक पतन बताया। उन्होंने कहा था कि हिंसा से प्रतिशोध न्याय नहीं होता और आतंकवाद किसी धर्म या उद्देश्य को पवित्र नहीं करता। वे मानते थे कि यहूदियों को केवल उसी पर संतोष करना चाहिए जिसे वे अपने ईश्वर यहोवा से विरासत में प्राप्त मानते हैं। उन्हें अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए न तो ब्रिटिश सत्ता पर निर्भर रहना चाहिए, न ही अमेरिकी समर्थन की आस रखनी चाहिए।

गांधीजी के अनुसार, न्याय का मार्ग आत्मनिर्भरता, नैतिक बल और आपसी सौहार्द के आधार पर ही टिकाऊ हो सकता है। गांधीजी ने अरबों को यह संदेश दिया था कि वे धैर्य, संयम और अहिंसा का मार्ग न छोड़ें। उन्होंने अरबों से आग्रह किया था कि यहूदियों से उनका विरोध अस्मिता के आधार पर हो, घृणा के आधार पर नहीं। यह एक संतुलित दृष्टिकोण था, जिसमें संघर्ष का समाधान नैतिक आधार पर खोजा गया।

गांधीजी ने ईरान को भारत का आत्मीय व सांस्कृतिक मित्र माना था और दोनों देशों के संबंधों को सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आधार पर परिभाषित किया था। ‘जेंद-अवेस्ता’ (पारसी धर्म का प्रमुख ग्रंथ है जिसमें पारसी धर्म के संस्थापक पैगंबर जरथुस्त्र की शिक्षाओं और सिद्धांतों का संग्रह है) जैसे ग्रंथों में निहित समन्वय को वे सम्मान का प्रतीक मानते थे। जनवरी 1948 की एक प्रार्थना सभा में व्यक्त ये विचार प्रेम और भाईचारे को सच्चे धार्मिक मूल्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। गांधीजी का दृष्टिकोण भारत-ईरान संबंधों को शांति और सहयोग के आधार पर मजबूत करने की प्रेरणा देता है। वे पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों को महत्वपूर्ण मानते थे और इसे एशियाई एकता के प्रतीक के रूप में देखते थे।

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वर्ष 2024 में इज़राइल के लेबनान और गाजा में हवाई हमले और ईरान के प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह) के जवाबी हमलों ने तनाव बढ़ाया है। साइबर युद्ध और सामरिक धमकियाँ क्षेत्र को अस्थिर कर रही हैं। इज़राइल का यहूदी राष्ट्रवाद, सुरक्षा के नाम पर सैन्य कार्रवाइयाँ और ईरान की धार्मिक कट्टरता व प्रॉक्सी युद्ध गांधीजी की संवाद, सह-अस्तित्व और सत्याग्रह की नैतिक दृष्टि के विपरीत हैं। इस संघर्ष में मानवीयता को सबसे अधिक क्षति पहुँच रही है।

गांधीजी की सोच के आलोक में इज़राइल-फिलिस्तीन और इज़राइल-ईरान संघर्ष का दीर्घकालिक समाधान इन सिद्धांतों में निहित है—साझा सह-अस्तित्व की भावना, जहां यहूदी, अरब और फारसी समुदाय साझा इतिहास व संस्कृति को अपनाएं; युद्धोन्माद के बजाय अहिंसक संवाद और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता को प्राथमिकता दी जाए; तथा धर्म और राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर मानवीय सहिष्णुता और करुणा को पुनर्स्थापित किया जाए। 

भारत, जो बुद्ध और गांधी की धरती है और आज एक उदीयमान  वैश्विक शक्ति है, उसकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह इज़राइल-फिलिस्तीन और इज़राइल-ईरान जैसे संघर्षों में शांतिपूर्ण समाधान का मार्ग प्रशस्त करे। इन जटिल मुद्दों को केवल सामरिक या धार्मिक चश्मे से देखना एक सीमित दृष्टिकोण है। भारत को चाहिए कि वह मध्यपूर्व के देशों के बीच संवाद, न्याय और अहिंसा का सेतु बने।

विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या और लोकतंत्र के रूप में ख्यात भारत की जिम्मेदारी बनती है कि वह  ‘संयुक्त राष्ट्र संघ,’ ‘ब्रिक्स,’ ‘जी-7’ व ‘जी-20,’ ‘शंघाई सहयोग संगठन’ जैसे मंचों पर हथियारों की होड़ और सैन्य आक्रामकता का स्पष्ट विरोध करे। हाल के वर्षों में भारत की कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मतदान से अनुपस्थिति उसकी नैतिक और लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं कही जा सकती।

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भारत को तटस्थता से ऊपर उठकर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, संवाद और न्याय के पक्ष में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। भारत को चाहिए कि वह केवल रणनीतिक संतुलन बनाए रखने तक सीमित न रहे, बल्कि संवाद, न्याय और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पक्ष में स्पष्ट व सक्रिय भूमिका निभाए—ताकि वह केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिक नेतृत्व का प्रतीक बन सके। भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध गांधीजी के विचारों से प्रेरित रहे हैं। ऐसे में भारत का कर्तव्य है कि वह ईरान को अलग-थलग करने के प्रयासों में भागीदार बनने के बजाय उसे संवाद और सहयोग की प्रक्रिया में सहभागी बनाए।

महात्मा गांधी हमें एक व्यापक नैतिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जिसमें सत्य, अहिंसा, समता और सह-अस्तित्व जैसे मूल्यों के आधार पर समाधान की तलाश की जाती है। आज का विश्व यदि गांधीजी के उस नैतिक चश्मे से इन समस्याओं को देख सके, तो न केवल फिलिस्तीन बल्कि पूरा पश्चिम एशिया एक बार फिर शांति, सहयोग और मानवता की राह पर लौट सकता है। (सप्रेस)

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