जाति जनगणना और पसमांदा मुसलमान

अरुण कुमार डनायक

हाल ही में केन्द्र सरकार ने बहु-चर्चित जाति जनगणना की तारीखों की घोषणा कर दी है। विपक्षी दलों की इस प्रमुख मांग पर भारी ना-नुकुर के बाद हामी भरने वाली सत्तारूढ़ भाजपा इसे चुनावी जीत की गारंटी मानती है, लेकिन क्या यह इतना ही सरल है? मसलन-इस जनगणना के पिछड़े, गरीब मुसलमानों पर क्या असर होंगे?

भारत एक बार फिर एक ऐतिहासिक पहल की ओर अग्रसर है। केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़े भी संकलित किए जाएंगे। वर्ष 1931 के बाद यह पहली बार होगा जब जाति आधारित जनगणना की जाएगी। हालांकि 2011 में हुई जनगणना के बाद सामाजिक आर्थिक आधार पर जातियों की गणना हुई थी, पर इसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किये गए थे। 94 वर्षों के बाद यह कदम सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक निर्णायक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है तथा सत्तापक्ष और विपक्ष में इसका श्रेय लेने की होड़ मची हुई है। भाजपा नेताओं के बयानों और मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर, कुछ मुस्लिम समूहों को उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए, केंद्र और राज्य की पिछड़ा वर्ग सूची में जाति जनगणना के तहत गिना जा सकता है। आगामी जनगणना में पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किए जाने की संभावना है।

भारत में मुस्लिम समुदाय की जटिल स्थिति है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या का 14.2% हिस्सा मुसलमानों का है, जो लगभग 18–20 करोड़ के बीच है। भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी निवास करती है, इसके बावजूद यह एक अल्पसंख्यक समुदाय है। मुसलमानों को शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और धार्मिक भेदभाव जैसी कई सामाजिक व आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सांप्रदायिक हिंसा और सामाजिक असमानता की घटनाएं इस समुदाय के भीतर गहराई से महसूस की जाती हैं। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और समानता का अधिकार प्रदान करता है, जिससे मुसलमानों को भी मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।

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इस्लामिक मान्यताओं में जातिगत भेदभाव की मनाही है, फिर भी भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के भीतर भी जाति आधारित संरचना व्याप्त है। भारतीय  मुस्लिम समाज को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है – अशरफ : सैयद, शेख, पठान, मुगल आदि विदेशी मूल के या उच्च हिंदू जातियों से धर्मांतरित हुए उच्चवर्गीय मुसलमान। अजलाफ : ये मध्यवर्ती जातियों से धर्मांतरित हैं और पारंपरिक रूप से ‘स्वच्छ’ व्यवसायों में संलग्न रहे हैं। अरज़ाल : ये सबसे निचली श्रेणी के माने जाते हैं और ‘अछूत’ समझे जाने वाले कार्य करते हैं।

अजलाफ और अरज़ाल मुसलमानों के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पिछड़ेपन को संबोधित करने वाला ‘पसमांदा’ फारसी शब्द है, जिसका अर्थ है “पीछे छूटे हुए।” स्वतंत्रता से पहले ‘पसमांदा’ आंदोलन के प्रमुख नेता अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन असीम बिहारी थे, जो जुलाहा (बुनकर) समुदाय से थे। इन्होंने  1910 के बाद शुरू हुए इस सुधारवादी आंदोलन में ‘मुस्लिम लीग’ की सांप्रदायिक राजनीति और उसके सभी मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व के दावे का विरोध किया। फिर इस शब्द को 1998 में अली अनवर अंसारी द्वारा पहली बार राजनीतिक रूप से प्रयोग में लाया गया जब उन्होंने ‘पसमांदा मुस्लिम महाज़’ की स्थापना की।

‘सच्चर समिति’ (2006) और ‘रंगनाथ मिश्रा आयोग’ (2007) ने भी स्वीकार किया कि मुसलमानों के भीतर जाति आधारित भेदभाव मौजूद है। ‘सच्चर समिति’ की रिपोर्ट के अनुसार, मुसलमानों में लगभग 40%  ओबीसी और एससी/एसटी श्रेणियों से आते हैं, जबकि कई ‘पसमांदा’ कार्यकर्ता इस आंकड़े को 80-85% तक मानते हैं। ‘पसमांदा’ समुदाय का दावा है कि उनकी संख्या अधिक होने के बावजूद राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी नगण्य है। उनकी प्रमुख मांगें हैं:- जातिगत जनगणना में ‘पसमांदा’ मुसलमानों को स्पष्ट रूप से अत्यंत पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में दर्ज करना,कारीगरों व कृषि मजदूरों और शिल्पकारों को सरकारी सहायता प्रदान करना, मुस्लिम समाज के भीतर संसाधनों की असमान वितरण प्रणाली को समाप्त करना।

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मेव’ सहित दलित मुस्लिम समुदायों की ‘अनुसूचित जाति’ (एससी) दर्जे की उनकी मांग ‘अनुसूचित जाति आदेश,1950’ के अनुसार  संविधान सम्मत नहीं है। यह आदेश मूल रूप से केवल हिंदुओं को ‘अनुसूचित जाति’ का दर्जा प्रदान करता था, अन्य धर्मों के दलितों को इससे बाहर रखा गया था। बाद में 1956 और  1990 में संशोधनों के माध्यम से सिखों और बौद्धों को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया।तेलंगाना और बिहार की जातिगत जनगणनाओं में यह स्पष्ट हुआ कि क्रमशः 81% और 73% मुसलमान ‘पसमांदा’ श्रेणी में आते हैं। इस जनगणना से ‘पसमांदा’ मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को मान्यता मिलने की संभावना है, जो नीति निर्धारण और आरक्षण व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने में सहायक होगा।

कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं को यह आशंका है कि ‘पसमांदा’ मुसलमानों को अलग श्रेणी में दर्ज करना समुदाय को विभाजित करने का प्रयास हो सकता है। उनका कहना है कि यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत नहीं हुई तो इससे मुस्लिम समाज के भीतर और विभाजन पैदा हो सकता है। कुछ हिंदू संगठनों का तर्क है कि आज़ादी के समय हैदराबाद, भोपाल, रामपुर जैसी 10-12 रियासतों में मुस्लिम शासक थे, इसलिए मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन का दावा अनुचित है। उनका मानना है कि इन रियासतों में मुस्लिमों की सत्ता और प्रभाव को देखते हुए, उनके सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन का तर्क तथ्यात्मक रूप से कमजोर है।

जाति जनगणना एक अत्यंत आवश्यक कदम है जो 1931 के बाद भारत के विविध सामाजिक ताने-बाने को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा। ‘पसमांदा’ मुसलमानों की गिनती और पहचान यदि सही ढंग से की जाती है, तो यह उनके ऐतिहासिक वंचन को पहचानने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास होगा। यह न केवल मुस्लिम समाज के भीतर समावेशी विकास को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि भारत में सभी कमजोर वर्गों के लिए एक समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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अलबत्ता, मुस्लिम समुदाय की प्रमुख समस्याओं का समाधान जातिगत जनगणना में नहीं, बल्कि गांधी जी के विचारों के अनुसार उनकी शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने, कार्यपालिका और विधायिका में उचित प्रतिनिधत्व देने और सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने में निहित है। इसके अतिरिक्त, रूढ़िवादी परंपराओं, जैसे-बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, बहुपत्नी प्रथा, तलाक, पुरानी उत्तराधिकार प्रणाली, महिलाओं की शिक्षा, रोजगार व संपत्ति में सीमित हिस्सेदारी भी समुदाय की प्रगति में बाधक हैं। इन सामाजिक कुरीतियों को दूर करके और समावेशी शिक्षा व आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देकर ही मुस्लिम समुदाय का सशक्तिकरण संभव है। (सप्रेस)

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