बैल से खेती : राजस्थान की पहल का स्वागत है

कुलभूषण उपमन्यु

कई बार सरकारें भी जनहित में कारगर फैसले ले लेती हैं। हाल में बैलों की खेती को प्रोत्साहन देने का राजस्थान सरकार का फैसला इसी तरह का है। ध्यान से देखें तो बैलों से की जाने वाली खेती का अर्थशास्त्र कर्जमुक्ति की तरफ एक कदम है। राजस्थान सरकार का यह फैसला, खासकर लघु और सीमान्त किसानों को उम्मीद बंधाता है।

राजस्थान सरकार ने एक अच्छा फैसला लिया है। सरकार बैलों से खेती करने वालों को 30 हजार रुपए वार्षिक सहायता देगी। यह निर्णय कृषि अर्थव्यवस्था की भारतीय समझ रखने वालों को समझ में आएगा। मशीनों से खेती करने वालों को तो अनेक प्रोत्साहन सब्सिडी के रूप में दिए जाते हैं। मशीनों से लेकर मशीनों के ईंधन तक उनको लगातार सहायता दी जाती है। हिमाचल में पॉवर-टिलर को 50% तक सब्सिडी देकर प्रोत्साहित किया जा रहा है। यानि पूरे काल तक, जब तक वह मशीन काम करेगी उसे विदेश मुद्रा के द्वारा लाये गए ईंधन को उपलब्ध करवाना होगा।  

वैसे तो पूरे भारत में ही, एक हेक्टेयर से छोटी जोतों के लिए आत्मनिर्भर होने का मार्ग बैलों से खेती के माध्यम से ही निकल सकता है, किन्तु पहाड़ी क्षेत्रों में तो यह और भी ज्यादा जरूरी है। यहाँ की 80% जोतें एक हेक्टेयर से छोटी हैं, कुछ तो एक एकड़ से भी छोटी हैं। इनको लाभदायक बनाना खासी चुनौती का काम है। पॉवर-टिलर से जुताई का एक बीघा के लिए दो हजार रुपए तक लिया जा रहा है, ऊपर से धुआं और शोर अलग से भेंट स्वरुप मिल रहा है। हर किसान अपना पॉवर-टिलर ले भी नहीं सकता और ले भी ले तो दो दिन के बाद सारा सीजन खाली पड़ा रहेगा।

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दूसरे, पहाड़ी खेती को आम तौर पर ज्यादा गोबर खाद की जरूरत रहती है, क्योंकि भारी बरसात और ढलानदार जमीनों से हर साल खाद बहकर नीचे चली जाती है, जबकि हम जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं जिसके लिए गोबर की खाद और भी ज्यादा जरूरी हो गई है। इसके आभाव में यह पहल भी सफल होना कठिन हो जाएगी।

खेती देश में घाटे का सौदा होती जा रही है इसी के चलते लोग खेती को छोड़कर अन्य व्यवसायों की ओर मुड़ते जा रहे हैं। खेती लाभ-दायक तब तक नहीं हो सकती जब तक खेती को आत्मनिर्भर बनाने की ओर काम नहीं किया जाता। खेती के लिए हमें अपने संसाधनों से ही काम चलाना सीखना होगा, ताकि कृषि व्यवसाय का पैसा कृषि व्यवसाय में ही लगाया जाता रहे।  

मिसाल के लिए बैल से खेती करेंगे तो बैल किसान ही पैदा करेगा। किसान जब बैल खरीदेगा तो पैसा दूसरे किसान के पास ही जाएगा। एक किसान का व्यय, दूसरे किसान की आमदनी बनेगा। इस तरह पैसा आपस में ही घूमता रहेगा। इससे आत्मनिर्भरता बनती जाएगी। आज मैं बैल खरीद रहा हूँ, कल मैं बेच रहा हूँगा। जैविक खेती के लिए घर का खाद बिना बैंक कर्ज के उपलब्ध होगा।

मशीनी खेती में ज्यादा-से-ज्यादा निवेशित वस्तुएं बाहरी क्षेत्रों – उद्योग आदि से आएंगी, जिससे उद्योग तो बढ़ेगा, किन्तु खेती की कमाई उसी में चुक जाएगी। घाटे की खेती का दुश्चक्र इसी तरह आत्मनिर्भरता की ओर प्रस्थान से तोड़ा जा सकता है। यह ठीक है कि बड़ी जोत वाले किसानों के लिए यह कठिन है, किन्तु छोटी जोत वाले किसान दृढ संकल्प करके एक बार इसे अपना लें तो धीरे-धीरे किसानी आत्मनिर्भर होगी और कर्ज से मुक्ति का रास्ता भी बनेगा जिसके कारण ही ज्यादातर आत्महत्याएँ कृषी क्षेत्र में हो रही हैं।

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अपना बीज, अपना बैल, अपना खाद यही किसान का नारा होना चाहिए। जब तक यह तरीका कृषक अपना रहे थे तब तक कहीं भी किसान को आत्महत्या की जरूरत ही नहीं थी। यही अब अपनाना होगा, किन्तु थोड़े वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ, जिससे फसलों की उपज भी कम न हो। हिमाचल का उदाहरण लें तो यहाँ 9.97 लाख कुल जोतों में से 7.12 लाख जोतें एक हेक्टेयर से कम हैं। उन सभी को बैलों पर सब्सिडी देकर बैल से खेती के लिए प्रोत्साहित करना होगा, जिससे पेट्रोल, डीज़ल पर खर्च विदेशी मुद्रा भी घटेगी और किसान बैंक कर्जों से भी बचेगा।

प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 13.57% है, जबकि खेती से 58.37% रोजगार पैदा हो रहे हैं। इसलिए खेती के योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता। न्याय का भी यही तकाजा है कि बैल से खेती करने वाले को मशीन से खेती करने वाले के बराबर ही मान्यता दी जाए। हालांकि बैल से खेती को यदि थोडा अधिक भी सहयोग दिया जाए तब भी उससे देश पर ज्यादा बोझा नहीं पड़ेगा क्योंकि बैल से खेती करने के कारण पैसा देश में ही रहेगा और किसान के हाथ में ही किसान द्वारा खर्च किया गया रुपया पंहुचेगा। यह काम खेती और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के ही हित में है।

सरकारों को राजस्थान सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए किसान हित में स्वावलंबी कृषि व्यवस्था खडी करने की दिशा में आगे बढने के लिए पूरी वैज्ञानिक समझ के साथ कार्य शुरू करना चाहिए। इस दिशा में सफलता के लिए बैल-चलित मशीनों का अपना महत्व है। पहाड़ी और मैदानी इलाकों की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार कृषि उपकरणों के निर्माण का कार्य भी साथ-साथ शुरू करना होगा।

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कृषि विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग विभाग इस दिशा में कार्य करें और यह साबित करें कि उनके लिए बैल से खेती करने वाला किसान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि मशीन  से खेती करने वाला। इससे किसान भी खुशहाल होगा और देश पर विदेशी मुद्रा के लिए ऋण का बोझ भी कम होगा। यही छोटे किसान की समृद्धि का मार्ग है। (सप्रेस)

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