दीपावली : रोशनी का नहीं, रिश्तों और जिम्मेदारी का पर्व

ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह 'रवि'

दीपावली केवल रोशनी और उत्सव का नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, पारिवारिक बंधन और मानवीय संवेदनाओं का पर्व है। यह त्योहार न केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है, बल्कि समाज में सद्भाव, समानता और सहयोग की भावना को भी गहराता है। आज इसकी सामाजिकता में पर्यावरण और जिम्मेदारी का नया आयाम जुड़ गया है।

ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ‘रवि’

दीपावली भारत का सबसे प्रमुख और चमकदार त्योहार है। यह अंधकार पर प्रकाश की विजय, बुराई पर अच्छाई की जीत और नकारात्मकता पर सकारात्मकता का प्रतीक है। रामायण की कथा से जुड़ा यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है । इसका महत्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भी अत्यधिक है। यह त्योहार लोगों को जोड़ता है, समुदायों को मजबूत बनाता है और समाज में सद्भाव, समानता और उत्साह का संचार करता है।

दीपावली शब्द संस्कृत के ‘दीप’ और ‘अवली’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है दीपों की पंक्ति। यह पर्व भारत में ही नहीं नेपाल, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले भारतीय समुदायों द्वारा मनाया जाता है। सामाजिक दृष्टि से देखें तो दीपावली एक ऐसा अवसर है जो लोगों को उनके दैनिक जीवन की भागदौड़ से निकालकर एकजुट करता है। यह त्योहार सामाजिक बंधनों को मजबूत करने का माध्यम बनता है जहां परिवार, पड़ोसी और मित्र एक साथ आते हैं। प्राचीन काल से ही दीपावली सामाजिक सद्भाव का प्रतीक रही है।

सामाजिक एकता और विविधता का पर्व

आधुनिक संदर्भ में दीपावली की सामाजिकता और भी विस्तृत हो गई है। इस सनातन पर्व को सिख, जैन और बौद्ध समुदाय भी अपने-अपने तरीके से मनाते हैं। सिखों के लिए यह बंदी छोड़ दिवस है जहां गुरु हरगोबिंद सिंह की रिहाई का उत्सव मनाया जाता है। जैनों के लिए महावीर स्वामी के निर्वाण का दिन है। इस विविधता से पता चलता है कि दीपावली सामाजिक एकता का पुल बनती है जो विभिन्न पंथों और संस्कृतियों को जोड़ती है। समाजशास्त्रियों के अनुसार ऐसे त्योहार सामाजिक पूंजी (सोशल कैपिटल) को बढ़ाते हैं, जहां लोग आपसी संबंधों को मजबूत करते हैं और सामाजिक नेटवर्क विकसित करते हैं।

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दीपावली की सामाजिकता का सबसे प्रमुख पहलू परिवारिक बंधन है। इस त्योहार से पहले घरों की सफाई की जाती है जो न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक सफाई का प्रतीक है। परिवार के सदस्य एक साथ घर सजाते हैं, रंगोली बनाते हैं और दीये जलाते हैं। यह प्रक्रिया बच्चों को पारंपरिक मूल्यों से जोड़ती है और बुजुर्गों को सम्मान देती है। उदाहरण के लिए लक्ष्मी पूजन के दौरान पूरे परिवार का एक साथ बैठना पारिवारिक एकता का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है।

आज के दौर में जब लोग नौकरी या शिक्षा के कारण दूर-दूर रहते हैं दीपावली घर लौटने का बहाना बनती है। यह ‘होम कमिंग’ का अवसर प्रदान करती है जहां रिश्तेदार मिलते हैं, उपहारों का आदान-प्रदान होता है और पुरानी यादें ताजा की जाती हैं। सामाजिक मनोविज्ञान में इसे ‘फैमिली बॉन्डिंग’ कहा जाता है, जो तनाव कम करता है और खुशी बढ़ाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह और भी गहन है जहां पूरे गांव के परिवार एक साथ मेला लगाते हैं या सामूहिक पूजा करते हैं। शहरीकरण के बावजूद, दीपावली परिवारों को सामाजिक रूप से मजबूत बनाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 80% से अधिक लोग दीपावली पर परिवार के साथ समय बिताना पसंद करते हैं जो इसकी सामाजिक प्रासंगिकता को दर्शाता है।

दीपावली महिलाओं की सामाजिक भूमिका को भी उजागर करती है। घर की सजावट, मिठाइयों की तैयारी और पूजा की व्यवस्था में महिलाएं मुख्य भूमिका निभाती हैं । हालांकि आधुनिक समय में पुरुष भी इन प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं जो लिंग समानता की दिशा में एक सकारात्मक बदलाव है।

सामुदायिक मेलजोल और सामाजिक सद्भाव

दीपावली केवल परिवार तक सीमित नहीं है यह समुदाय की सामाजिकता को भी बढ़ावा देती है। पड़ोसियों के साथ मिठाइयां बांटना, एक-दूसरे के घर जाना और शुभकामनाएं देना सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। कई शहरों में सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। जैसे दीपावली मेला जहां लोग नृत्य, संगीत और खेलों में भाग लेते हैं। यह अवसर विभिन्न वर्गों, जातियों और धर्मों के लोगों को एक मंच पर लाता है जो सामाजिक एकीकरण को प्रोत्साहित करता है।

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उदाहरणस्वरूप कोलकाता में काली पूजा के साथ दीपावली मनाई जाती है जहां पूरे समुदाय के लोग पंडालों में इकट्ठा होते हैं। दिल्ली या मुंबई जैसे महानगरों में अपार्टमेंट सोसाइटियां सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं, जो पड़ोसियों के बीच संबंध मजबूत करते हैं। ग्रामीण भारत में दीपावली पर गांव के मंदिरों में सामूहिक भोज आयोजित होते हैं जहां गरीब-अमीर सब एक साथ भोजन करते हैं। यह सामाजिक समानता का संदेश देता है।

दीपावली की सामाजिकता में दान का भी महत्वपूर्ण स्थान है। लक्ष्मी पूजन के दौरान दान-पुण्य किया जाता है जो सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देता है। कई लोग गरीबों को कपड़े, मिठाइयां या धन दान करते हैं जो सामाजिक न्याय की भावना जगाती है। एनजीओ और सामाजिक संगठन दीपावली पर विशेष अभियान चलाते हैं। जैसे अनाथालयों में उत्सव मनाना या वृद्धाश्रमों में सहायता पहुंचाना। यह त्योहार सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है, जहां अमीर वर्ग गरीबों की मदद करता है।

ग्रीन दीपावली: पर्यावरणीय चेतना का उदय

आधुनिक समय में दीपावली की सामाजिकता में पर्यावरणीय जागरूकता एक नया आयाम जुड़ गया है। पारंपरिक रूप से पटाखों की आतिशबाजी दीपावली का हिस्सा रही है, लेकिन इससे होने वाला प्रदूषण सामाजिक समस्या बन गया है। वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और कचरा बढ़ने से स्वास्थ्य पर असर पड़ता है विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों पर। इसलिए कई समुदाय अब ‘ग्रीन दीपावली’ मनाने पर जोर दे रहे हैं जहां पटाखों की बजाय दीये, फूलों की सजावट और इको-फ्रेंडली उत्पादों का उपयोग किया जाता है।

यह बदलाव सामाजिक जागरूकता का परिणाम है। स्कूलों और कॉलेजों में छात्र पर्यावरण संरक्षण पर अभियान चलाते हैं जो युवा पीढ़ी को सामाजिक रूप से जिम्मेदार बनाता है। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया जो सामाजिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है। दीपावली की सामाजिकता अब स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) से जुड़ गई है जहां लोग एक-दूसरे को पर्यावरण अनुकूल उत्सव मनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

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दीपावली की सामाजिकता का एक महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक है। यह त्योहार बाजारों को चमकाता है जहां लोग खरीदारी करते हैं। कपड़े, आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू सामान की बिक्री बढ़ती है जो अर्थव्यवस्था को गति देती है। छोटे व्यापारियों और कारीगरों के लिए यह सुनहरा अवसर है। मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार, रंगोली के रंग बेचने वाले और मिठाई दुकानदार सामाजिक रूप से लाभान्वित होते हैं।

सामाजिक दृष्टि से यह त्योहार रोजगार सृजन करता है।अस्थायी दुकानें लगती हैं, जहां युवा काम करते हैं। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स जैसे अमेजन और फ्लिपकार्ट पर दीपावली सेल से लाखों लोग लाभान्वित होते हैं। लेकिन इसमें सामाजिक असमानता भी दिखती है अमीर लोग अधिक खर्च करते हैं, जबकि गरीब संघर्ष करते हैं। कई सामाजिक पहलें हैं जहां अमीर गरीबों की मदद करते हैं, जैसे ‘दान दीपावली’।

बदलते समय में दीपावली की चुनौतियाँ

आज की दुनिया में दीपावली की सामाजिकता चुनौतियों का सामना कर रही है। शहरीकरण से परिवार छोटे हो गए हैं, और डिजिटल माध्यमों से शुभकामनाएं भेजी जाती हैं, जो व्यक्तिगत मिलन को कम करती हैं। सोशल मीडिया पर दीपावली की तस्वीरें साझा करना सामाजिकता का नया रूप है।

दीपावली समाज को रोशन करती है। यह परिवार, समुदाय और अर्थव्यवस्था को जोड़ती है, सद्भाव बढ़ाती है और जिम्मेदारी सिखाती है। यह त्योहार सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है। आइए हम सब मिलकर एक ऐसी दीपावली मनाएं जो पर्यावरण अनुकूल, समावेशी और खुशहाल हो।

लेखक राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर , चर्चित टिप्पणीकार व सुलतानपुर जनपद के मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं।

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