‘आखिरी आदमी’ के लिए बापू का आहार

चैतन्य नागर

आजकल स्वास्थ्य, संतुलित भोजन और वजन-वृद्धि बडा बाजार हैं और उन्हें लेकर तरह-तरह के कौतुक होते रहते हैं। गांधी ने भी अपने और अपने संगी-साथियों के लिए भोजन की एक पद्धति विकसित की थी जिसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था, समाज के अंतिम व्यक्ति तक भोजन की उपलब्धता। कैसी थी, गांधी की आहार प्रणाली? क्या खाने या ना खाने से शरीर को कैसा लाभ या हानि होती है?

समाज सुधारक होने के साथ-साथ गांधी जी आहार-सुधारक भी थे; उनको निःसंकोच भारत का पहला हैल्थ या फिटनेस गुरु माना जा सकता है। सही आहार और जीवन के बीच के संबंध को वे अच्छी तरह समझते थे। सही आहार को वे स्वस्थ देह के अलावा, राजनीति, नैतिकता, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के साथ भी जोड़कर देखते थे।

वर्ष 1929 में अफ्रीकन-अमेरिकन कृषि वैज्ञानिक जॉर्ज वाशिंगटन कार्वर ने स्वतंत्र भारत के स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती के लिए एक ख़ास किस्म के भोजन की सिफारिश की थी, जिसमें गेंहू का आटा, मक्का, फल और सोयाबीन या मूंगफली से बना हुआ दूध शामिल था। उनके अनुसार यह भोजन भावी भारत के स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने वाला था। गांधी जी को उनका सुझाव पसंद आने के दो मुख्य कारण थे: पहला, कि यह देश के आखिरी आदमी की पहुँच के भीतर था और दूसरा, यह कि गांधी जी वर्षों से ‘वीगन’ बनने के बारे में सोच रहे थे।

 उनका मत था कि दूध पीना नैतिकता की दृष्टि से गलत है। गाय, भैंस के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार, उनका दूध उनके ही बच्चों को पर्याप्त मात्र में न मिल पाना, इंसान के लिए उसका उपयोगी नहीं होना वगैरह उनके दूध विरोधी होने के कारण थे। दूध बंद करने पर उन्हें कमजोरी महसूस होती थी इसलिए कार्वर के डायट प्लान में उनको अपनी दुविधा से निकलने का रास्ता दिख रहा था। इसमें दूध था और वह भी किसी पशु का नहीं था। यह प्लान गांधी जी के ‘आहार स्वायत्तता’ के सिद्धांत के अनुकूल था।

दूध छोड़कर गांधी जी एक तरह से ‘वीगन’ होने की यात्रा शुरू कर चुके थे, पर बाद में उन्होंने बकरी का दूध पीने का फैसला किया। बकरी का दूध पीने के लिए वे मजबूरी में ही तैयार हुए थे, पर इसके कई फायदे थे जिनसे वे परिचित थे। यह सुपाच्य होता है, इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, शरीर में लोहे की कमी यानी अनीमिया होने से रोकता है। वर्ष 1931 के ‘गोलमेज सम्मेलन’ में गांधीजी की दो बकरियां भी लंदन गई थीं। उनमें से एक थी निर्मला, जिसकी मौत का ज़िक्र अमेरिकी अख़बारों ने भी किया था!

अपनी जवानी में गांधी जी को एक बार यह महसूस हुआ कि यदि उनको अंग्रेजों को हराना है तो मजबूत बनना पड़ेगा और इसके लिए उनको अंग्रेजों की तरह मांस भी खाना होगा। एक दिन छिपकर उन्होंने गोश्त खा लिया और फिर उन्हें रात को बुरे सपने आये जिसके बारे में वे लिखते हैं कि जब भी उनको नींद आती, ऐसा लगता कि कोई जिंदा बकरी उनके पेट में मिमिया रही है और वे गहरे ग्लानि भाव के साथ कूदकर बिस्तर से उठ जाते थे।
 
आज के आधुनिक डायट प्लान पर गांधी जी ने पहले प्रयोग किए थे। कम कैलरी वाला भोजन, ज्यादा फल, सब्जियां और सूखे फल लेना उनके रोज़ के भोजन में शामिल था। आहार का प्रश्न उनके लिए आत्म-संयम, आध्यात्मिक और व्यक्तिगत प्रगति के साथ जुड़ा था। भोजन में नमक की मात्रा को लेकर वह काफी सजग थे। नमक तो उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन के साथ भी जुड़ा रहा और इसे लेकर उन्होंने एक बड़ा आन्दोलन भी किया। गांधी जी स्वास्थ्य के बारे में इतने सजग थे, पर उनको हाई ब्लडप्रेशर था और 1937 और 1940 के बीच उनका ब्लडप्रेशर करीब 220/110 के आस-पास रहा करता था।   
 
अक्सर गांधी जी सिर्फ कच्चे भोजन पर रहते थे। उनको अहसास था कि पोषक तत्व पकाने पर नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने लिखा है: “आंच लगते ही विटामिन ‘ए’ नष्ट होता है।” कच्चे भोजन से जुड़े गांधी जी के आहार दर्शन का एक सामाजिक राजनीतिक पहलू भी था। गांधी जी यह मानते थे कि देश के गरीब लोगों के लिए इस तरह का भोजन आसानी से उपलब्ध होगा और इसका पोषक तत्व ख़त्म नहीं होगा। कच्चे साग-सब्जियां चबाने में दिक्कत हो सकती है, इसलिए वे उन्हें घिस देने का सुझाव देते थे।

दलिया गांधी जी को खास तौर पर पसंद था। अपना गेंहू का दलिया वे बड़े सलीके से अपनी देख-रेख में ही तैयार करवाते थे। अधिक फाइबर वाले सुपाच्य भोजन के रूप में दलिये के महत्व को हर डायटीशियन आज जानता है। भोजन की गुणवत्ता के अलावा वह इसकी मात्रा पर भी बहुत जोर देते थे और अक्सर अपना भोजन तोले में नापकर लेते थे। कम भोजन करने की आदत का ही परिणाम था कि गांधी जी का वज़न कभी 46.7 किलोग्राम से अधिक नहीं हुआ। इसके लिए गांधी जी रोज़ाना औसतन 18 किलोमीटर या बाईस हज़ार कदम चलते थे। वर्ष 1913 से 1948 के बीच वे करीब 79000 किमी चले होंगे, जो कि पूरी दुनिया के दो चक्कर लगा लेने के समान है! आजकल के सभी हेल्थ विशेषज्ञ करीब 10 हज़ार कदम रोज़ चलने की सलाह देते हैं।

गाँधी जी जब दक्षिण-अफ्रीका के डरबन में थे तब उन्होंने बेकर से ब्रेड खरीदने की जगह घर में हाथ से मोटे पिसे हुए आटे की रोटी खाना शुरू किया। घर की चक्की में गेंहू पीसने को वे अच्छी कसरत भी मानते थे। दक्षिण-अफ्रीका में अपने मित्र हर्मन केलेंबाख के साथ रहते हुए गांधी जी ने सिर्फ फलों पर रहने का भी प्रयोग किया था। उपवास पर उन्हें बहुत भरोसा था और आम तौर पर वे एकादशी के दिन उपवास करते थे।   

स्वास्थ्य स्वराज की गांधी जी को बड़ी फिक्र थी। उन्होंने कहा था कि देश को पश्चिम से दवाइयां आयात करने की जरूरत नहीं, क्योंकि यहाँ के गाँवों में ही कई तरह की प्राकृतिक औषधियां उपलब्ध हैं। वे लोगों को सही जीवन जीने की सलाह देते थे, और सही भोजन को इससे अलग नहीं किया जा सकता। एलॉपैथी और आयुर्वेद के अलावा वे हर तरह की चिकित्सा पद्धति का अध्ययन करते थे, पर प्राकृतिक चिकित्सा को ही तरजीह देते थे।  

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ज्यादा स्टार्च और चीनी खाने के विरोधी गांधी जी थोड़ी मात्रा में गुड़ खाने की सलाह देते थे। महीन, पिसे हुए आटे और पॉलिश किये हुए चावल का भी वे विरोध करते थे। यह सब कुछ आज के आधुनिक सलाहकारों के ज्ञान के मुताबिक ही था, फर्क बस इतना था कि गांधी जी ने खुद के जीवन में इनका प्रयोग करते हुए ये बातें सीखीं और लोगों के साथ साझा कीं थीं। बुद्ध की तरह गांधी जी भी मानते थे कि चेतना के निर्माण में भोजन की भूमिका होती है। नशे से दूर रहना, रोज़ व्यायाम करना, सादा भोजन करना, कम खाना, नमक और शक्कर का उपयोग कम करना, स्वाद की बजाए भूख के लिए खाना, कच्चा भोजन ज्यादा लेना – गांधी जी का आहार-दर्शन इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द गढ़ा गया था।

उनका दिन शुरू होता था, गुनगुने नींबू पानी के साथ। आम तौर पर वे दिन भर में 100 ग्राम गेंहू से बनी चीज़ें, 80 ग्राम सूखे फल और करीब 100 ग्राम हरी पत्तियों वाली सब्जियां लेते थे। दिन भर में छह नींबू और शहद लेते थे। अपने भोजन को वे दो हिस्सों में बांटते थे, सुबह 11 बजे और शाम को 6.15 बजे। इनके बीच वे सिर्फ पानी पीते थे। अपने भोजन संबंधी प्रयोगों पर गांधी जी ने तीन किताबें लिखीं हैं – ‘डायट एंड डायट रिफॉर्म्स,’ ‘द मॉरल बेसिस ऑव वेजीटेरियनिज्म’ और ‘की टू हेल्थ।’ ये सभी किताबें आज भी प्रासंगिक हैं। इसके अलावा निको स्लेट की किताब “गाँधीज़ सर्च फॉर अ परफेक्ट डायट” महात्मा के प्रयोगों के बारे में दिलचस्प जानकारियाँ देती है।  

पुणे के पास उरुली-कांचन गाँव में गाँधी ने स्वतंत्र भारत की चिकित्सा व्यवस्था पर बहुत विचार किया था। 22 मार्च 1946 की एक प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा था कि प्रार्थना कई रोगों का उपचार है, पर इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सही आहार लें, ठीक से सोयें और क्रोध के वश में न रहें। इन सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम प्रकृति के साथ समरसता बनाये रखें और उसके सिद्धांतों पर चलें। उरुली-कांचन में उन्होंने गाँव वालों को सफाई का पाठ सिखाया।

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12 दिसम्बर, 1912 को गांधी जी लिखते हैं कि “नीम-हकीम गांधी आपको कुछ सुझाव देना चाहता है। उपवास करें, दिन में सख्ती से बस दो बार खाना खाएं, भोजन में मसालों का इस्तेमाल न करें, चाय, काफी वगैरह से परहेज करें, जैतून के तेल (ऑलिव आयल) का प्रयोग करें और खट्टे फल खाएं। धीरे-धीरे अपने भोजन से पका हुआ खाना समाप्त कर दें और देखिये आपका मधुमेह ख़त्म हो जायेगा और देह स्वस्थ रहेगी।” (सप्रेस) 

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