गांधी की दिशा में काम करने वालों को अपनी भूमिका नए सिरे से समझनी होगी : कुमार प्रशांत
नई दिल्ली, 16 मार्च। केंद्रीय गांधी स्मारक निधि, गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली तथा राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के सभागार में 15 और 16 मार्च को दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकर्ता सम्मेलन का आयेाजन किया गया। सम्मेलन में देश के 20 राज्यों से आए गांधीवादी कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और रचनात्मक कार्यों से जुड़े 80 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सम्मेलन में गांधीजी के विचारों और मूल्यों को वर्तमान समय में अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने, अहिंसक समाज के निर्माण तथा रचनात्मक कार्यक्रमों को मजबूत बनाने पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। देश के विभिन्न प्रदेशों से आए लगभग 45 गांधीवादी कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों, अनुभवों और प्रयोगों को साझा किया। साथ ही वर्तमान समय की चुनौतियों तथा उनके समाधान पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
इस अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने कहा कि हम सब लंबे समय से गांधी की दिशा में काम करते आ रहे हैं और गांधीजी के नाम से बनी संस्थाओं में सक्रिय हैं। देश और समाज में हमारी एक अलग पहचान है, इसलिए हम पर एक विशेष प्रकार की जिम्मेदारी आती है, जिसे गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि गांधी, विनोबा और जयप्रकाश ने जो रास्ता दिखाया है, वही आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है।

सम्मेलन के दौरान विमर्श का दायरा ग्रामीण जीवन से लेकर वैश्विक सवालों तक विस्तृत रहा। विशेष रूप से युद्ध की स्थितियों, जनमानस पर उसके दुष्प्रभाव और उससे होने वाली व्यापक हानि पर चिंता व्यक्त की गई। प्रतिभागियों ने ग्राम स्वराज, शांति, अहिंसा, सामाजिक समरसता, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण और युवाओं की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार साझा किए। इसके साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती तथा गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए चल रहे प्रयासों की समीक्षा भी की गई।
सम्मेलन में केंद्रीय गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय के अध्यक्ष अन्नामलाई, केंंद्रीय गांधी स्मारक निधि के मंत्री संजय सिंह तथा कुमार प्रशांत ने विभिन्न सत्रों को संबोधित किया और संचालन में भी भागीदारी निभाई।
केंद्रीय गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही ने कहा कि हमारा प्रयास होना चाहिए कि लोक ताकत को मजबूत बनाये। मानवीय मूल्यों की प्रेरणा जिन समूहों में हो उनको भी चिन्हित किया जाना चाहिए।
सत्र का संचालन करते हुए सचिव संंजय सिंह ने कहा कि अनेक संंस्थाएं आर्थिक संकट से जूझने के बावजूद जनता के समर्थन से काम कर रही है। कई कार्यकर्ताओं ने अपनी चर्चा में युद्ध के खतरों, बेरोजगारी, लोकतंत्र के सामने खतरे, संविधान पर मंडराते खतरों के की ओर से इशारा किया। उन्होंने कहा कि देश के विविध संस्कृति का राजनीतिक सांस्कृतिक सोच थापने का भी प्रयास हो रहा है। ये अलग तरह का खतरा है।
प्रतिभागियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों का मूल्यांकन प्रस्तुत किया तथा भविष्य में गांधीवादी विचारों और रचनात्मक कार्यक्रमों को समाज में और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए नई कार्ययोजनाओं पर विचार किया। इस मंथन के माध्यम से भविष्य की दिशा और कार्ययोजना को अधिक सशक्त बनाने की जरूरत पर सहमति बनी।
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय सम्मेलन ने देशभर के गांधीवादी कार्यकर्ताओं को संवाद, अनुभव-साझा करने और आगे की दिशा तय करने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

सम्मेलन के दौरान महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इस क्रम में प्रोफेसर कुमारस्वामी द्वारा अनूदित श्री डी. एस. नागभूषण की पुस्तक ‘गांधी कथाना’ के हिंदी संस्करण की प्रथम प्रति का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर केंद्रीय गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष रामचंद्र राही, गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, कर्नाटक गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष नादोजा डॉ. डब्ल्यू. पी. कृष्णा, गांधी स्मारक निधि के सचिव श्री एम. सी. नरेंद्र, राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के सचिव डॉ. संजय सिंह, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, नई दिल्ली के निदेशक डॉ. अन्नामलाई तथा गांधी भवन के सलाहकार प्रो. जी. बी. शिवराजू उपस्थित रहे।
कार्यकर्ता सम्मेलन के समापन सत्र में कुमार प्रशांतजी ने सभी मुद्दों को समेटते हुए कहा कि देशभर में प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी अनेक साथी अपनी-अपनी जगह सक्रिय हैं और यही सबसे बड़ी आशा की बात है। उन्होंने कहा कि “हममें से कोई बैठा हुआ नहीं है, हर कोई अपनी समझ और क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ कर रहा है, और यही इस समय की सबसे बड़ी पूंजी है।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि गांधीवादी कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी ताकत ‘जनमत’ है। गांधी ने स्वतंत्रता के बाद भी जनमत को सबसे बड़ा हथियार माना था। इसलिए लिखना, बोलना, संवाद करना, पत्र निकालना, संस्थाएं चलाना इन सबका उद्देश्य सही जनमत का निर्माण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी काम की कसौटी यह है कि उससे समाज में सही समझ, आत्मविश्वास और परिवर्तन की शक्ति पैदा हो रही है या नहीं।
उन्होंने साथियों से आह्वान किया कि वे अपनी-अपनी जगह दीपक की तरह जलते रहें, अपने केंद्रों और संस्थाओं को संभालकर रखें, और इस कठिन समय में नैतिक शक्ति, अहिंसक दृष्टि तथा जनपक्षधरता को बनाए रखें। उनके अनुसार यही वह राह है, जो भविष्य में समाज को नई दिशा दे सकती है।
उन्होंने अपनी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि गांधी की धारा में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की पहचान सत्ता, पद या दलगत राजनीति से नहीं, बल्कि समाज-परिवर्तन के प्रति उनकी निष्ठा, अहिंसक संघर्ष और जनमत निर्माण की क्षमता से होती है।
उन्होंने गांधी, जयप्रकाश नारायण और विनोबा भावे की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि अहिंसक क्रांति की धारा इतिहास में बहुत विरल रही है। इस धारा के कार्यकर्ता सत्ता केंद्रित राजनीति के लोग नहीं हैं, बल्कि वे समाज के भीतर रहकर नैतिक शक्ति के आधार पर परिवर्तन की कोशिश करते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 1977 के बड़े राजनीतिक परिवर्तन में भी इस धारा ने निर्णायक भूमिका निभाई, लेकिन स्वयं सत्ता में जाने का रास्ता नहीं चुना।
कुमार प्रशांत ने कहा कि गांधीवादी कार्यकर्ता वह है जो बड़े पदों, चुनावी लालसाओं और सत्ता-प्राप्ति की महत्वाकांक्षा से दूर रहकर समाज में जनशक्ति को संगठित करने का काम करता है। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि अहिंसा की कसौटी पर बड़े पदों की चाह उचित नहीं बैठती। यही कारण है कि इस धारा के साधारण कार्यकर्ताओं ने भी सत्ता के बजाय समाज में टिके रहकर काम करने का कठिन रास्ता चुना।
उन्होंने कहा कि गांधी का रास्ता आसान नहीं, बल्कि अत्यंत कठिन विकल्प है। यह ऐसा मार्ग है जिसमें व्यक्ति को स्वयं को पीछे रखकर दूसरों को आगे बढ़ाना होता है। उनके अनुसार गांधी ने नेतृत्व की एक बिल्कुल अलग शैली दी, जिसमें ‘सुप्रीम लीडर’ की अवधारणा नहीं, बल्कि सामूहिकता, आत्मसंयम और दूसरों को उभारने की भावना केंद्र में है। यही भविष्य के नेतृत्व की असली तकनीक है।
समकालीन राजनीति पर टिप्पणी करते हुए कुमार प्रशांत ने कहा कि आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा संकट केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण का है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करना, असहमति की आवाजों को दबाना, राज्य सत्ता को अधिकाधिक केंद्रीकृत करना और समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करना एक गहरी वैचारिक परियोजना का हिस्सा है। उनके अनुसार इसे केवल सामान्य राजनीति मानकर नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने कहा कि पहले भी राजनीतिक दल सत्ता के लिए संघर्ष करते थे, लेकिन आज स्थिति अलग है, क्योंकि अब राजनीति के पीछे एक ऐसा दर्शन काम कर रहा है जो सत्ता को एक ही केंद्र में समेट देना चाहता है। संविधान ने सत्ता के विभाजन और नियंत्रण की जो व्यवस्था बनाई थी, उसे लगातार कमजोर किया जा रहा है। इसी कारण लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और संस्थागत संतुलन के पक्ष में आवाज उठाना आज और भी जरूरी हो गया है।
कुमार प्रशांत ने सांप्रदायिकता के प्रश्न को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि गांधी ने अपने जीवन में साम्राज्यवादी हिंसा, क्रांतिकारी हिंसा और सांप्रदायिक हिंसा—तीनों का सामना किया, लेकिन सांप्रदायिक हिंसा सबसे व्यापक और विनाशकारी साबित हुई। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता, बहुलता और सहअस्तित्व की परंपरा में है, और इसी सामाजिक संरचना को तोड़ने की कोशिशें सबसे खतरनाक हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि असहमति रखने वाले बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों को लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखना न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। किसी भी नागरिक पर आरोप है तो उस पर त्वरित मुकदमा चलना चाहिए, प्रमाण के आधार पर न्याय होना चाहिए; लेकिन बिना सुनवाई के वर्षों तक कैद रखना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
तकनीक और मशीनीकरण के बढ़ते प्रभाव पर भी कुमार प्रशांत ने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मशीन की मर्यादा तय करना जरूरी है। ऐसी तकनीक जो मनुष्य की सहायता करे, वह स्वीकार्य है, लेकिन जो मनुष्य को अप्रासंगिक बना दे, संवाद खत्म कर दे और व्यवस्था को अमानवीय बना दे, उसके प्रति सावधान रहना होगा। उन्होंने मोबाइल और डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती निर्भरता को भी सामाजिक संवेदना के क्षरण से जोड़ा।
भाषा के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की बहुभाषिकता उसकी शक्ति है, और संवाद को सरल, सुगम और पारस्परिक समझ पर आधारित होना चाहिए। राष्ट्रभाषा के सवाल को उन्होंने व्यवहारिक दृष्टि से देखने की बात कही और कहा कि भाषा का असली उद्देश्य एक-दूसरे तक बात पहुंचाना है, न कि जटिलता पैदा करना।

